महाराष्ट्र के पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार की जान लेने वाले बारामती विमान हादसे की जांच अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच गई है। महाराष्ट्र क्राइम इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (CID) ने इस मामले में एक "गहन और पेशेवर" जांच का वादा किया है। इस बीच, अजित पवार के परिवार और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (SP) के नेताओं ने विमान संचालक कंपनी के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग तेज कर दी है।
Maharashtra CID की 'प्रोफेशनल जांच' का भरोसा
महाराष्ट्र क्राइम इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (CID) 28 जनवरी को बारामती में हुए दुखद प्लेन क्रैश की पूरी और प्रोफेशनल जांच कर रहा है, जिसमें पूर्व डिप्टी चीफ मिनिस्टर अजीत पवार और चार अन्य लोगों की जान चली गई थी। अधिकारियों ने ज़ोर देकर कहा कि उनका मुख्य काम यह पता लगाना है कि VSR वेंचर्स द्वारा ऑपरेट किए जाने वाले Learjet-45 से जुड़ी इस दुर्घटना में कोई तोड़-फोड़ या क्रिमिनल लापरवाही तो नहीं थी। CID टीमों ने पुणे जिले में क्रैश साइट से पहले ही काफी सबूत इकट्ठा कर लिए हैं, जो सभी फैक्टर्स की बारीकी से जांच करने के उनके कमिटमेंट को दिखाता है।
परिवार ने ऑपरेटर के खिलाफ FIR की मांग की
एक बड़ा कदम उठाते हुए, NCP (SP) MLA रोहित पवार और उनके चचेरे भाई युगेंद्र पवार ने गुरुवार को बारामती तालुका पुलिस स्टेशन का रुख किया और VSR वेंचर्स और उसके डायरेक्टर्स के खिलाफ FIR की मांग की। अजीत पवार के लिए "न्याय" की मांग करते हुए पोस्टर लहरा रहे समर्थकों के सपोर्ट में, दोनों ने एक फॉर्मल कंप्लेंट दी, जो रोहित पवार द्वारा मुंबई के मरीन ड्राइव पुलिस स्टेशन में पहले की गई फाइलिंग से मिलती-जुलती है। युगेंद्र पवार ने डायरेक्टरेट जनरल ऑफ़ सिविल एविएशन (DGCA) के हाल ही में सेफ्टी नियमों के उल्लंघन की वजह से चार VSR एयरक्राफ्ट को ग्राउंड करने के मामले पर ज़ोर दिया और इसे संभावित क्रिमिनल लापरवाही का सबूत बताया।
देरी और मामले को दबाने के आरोप
रोहित पवार ने मुंबई पुलिस पर FIR दर्ज करने से मना करने का आरोप लगाया, उनका दावा है कि इससे क्रैश के हालात पर शक बढ़ता है और इससे लगता है कि सरकार को ज़िम्मेदार लोगों को सुरक्षा देनी चाहिए। उन्होंने X पर पोस्ट किया, "पुलिस के बर्ताव ने हमारे शक को और बढ़ा दिया है," और कसम खाई कि सपोर्टर अपनी मांगों पर ज़ोर देने के लिए बारामती में रैली करेंगे। बारामती में शुरुआती एक्सीडेंटल डेथ रिपोर्ट CID पुणे को ट्रांसफर कर दी गई थी, लेकिन परिवार का कहना है कि अगर लापरवाही की पुष्टि होती है तो FIR ज़रूरी है, खासकर इसलिए क्योंकि एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (AAIB) ने अभी तक अपनी शुरुआती जांच रिपोर्ट जारी नहीं की है।
युगेंद्र पवार, जिन्होंने 2024 के चुनाव में NCP (SP) के टिकट पर बारामती से अपने चाचा अजीत के खिलाफ चुनाव लड़ा था, ने जल्दी न्याय की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। इस क्रैश के बाद VSR वेंचर्स के ऑपरेशन्स की गहरी जांच शुरू हो गई है, DGCA की रिपोर्ट्स में उड़ने की क्षमता और फ़्लाइट सेफ़्टी में कमी की बात कही गई है। CID सबूत इकट्ठा कर रही है, लेकिन परिवार की मांगों और पॉलिटिकल तनाव के बीच जांच अभी भी मुख्य मुद्दा बनी हुई है।
