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3 मार्च को दिखेगा 'ब्लड मून', जानें कितने प्रकार के होते हैं चंद्र ग्रहण

नई दिल्ली, 23 फरवरी (आईएएनएस)। चंद्र ग्रहण एक खूबसूरत खगोलीय घटना है, जो साल में चार से सात बार होती है। इस दौरान पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य एक सीधी रेखा में आ जाते हैं। चंद्रमा की कक्षा पृथ्वी की कक्षा के मुकाबले थोड़ी झुकी हुई हैं, इसलिए हर पूर्णिमा पर ग्रहण नहीं होता, बल्कि कभी-कभी ही होता है।

चंद्र ग्रहण पूर्णिमा के दिन होता है, जबकि सूर्य ग्रहण अमावस्या पर। चंद्र ग्रहण में पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है, जिससे चंद्रमा धुंधला या लाल दिखाई देता है। यह ग्रहण पृथ्वी के आधे हिस्से से दिखता है। ये घटनाएं प्रकृति की अनोखी प्रस्तुति हैं। साफ आसमान में बिना किसी उपकरण के देखा जा सकता है।

साल 2026 का पहला चंद्र ग्रहण 3 मार्च को है, जो पूर्ण चंद्र ग्रहण या ब्लड मून होगा। वहीं, दूसरा चंद्र ग्रहण 28 अगस्त को है। यह आंशिक चंद्र ग्रहण होगा। चंद्र ग्रहण के तीन मुख्य प्रकार होते हैं। इनमें पूर्ण चंद्र ग्रहण, आंशिक चंद्र ग्रहण और पेनम्ब्रल चंद्र ग्रहण शामिल हैं।

पूर्ण चंद्र ग्रहण में चंद्रमा पूरी तरह पृथ्वी की गहरी छाया (उम्ब्रा) में चला जाता है। पृथ्वी के वायुमंडल से गुजरने वाली सूर्य की रोशनी चंद्रमा तक पहुंचती है। नीली और बैंगनी रोशनी ज्यादा बिखर जाती है, जबकि लाल और नारंगी सीधे पहुंचती है। इसलिए चंद्रमा लाल या नारंगी रंग का दिखता है, जिसे ब्लड मून कहते हैं। वायुमंडल में जितनी ज्यादा धूल या बादल, उतना गहरा लाल रंग दिखता है। यह ग्रहण कई घंटों तक रह सकता है।

ब्लड मून पूर्ण चंद्र ग्रहण का ही एक नाम है। सूर्य की रोशनी सफेद दिखती है, लेकिन इसमें कई रंग होते हैं। सूर्यास्त या सूर्योदय के समय लाल रोशनी ज्यादा पहुंचती है, क्योंकि नीली रोशनी बिखर जाती है। चंद्र ग्रहण में भी यही होता है। पृथ्वी के वायुमंडल से गुजरती रोशनी चंद्रमा पर पड़ती है, जैसे दुनिया के सभी सूर्योदय और सूर्यास्त एक साथ चंद्रमा पर प्रोजेक्ट हो रहे हों। यही वजह है कि चंद्रमा लाल दिखता है।

आंशिक चंद्र ग्रहण: चंद्रमा जब पृथ्वी की छाया के सिर्फ एक हिस्से से गुजरता है तो छाया बढ़ती है लेकिन चंद्रमा को पूरी तरह नहीं ढक पाती, फिर पीछे हट जाती है।

पेनम्ब्रल चंद्र ग्रहण: वहीं जब पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा एक सीध में आ जाते हैं और चंद्रमा पृथ्वी की बाहरी हल्की छाया (पेनम्ब्रा) में चला जाता है, तब पेनम्ब्रल चंद्र ग्रहण होता है। इस दौरान चंद्रमा बहुत हल्का या धुंधला दिखता है और कई बार नजर नहीं आता।

-आईएएनएस

एमटी/वीसी

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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क्या है 'एनर्जी शिफ्ट'? जिसकी फरवरी 2026 में सोशल मीडिया पर हो रही चर्चा, लोगों को महसूस हो रहे ये लक्षण

