Rajasthan News: 11.57 करोड़ पौधे लगाने का दावा निकला फर्जी! CM भजनलाल शर्मा के कार्यकाल में हुई पर्यावरण से जुड़ी बड़ी घपलेबाजी
Rajasthan News: राजस्थान सरकार ने साल 2025-26 में 11.57 करोड़ पौधे लगाने का दावा किया गया था. यह दावा पर्यावरण संरक्षण, हरित विकास और जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेशा किया गया था. मगर जब इन पौधों के जमीनी सत्यापन और जियो टैगिंग के आंकड़े सामने आए तो राजस्थान सरकार पर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए. बताया जा रहा है कि 11.57 करोड़ पौधों में से सिर्फ 1.69 करोड़ पौधों का ही सत्यापन और जियो टैगिंग हुई है. यानी 85% से ज्यादा पौधों का कोई पुख्ता डिजिटल रिकॉर्ड मौजूद ही नहीं है.
सोमवार को जब लोकसभा में सीकर की सांसद अमराराम के प्रश्न के लिखित जवाब में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह की ओर से पेश आंकड़ों में सामने आई.
कहां गए करोड़ों पौधे?
ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर ये करोड़ों पौधे कहां गए? क्या वे सच में लगाए भी गए थे या फिर सिर्फ सरकारी रिकॉर्डों में ही हरियाली दिखाई जा रही थी? अगर पौधे लगाए गए थे तो उनका वेरिफिकेशन क्यों नहीं हुआ? और यदि सत्यापन नहीं हो पाया, तो इतने बड़े अभियान की सफलता का दावा कैसे किया जा रहा था, क्या सीएम भजनलाल शर्मा को इस बारे में पता है?
फेल हो गया भजनलाल सरकार का करोड़ों रुपयों का अभियान!
भजनलाल सरकार हर साल करोड़ों रुपए पौधारोपण अभियानों पर खर्च करती है. इन अभियानों का उद्देश्य सिर्फ पौधे लगाने का नहीं बल्कि उन्हें जीवित रखना, उन्हें बढ़ने देना और पर्यावरण को बेहतर बनाना भी होता है. यही वजह है कि पिछले कुछ सालों में जियो टैगिंग और डिजिटल मॉनिटरिंग जैसी व्यवस्थाओं को लागू किया गया है, ताकि हर पौधे की वास्तविक स्थिति का रिकॉर्ड मिल सके. लेकिन जब जियो टैगिंग के आंकड़े ही इतने बड़े अंतर दे रहे हों, तो पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
आखिर जनता के पैसे किसकी जेब कर रहे गर्म?
विपक्ष और सामाजिक संगठनों का कहना है कि सिर्फ पौधे लगाने का दावा करना ही पर्याप्त नहीं है. सरकार को यह भी बताना होगा कि कितने पौधे आज भी जीवित हैं, कितनों की नियमित देखभाल की गई है और जिन पौधों का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, उनकी जिम्मेदारी किसकी है. आखिर जनता के टैक्स के पैसे से चलने वाले इन अभियानों का वास्तविक परिणाम जनता के सामने क्यों नहीं रखा जा रहा है?
सिस्टम से कैसे गायब हुए पौधों के डेटा?
इस पूरे मामले में वन विभाग और संबंधित एजेंसियों की जवाबदेही भी तय होनी जरूरी थी. यदि जियो टैगिंग अनिवार्य थी, तो करोड़ों पौधों का डेटा सिस्टम में क्यों नहीं पाया गया? क्या यह तकनीकी लापरवाही है, प्रशासनिक कमजोरी है या फिर रिकॉर्ड तैयार करने में भारी अनियमितता हुई है? इन सवालों का स्पष्ट और तथ्यात्मक जवाब सरकार को देना चाहिए.
पौधे लगाना सिर्फ हरियाली नहीं पृथ्वी की मांग
राजस्थान जैसे राज्य में हरियाली बढ़ाना सिर्फ सरकारी लक्ष्य नहीं बल्कि पर्यावरण की मांग भी है. पृथ्वी के बढ़ते तापमान, जल संकट और मरुस्थलीकरण जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए प्रभावी पौधारोपण अभियान बेहद जरूरी हैं. लेकिन अगर ऐसे अभियानों के आंकड़ों पर ही संदेह पैदा होने लगे, तो भविष्य की योजनाओं पर भी लोगों का भरोसा कमजोर पड़ सकता है.