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पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश की राजनीति आजकल किसी सस्पेंस थ्रिलर फिल्म जैसी हो गई है। शेख हसीना के देश छोड़ने के महीनों बाद भी 'इस्तीफे के लेटर' और 'असंवैधानिक सरकार' जैसे शब्दों को लेकर वहां जबरदस्त घमासान मचा हुआ है। ताजा मामला राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन और कट्टरपंथी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के बीच ठन जाने का है।
हाल ही में राष्ट्रपति शहाबुद्दीन ने एक इंटरव्यू में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार पर तीखे हमले किए। उन्होंने कुछ ऐसे खुलासे किए जिसने ढाका से लेकर दिल्ली तक सबको चौंका दिया। राष्ट्रपति ने यूनुस सरकार के कई फैसलों को संविधान के खिलाफ बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें एक तरह से 'हाउस अरेस्ट' (नजरबंद) कर दिया गया था, उन्हें इलाज के लिए विदेश जाने से रोका गया और कई बार राष्ट्रपति पद से हटाने की कोशिश भी की गई।
उन्होंने अमेरिका और यूनुस सरकार के बीच सीक्रेट डील होने का भी दावा किया। उन्होंने कहा कि यूनुस सरकार ने अमेरिका के साथ एक 'गुपचुप' व्यापार समझौता किया, जिसके बारे में उन्हें (देश के राष्ट्रपति को) अंधेरे में रखा गया। राष्ट्रपति के इन बयानों पर अब जमात-ए-इस्लामी के चीफ शफीकुर रहमान भड़क गए हैं। उन्होंने फेसबुक पर एक लंबी पोस्ट लिखकर राष्ट्रपति को ही कटघरे में खड़ा कर दिया।
गायब इस्तीफे की मिस्ट्री
रहमान का कहना है कि 5 अगस्त (जिस दिन हसीना ने देश छोड़ा) को राष्ट्रपति ने देश से कहा था कि उन्हें इस्तीफा मिल गया है, लेकिन अब वह कह रहे हैं कि उनके पास इस्तीफे का कोई सबूत ही नहीं है। जमात चीफ ने सवाल उठाया कि राष्ट्रपति उस दिन कुछ और कह रहे थे और आज सुर क्यों बदल रहे हैं?
इस पूरी लड़ाई की जड़ वह 'रेजिग्नेशन लेटर' है, जिसका अता-पता किसी को नहीं है।
- अगस्त 2024: राष्ट्रपति ने टीवी पर कहा, "हसीना ने इस्तीफा दे दिया है और मुझे मिल गया है।"
- अक्टूबर 2024: राष्ट्रपति ने कहा, "मैंने बहुत ढूंढा पर इस्तीफा नहीं मिला, शायद हसीना को साइन करने का वक्त ही नहीं मिला।"
यही वो पॉइंट है जहाँ यूनुस सरकार और इस्लामी संगठन राष्ट्रपति को घेर रहे हैं, क्योंकि अगर इस्तीफा नहीं है, तो वर्तमान सरकार की कानूनी वैधता पर सवाल उठते हैं।
यूनुस और कट्टरपंथियों का 'नेक्सस'?
बांग्लादेश की गलियों में यह चर्चा आम है कि शेख हसीना को हटाने के पीछे जमात-ए-इस्लामी और उसके छात्र संगठन 'छात्र शिविर' का बड़ा हाथ था। 2026 के चुनावों से पहले यह साफ दिख रहा है कि आंदोलन चलाने वाले छात्र नेता अब जमात के करीब जा रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कई छात्र नेता अब यूनुस की कैबिनेट में मंत्री बनकर बैठे हैं। ऐसे में राष्ट्रपति का यह कहना कि वह सिर्फ सेना और विपक्षी पार्टी BNP के समर्थन से टिके हुए हैं, वहां के सत्ता संघर्ष की एक डरावनी तस्वीर पेश करता है।
बांग्लादेश में फिलहाल 'संविधान' और 'हकीकत' के बीच की जंग चल रही है। एक तरफ वो सरकार है जो आंदोलन से निकली है, और दूसरी तरफ वो राष्ट्रपति हैं जिन्हें शेख हसीना ने नियुक्त किया था। देखना होगा कि 2026 के चुनाव तक यह ऊंट किस करवट बैठता है।
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