'बच्चे के नाम का पैसा, बच्चे का ही हक...', सेविंग पर दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
Delhi High Court: दिल्ली हाई कोर्ट का हालिया फैसला उन सभी माता-पिता के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है, जो अपने बच्चों के भविष्य के लिए बचत करते हैं. अदालत ने साफ कहा है कि बच्चे के नाम पर जमा किया गया पीपीएफ (पब्लिक प्रोविडेंट फंड) का पैसा बच्चे का होता है. अगर पिता या माता उस खाते के संरक्षक (गार्जियन) हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि वे उस रकम को अपनी जरूरत या अपनी कानूनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं.
यह मामला उस समय सामने आया, जब एक पिता ने यह दलील दी कि बच्चे के पीपीएफ खाते में जमा रकम को उसकी तरफ से दिए जाने वाले भरण-पोषण (मेंटेनेंस) की जिम्मेदारी के तौर पर माना जाए. लेकिन अदालत ने इस बात को स्वीकार नहीं किया. कोर्ट ने कहा कि बच्चे के नाम पर जमा पैसा केवल बच्चे के हित के लिए है। माता-पिता उस रकम के मालिक नहीं, बल्कि सिर्फ उसकी देखभाल करने वाले होते हैं.
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दरअसल अगर किसी बच्चे के नाम पर बैंक में बचत है, तो वह बचत उसी बच्चे की है. माता-पिता उस पैसे को अपनी जिम्मेदारियों से बचने का जरिया नहीं बना सकते. बच्चे की पढ़ाई, इलाज या भविष्य की जरूरतों के लिए जो पैसा रखा गया है, उसका इस्तेमाल उसी उद्देश्य के लिए होना चाहिए.
हाईकोर्ट ने दिया बड़ा बयान
अदालत ने यह भी माना कि बच्चे का पालन-पोषण करना माता-पिता की जिम्मेदारी है. यह जिम्मेदारी बच्चे की जमा पूंजी के भरोसे पूरी नहीं की जा सकती. अगर किसी पिता को बच्चे के खर्च के लिए पैसा देना है, तो वह अपनी आय और अपनी जिम्मेदारी के अनुसार देगा. बच्चे की बचत को इस जिम्मेदारी का विकल्प नहीं बनाया जा सकता.
क्यों अहम है फैसला?
अदालत ने की ये टिप्पणी
समाज में अक्सर यह समझ लिया जाता है कि बच्चे के नाम पर जो भी पैसा है, वह परिवार का पैसा है. लेकिन अदालत ने साफ कर दिया कि कानून की नजर में ऐसा नहीं है. बच्चे के नाम की बचत को बच्चे की संपत्ति माना जाएगा और उसका उपयोग भी उसी के हित में होना चाहिए. कुल मिलाकर, यह फैसला सिर्फ एक परिवार के विवाद तक सीमित नहीं है. यह उन सभी लोगों के लिए एक स्पष्ट संदेश है जो बच्चों के भविष्य के लिए निवेश करते हैं. बच्चों की बचत सुरक्षित रहे, उनके अधिकार बने रहें और उनका भविष्य मजबूत हो, यही इस फैसले की सबसे बड़ी सीख है.
सफाई कर्मियों की हड़ताल से बिगड़े पटना के हालात, निगम के दावों और हकीकत में जमीन-आसमां का अंतर
पटना नगर निगम के सफाई कर्मचारियों की हड़ताल पांच दिन से लगातार जारी है. हड़ताल का असर प्रदेश की राजधानी पटना में साफ दिखाई दे रहा है. गली-मोहल्लों में कचरे के ढेर लगे हुए हैं. स्थानीय लोगों का गंदगी और बदबू में रहना दूभर हो गया है. लोगों को संक्रमण फैलने का डर भी सता रहा है.
सोमवार को करीब 300 टन कचरा उठाया- निगम
पटना नगर निगम का दावा है कि सीमित संसाधनों के बावजूद सफाई व्यवस्था को बनाए रखने के लिए स्पेशल अभियान चलाया जा रहा है. निगम की मानें सोमवार को करीब 300 टन कचरा उठाया जा रहा है. करीब 100 डोर-टू-डोर वाहनों की मदद से सोमवार को घरों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों से कचरा एकत्रित किया गया. निगम के अनुसार, नूतन राजधानी, अजीमाबाद, पटना सिटी, पाटलिपुत्र और बांकीपुर अंचलों में अतिरिक्त वाहनों की व्यवस्था की गई. मतगणना को देखते हुए ए.एन. कॉलेज परिसर में भी सफाई की विशेष व्यवस्था की गई. वहीं, एग्जीबिशन रोड, गोरिया टोली और जमाल रोड स्थित कूड़ा प्वाइंट पर जेसीबी और ट्रैक्टरों से सफाई अभियान चलाया गया.
सफाई व्यवस्था प्रभावित होने की वजह से नगर निगम ने अनुबंधित एजेंसियों पर कार्रवाई तेज कर दी. निगम का आरोप है कि एजेंसियों ने तय मानकों के अनुसार, पर्याप्त कर्मचारी और वाहन उपलब्ध नहीं करवाए. इसी आधार पर 1 और 2 अगस्त को तीन एजेंसियों द्वारा कारण बताओ नोटिस जारी किया गया. कुल 21.95 करोड़ रुपये से अधिक का अतिरिक्त आर्थिक दंड लगाया गया.
कचरों का ढेर बयां कर रही है नगरनिगम के दावों की हकीकत
वहीं, पटना नगर निगम संयुक्त कर्मचारी समन्वय समिति के बैनर तले हड़ताली कर्मियों ने नगर निगम मुख्यालय, मौर्यालोक में प्रदर्शन जारी रखा. कर्मचारियों ने सम्मानजनक वार्ता के जरिए मांगों का समाधान करने की अपील की. समिति के नेताओं का आरोप है कि नगर निगम सफाई व्यवस्था सामान्य होने का दावा कर रही है लेकिन शहर के कई हिस्सों में कचरों का ढेर नगरनिगम के दावों का हकीकत बयां कर रही है. उनका कहना है कि सिर्फ औपचारिक अभियान चलाने से समस्या का समाधान नहीं होगा. मांगे पूरी होने तक आंदोलन जारी रहेगा.
सफाई कर्मियों के समर्थन में उतरे श्रमिक संगठन
खास बात है कि अब श्रमिक संगठन भी इसको समर्थन देने लगे हैं. एक्टू ने नगर निकाय सफाई कर्मियों की मांगों के समर्थन में बिहार के सभी जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन करने की घोषणा की है. अगर ऐसे में जल्द समाधान नहीं किया गया तो राजधानी में सफाई व्यवस्था को सामान्य बनाना और भी बड़ी चुनौती बन सकती है. वर्तमान में नगर निगम और हड़ताली कर्मचारियों के बीच गतिरोध बरकरार है, जिसका असर सबसे अधिक आम नागरिकों को हो रहा है.
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