अमेरिकी संसद में ट्रंप के टैरिफ पर मतभेद, कनाडा पर लागू आयात शुल्क के खिलाफ प्रस्ताव पारित
वाशिंगटन। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीति को लेकर सियासी माहौल गरमा गया है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा कनाडा पर लगाए गए आयात शुल्क को निरस्त करने के उद्देश्य से एक प्रस्ताव पारित किया है। यह कदम उस राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा को समाप्त करने के लिए उठाया गया, जिसके आधार पर ट्रंप प्रशासन ने कनाडाई उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाया था। मतदान के दौरान 219 सांसदों ने प्रस्ताव के पक्ष में और 211 ने विरोध में वोट दिया। खास बात यह रही कि छह रिपब्लिकन सांसदों ने अपनी पार्टी की लाइन से हटकर डेमोक्रेट्स का समर्थन किया।
राष्ट्रपति ट्रंप ने वर्ष 2025 की शुरुआत में कनाडा से आने वाले सामान पर 25 प्रतिशत शुल्क लगाया था। बाद में इसे बढ़ाकर 35 प्रतिशत कर दिया गया, हालांकि यह वृद्धि केवल उन वस्तुओं पर लागू हुई जो अमेरिका-मेक्सिको-कनाडा समझौते (USMCA) के अंतर्गत नहीं आती थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के टैरिफ का असर सीधे आम उपभोक्ताओं और कंपनियों पर पड़ता है, क्योंकि आयात महंगा होने से बाजार में कीमतें बढ़ती हैं। टैक्स फाउंडेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इन शुल्कों की वजह से 2025 में औसतन हर अमेरिकी परिवार पर करीब 1,000 डॉलर और 2026 में लगभग 1,300 डॉलर का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ा।
हालांकि, निचले सदन में प्रस्ताव पारित हो चुका है, लेकिन इसे प्रभावी बनाने के लिए सीनेट की स्वीकृति भी जरूरी है। यदि राष्ट्रपति ट्रंप इस विधेयक को वीटो करते हैं, तो उसे पलटने के लिए कांग्रेस के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत चाहिए होगा, जो मौजूदा हालात में आसान नहीं दिखता। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह घटनाक्रम बताता है कि अमेरिका में व्यापारिक नीतियों को लेकर सहमति नहीं है और राष्ट्रपति की आर्थिक रणनीतियों पर सवाल उठ रहे हैं। आने वाले समय में यह विवाद अमेरिकी राजनीति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है। एपी सिंह की रिपोर्ट-
पाकिस्तान का कबूलनामा: 'अमेरिका ने हमें टॉयलेट पेपर की तरह इस्तेमाल किया'; रक्षा मंत्री ने खोली सैन्य तानाशाहों और आतंकवाद की पोल
नई दिल्ली : पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने संसद के पटल पर अपनी ही विदेश नीति और सैन्य इतिहास की धज्जियां उड़ाते हुए बेहद सनसनीखेज बयान दिया है। उन्होंने अमेरिका के साथ पाकिस्तान के दशकों पुराने संबंधों को 'एकतरफा और अपमानजनक' करार देते हुए कहा कि वाशिंगटन ने इस्लामाबाद का इस्तेमाल केवल एक 'टॉयलेट पेपर' की तरह किया, जिसे जरूरत पूरी होने के बाद फेंक दिया गया।
यह बयान महज एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि पाकिस्तान की उस बदहाली का आधिकारिक स्वीकारोक्ति है, जिसे वह पिछले कई दशकों से आतंकवाद और आर्थिक तंगहाली के रूप में झेल रहा है।
अमेरिका के साथ 'इस्तेमाल और फेंकने' वाला रिश्ता
रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने बेहद तल्ख लहजे में कहा कि अमेरिका और पाकिस्तान के बीच कभी भी बराबरी का संबंध नहीं रहा। उन्होंने आरोप लगाया कि जब भी अमेरिका को दक्षिण एशिया में अपने हितों को साधना होता था, तो उसने पाकिस्तान को मोहरे की तरह इस्तेमाल किया। जैसे ही उसका रणनीतिक उद्देश्य पूरा हुआ, उसने पाकिस्तान को सुरक्षा और आर्थिक संकटों के बीच अकेला छोड़ दिया।
सैन्य तानाशाहों की ऐतिहासिक भूलों का पर्दाफाश
आसिफ ने पाकिस्तान की बर्बादी के लिए सीधे तौर पर देश के पूर्व सैन्य तानाशाहों—जनरल जिया-उल-हक और जनरल परवेज मुशर्रफ को जिम्मेदार ठहराया।
मजहब का गलत इस्तेमाल: उन्होंने स्वीकार किया कि इन तानाशाहों ने विदेशी ताकतों को खुश करने और सत्ता में बने रहने के लिए इस्लाम और जिहाद का सहारा लेकर पाकिस्तान को पराई जंगों में झोंक दिया।
अफगान युद्ध का सच: रक्षा मंत्री ने कहा कि 1979 के सोवियत हस्तक्षेप को अमेरिका ने 'आक्रमण' का रंग दिया और पाकिस्तान उसके नरेटिव का हिस्सा बन गया, जिसने देश में कलाश्निकोव और ड्रग कल्चर को जन्म दिया।
शिक्षा प्रणाली में जहर घोलने का कबूलनामा
एक बड़ा खुलासा करते हुए ख्वाजा आसिफ ने कहा कि पिछली सरकारों और तानाशाहों ने जंगों को जनता के बीच सही ठहराने के लिए पाकिस्तान के शिक्षा पाठ्यक्रम तक को बदल दिया।
बच्चों को जिहादी मानसिकता के साथ बड़ा किया गया, जिसका परिणाम आज पाकिस्तान की सड़कों पर फैल रहे चरमपंथ और आतंकवाद के रूप में सामने आ रहा है। उन्होंने कहा कि जो जहर दशकों पहले घोला गया था, उसका असर आज भी कायम है।
आतंकवाद: पाकिस्तान की अपनी बोई हुई फसल
संसद में शिया मस्जिद पर हुए आत्मघाती हमले की निंदा करते हुए आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान आज जो आतंकवाद झेल रहा है, वह बाहरी नहीं बल्कि 'घर का पैदा किया हुआ' है। उन्होंने माना कि टीटीपी जैसे संगठनों को पालने-पोसने की जो नीति अपनाई गई थी, वही अब 'भस्मासुर' बनकर पाकिस्तान को निगल रही है।
अमेरिकी विदेश नीति में पाकिस्तान का घटता कद
अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भी पाकिस्तान को झटका लगा है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका अब पाकिस्तान के साथ अपने रिश्तों को भारत की रणनीतिक साझेदारी की कीमत पर नहीं आगे बढ़ाएगा।
अमेरिका ने साफ संदेश दिया है कि वह भारत के साथ अपनी मजबूत दोस्ती को प्राथमिकता देगा और पाकिस्तान के प्रति उसका रवैया केवल 'जरूरत और शर्तों' तक सीमित रहेगा।
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