फरवरी 2026 में धरती की प्राकृतिक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फ्रीक्वेंसी, जिसे Schumann Resonance कहा जाता है, उसमें कुछ असामान्य गतिविधियां दर्ज की गई हैं. यह फ्रीक्वेंसी सामान्य तौर पर 7.83 हर्ट्ज मानी जाती है और यह मुख्य रूप से धरती और आयनमंडल के बीच बिजली गिरने से बनती है. इस बार इसमें अचानक तेज स्पाइक्स देखे गए, जिसने वैज्ञानिकों के साथ-साथ आम लोगों का भी ध्यान खींचा है.

क्या है एनर्जी शिफ्ट? 

Schumann Resonance यानी एनर्जी शिफ्ट पृथ्वी के वायुमंडल में होने वाली प्राकृतिक विद्युत चुम्बकीय तरंगों का एक समूह है जिसे अक्शर पृथ्वी की धड़कन कहा जाता है. यह मुख्य रूप से बिजली के कड़कने से उत्पन्न होती है और लगभग 7.83 हर्ट्ज (Hz) की मूलभूत आवृत्ति पर पृथ्वी की सतह और आयनमंडल के बीच गूंजती है

विशेषज्ञों के अनुसार, इन स्पाइक्स का संबंध हाल के सोलर फ्लेयर्स और जियोमैग्नेटिक स्टॉर्म्स से हो सकता है. जब सूर्य से निकलने वाली ऊर्जा धरती के मैग्नेटिक फील्ड से टकराती है, तो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वातावरण में अस्थायी बदलाव आ सकते हैं. यही बदलाव Schumann Resonance में उतार-चढ़ाव की वजह बनते हैं.

लोगों को महसूस हो रहे ये लक्षण 

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सोशल मीडिया पर कई लोग अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा कर रहे हैं. कुछ लोगों का कहना है कि उन्हें कानों में तेज हाई-पिच रिंगिंग सुनाई दे रही है, जो टिनिटस जैसी लगती है. वहीं कई यूज़र्स ब्रेन फॉग, ध्यान लगाने में दिक्कत, नींद न आना और लगातार थकान महसूस करने की बात कह रहे हैं. कुछ मामलों में चिड़चिड़ापन और अचानक मूड बदलने की शिकायतें भी सामने आई हैं.

इंसानी ब्रेन वेव्स से है मिलते-जुलते 

इन अनुभवों को लेकर एक दिलचस्प पहलू यह है कि Schumann Resonance के ये स्पाइक्स इंसानी ब्रेन वेव्स से मिलते-जुलते बताए जा रहे हैं. खासतौर पर थीटा वेव्स, जिनकी फ्रीक्वेंसी 4 से 8 हर्ट्ज के बीच होती है. यही वजह है कि कुछ लोग मान रहे हैं कि धरती की बदली हुई फ्रीक्वेंसी मानव मस्तिष्क पर असर डाल सकती है.

हालांकि, वैज्ञानिक समुदाय इस विषय पर सतर्क रुख अपनाए हुए है. विशेषज्ञों का कहना है कि अभी तक ऐसे ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं, जो सीधे तौर पर इन शारीरिक या मानसिक लक्षणों को Schumann Resonance से जोड़ सकें. कई लक्षण तनाव, नींद की कमी और डिजिटल ओवरलोड की वजह से भी हो सकते हैं.

सोशल मीडिया पर हो रही एनर्जी शिफ्ट की चर्चा 

इसके बावजूद सोशल मीडिया पर इसे ‘एनर्जी शिफ्ट’ का नाम दिया जा रहा है. लोग मान रहे हैं कि धरती किसी बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है. फिलहाल वैज्ञानिक इस डेटा का विश्लेषण कर रहे हैं और आने वाले समय में इस पर और स्पष्ट जानकारी सामने आने की उम्मीद है.

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