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सुस्ती दूर कर शरीर को मजबूत बनाता है सर्वांगपुष्टि आसन, 10 मिनट के अभ्यास से कई फायदे

नई दिल्ली, 25 फरवरी (आईएएनएस)। आज के समय की जीवनशैली ऐसी अनियमित बन चुकी है कि तन के साथ मन भी रोगों की जद में आसानी से आ जाता है। ऐसे में एक्सपर्ट रोजाना कम से कम 10 से 15 मिनट योगासन अभ्यास की सलाह देते हैं, जो कई शारीरिक और मानसिक समस्याओं को छूमंतर करने में कारगर है।

मोरारजी देसाई नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ योगा ऐसे ही एक आसान और कमाल के आसन सर्वांगपुष्टि आसन से परिचित कराता है। यह एक प्रभावी व्यायाम है, जो पूरे शरीर को पुष्ट और मजबूत बनाने में सहायक होता है। यह आसन शरीर के सभी अंगों को सक्रिय कर रक्त संचार, मांसपेशियों की ताकत और स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है।

आज की भागदौड़ भरे जिंदगी में जहां बैठे रहने, तनाव और अनियमित दिनचर्या के कारण शारीरिक कमजोरी, कमर दर्द, मोटापा और रीढ़ की हड्डी की समस्याएं आम हो गई हैं, सर्वांगपुष्टि आसन बेहद कारगर है। यह आसन न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक ऊर्जा को भी बढ़ाता है, जिससे आधुनिक जीवन की चुनौतियों से निपटना आसान हो जाता है।

सर्वांगपुष्टि आसन का अभ्यास रीढ़ की हड्डी को मजबूत करता है, जिससे कमर और पीठ दर्द से राहत मिलती है। यह पूरे शरीर की मांसपेशियों को टोन करता है, खासकर कमर, पेट और पैरों की चर्बी को तेजी से कम करने में मदद करता है। रक्त संचार बेहतर होने से ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की आपूर्ति बढ़ती है, जिससे त्वचा में चमक आती है और इम्युनिटी मजबूत होती है।

इसके नियमित अभ्यास से मोटापा, कब्ज और शारीरिक दुर्बलता जैसी समस्याओं में भी सुधार होता है। बच्चों में हाइट बढ़ाने और युवाओं में शारीरिक विकास के लिए भी यह उपयोगी है। इसके अलावा, यह जोड़ों की जकड़न दूर करता है, लचीलापन बढ़ाता है और थकान, तनाव को कम कर ऊर्जा का स्तर बनाए रखता है।

सर्वांगपुष्टि आसन सरल दिखता है, लेकिन इसे सही तरीके से और योग विशेषज्ञ की देखरेख में करना चाहिए। गर्दन, पीठ या कंधे में कोई चोट, हाई ब्लड प्रेशर, सिरदर्द, गंभीर हृदय रोग या हाल ही में सर्जरी हुई हो तो इस आसन से बचें। गर्भवती महिलाओं और पीरियड्स के दौरान भी इसे न करें। शुरुआत में ज्यादा देर तक न रखें और सांस पर ध्यान दें। यदि चक्कर आए या असुविधा हो तो तुरंत रुक जाएं। हमेशा खाली पेट या हल्के व्यायाम के बाद अभ्यास करें।

--आईएएनएस

एमटी/एएस

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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Premanand Ji Maharaj: भक्ति और नाम जप से कैसे मिलती है मन को शांति और मुक्ति ? प्रेमानंद जी महाराज ने बताया सरल उपाय और कारण

Paremanand Ji Maraj: वृंदावन के रसिक संत श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज अपने प्रवचनों में बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि मनुष्य को बांधने वाली सबसे बड़ी शक्ति उसकी इच्छाएं होती हैं. यही कामनाएं इंसान को जन्म और मृत्यु के अंतहीन चक्र में उलझाए रखती हैं. महाराज जी का मानना है कि जब तक इच्छाओं का शासन मन पर रहता है, तब तक सच्ची शांति संभव नहीं. 

इच्छा ही बंधन की जड़

महाराज जी कहते हैं कि जैसे ही मन में किसी वस्तु, व्यक्ति या स्थिति को पाने की चाह पैदा होती है, उसी क्षण मन स्वतंत्र नहीं रह जाता. इच्छा हमें परतंत्र बना देती है. हम उसी के अनुसार सोचने, निर्णय लेने और कर्म करने लगते हैं. यही मानसिक गुलामी आगे चलकर संसारिक बंधन का रूप ले लेती है.

अशांति कैसे जन्म लेती है? 

प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, इच्छा पूरी न हो तो मन में क्रोध पैदा होता है. यदि इच्छा पूरी हो जाए तो लोभ बढ़ता है. इन दोनों स्थितियों में मन अशांत ही रहता है. संत प्रेमानंद जी कहते हैं कि यही कारण है कि भौतिक सुख मिलने के बाद भी मनुष्य संतुष्ट नहीं हो पाता. उसे कुछ और चाहिए होता है.

महाराज जी का समाधान बेहद स्पष्ट और व्यावहारिक है. वे कहते हैं कि इच्छाओं को दबाने से नहीं, बल्कि उन्हें सही दिशा देने से मुक्ति मिलती है. सभी सांसारिक इच्छाओं को एक ही इच्छा में बदल देना चाहिए भगवान की प्राप्ति की इच्छा. जब लक्ष्य बदलता है, तो मन का स्वभाव भी बदलने लगता है.

 

‘मुझे चाहिए’ से ‘मुझे प्रभु चाहिए’ तक

जब मन “मुझे यह चाहिए” के भाव से ऊपर उठकर “मुझे प्रभु चाहिए” की अवस्था में पहुंचता है, तभी वास्तविक आनंद का अनुभव होता है. इस स्थिति में व्यक्ति बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता. सुख-दुख, लाभ-हानि उसे विचलित नहीं कर पाते.

नाम जप और मन पर कैसे करें कंट्रोल? 

महाराज जी नाम जप को मन को साधने का सबसे प्रभावी साधन मानते हैं. नियमित रूप से भगवान के नाम का स्मरण करने से चित्त धीरे-धीरे स्थिर होता है. विचारों की गति कम होती है और इच्छाओं का प्रभाव कमजोर पड़ने लगता है. यही अभ्यास अंततः भक्ति को गहरा करता है.

प्रेमानंद जी महाराज का दर्शन हमें सिखाता है कि समस्या संसार में नहीं, हमारी इच्छाओं में है. जब इच्छाएं सीमित होती हैं, तो दुख बढ़ता है. जब वही इच्छाएं भक्ति में परिवर्तित हो जाती हैं, तो जीवन सरल और शांत हो जाता है.

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