सिर्फ फाइलों में हरियाली का बातें होंगी!
अब सबसे जरूरी यह बात है कि सरकार इस पूरे मामले पर विस्तृत सार्वजनिक रिपोर्ट कब जारी करेगी. प्रत्येक जिले में लगाए गए पौधों, उनकी जियो टैगिंग, जीवित पौधों की संख्या और खर्च किए गए बजट का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाए. अगर कहीं अनियमितता हुई है तो उसकी निष्पक्ष रूप से जांच कर दोषियों पर कार्रवाई हो और उन्हें सजा हो. आखिर सवाल सिर्फ पौधों का नहीं बल्कि सरकारी दावों की विश्वसनीयता और जनता के विश्वास का भी है. जब दावा 11.57 करोड़ पौधों का हो और पुष्टि सिर्फ 1.69 करोड़ की मिले, तो यह सवाल पूछना पूरी तरह जायज है क्या राजस्थान की हरियाली जमीन पर है या सिर्फ सरकारी फाइलों में?
'बच्चे के नाम का पैसा, बच्चे का ही हक...', सेविंग पर दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
Delhi High Court: दिल्ली हाई कोर्ट का हालिया फैसला उन सभी माता-पिता के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है, जो अपने बच्चों के भविष्य के लिए बचत करते हैं. अदालत ने साफ कहा है कि बच्चे के नाम पर जमा किया गया पीपीएफ (पब्लिक प्रोविडेंट फंड) का पैसा बच्चे का होता है. अगर पिता या माता उस खाते के संरक्षक (गार्जियन) हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि वे उस रकम को अपनी जरूरत या अपनी कानूनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं.
यह मामला उस समय सामने आया, जब एक पिता ने यह दलील दी कि बच्चे के पीपीएफ खाते में जमा रकम को उसकी तरफ से दिए जाने वाले भरण-पोषण (मेंटेनेंस) की जिम्मेदारी के तौर पर माना जाए. लेकिन अदालत ने इस बात को स्वीकार नहीं किया. कोर्ट ने कहा कि बच्चे के नाम पर जमा पैसा केवल बच्चे के हित के लिए है। माता-पिता उस रकम के मालिक नहीं, बल्कि सिर्फ उसकी देखभाल करने वाले होते हैं.
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दरअसल अगर किसी बच्चे के नाम पर बैंक में बचत है, तो वह बचत उसी बच्चे की है. माता-पिता उस पैसे को अपनी जिम्मेदारियों से बचने का जरिया नहीं बना सकते. बच्चे की पढ़ाई, इलाज या भविष्य की जरूरतों के लिए जो पैसा रखा गया है, उसका इस्तेमाल उसी उद्देश्य के लिए होना चाहिए.
हाईकोर्ट ने दिया बड़ा बयान
अदालत ने यह भी माना कि बच्चे का पालन-पोषण करना माता-पिता की जिम्मेदारी है. यह जिम्मेदारी बच्चे की जमा पूंजी के भरोसे पूरी नहीं की जा सकती. अगर किसी पिता को बच्चे के खर्च के लिए पैसा देना है, तो वह अपनी आय और अपनी जिम्मेदारी के अनुसार देगा. बच्चे की बचत को इस जिम्मेदारी का विकल्प नहीं बनाया जा सकता.
क्यों अहम है फैसला?
अदालत ने की ये टिप्पणी
समाज में अक्सर यह समझ लिया जाता है कि बच्चे के नाम पर जो भी पैसा है, वह परिवार का पैसा है. लेकिन अदालत ने साफ कर दिया कि कानून की नजर में ऐसा नहीं है. बच्चे के नाम की बचत को बच्चे की संपत्ति माना जाएगा और उसका उपयोग भी उसी के हित में होना चाहिए. कुल मिलाकर, यह फैसला सिर्फ एक परिवार के विवाद तक सीमित नहीं है. यह उन सभी लोगों के लिए एक स्पष्ट संदेश है जो बच्चों के भविष्य के लिए निवेश करते हैं. बच्चों की बचत सुरक्षित रहे, उनके अधिकार बने रहें और उनका भविष्य मजबूत हो, यही इस फैसले की सबसे बड़ी सीख है.
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