देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर सफाई कर्मचारियों, उनके परिवारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने एकजुट होकर जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने 'हाथ से मैला उठाने वालों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013' (Manual Scavengers Act, 2013) को देश भर में सख्ती से लागू करने की मांग की। प्रदर्शन में शामिल कई पीड़ित परिवार सिर पर "हमें मारना बंद करो" लिखी पट्टियां बांधकर पहुंचे थे, जो सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान अपनों को खोने का दर्द बयां कर रही थीं।
दर्दनाक कहानियां और सुरक्षा उपकरणों का अभाव
प्रदर्शन में शामिल हुई द्वारका की सत्यवती ने अपने जीजा अशोक कुमार की दर्दनाक मौत को याद करते हुए बताया कि दिल्ली नगर निगम (MCD) में कार्यरत उनके जीजा की वर्ष 2009 में नरेला में एक सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान जान चली गई थी। सत्यवती ने कहा कि बिना सुरक्षा उपकरणों के सेप्टिक टैंक में उतारना कर्मचारियों के लिए मौत के कुएं में कूदने जैसा है।
वहीं, रोहिणी में रहने वाले 60 वर्षीय दिहाड़ी मजदूर पालेराम ने बताया कि वे बीते 25 सालों से बिना किसी सुरक्षा किट या औपचारिक ट्रेनिंग के सेप्टिक टैंक साफ कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि थोड़ी अधिक दिहाड़ी के लालच में उन्होंने यह खतरनाक काम शुरू किया था, लेकिन आज तक उन्हें कोई आधुनिक सुरक्षा उपकरण नहीं मिला। हाल ही में एक टैंक में फिसलने से उनका पैर फ्रैक्चर हो गया था।
पालेराम ने कहा, "2000 के दशक की शुरुआत में मुझे जो पहली नौकरी मिली, वह झाड़ू लगाने की थी, जिसके लिए मुझे ₹50 मिलते थे। बाद में, मैंने जाम हुए सेप्टिक टैंक साफ़ करना शुरू किया और मुझे लगभग ₹70-100 मिलने लगे। चूंकि इसमें थोड़ी ज़्यादा कमाई थी, इसलिए मैंने यह काम चुना। मुझे टैंक के अंदर जाने, सीढ़ी का काम करने वाले फिसलन भरे लोहे के हैंडल का इस्तेमाल करके सावधानी से नीचे उतरने और उसे साफ़ करने के लिए कहा गया। आज तक मुझे बस यही ट्रेनिंग मिली है।" हाल ही में सेप्टिक टैंक के अंदर फिसलने से पालेराम के पैर में फ्रैक्चर हो गया था।
पालेराम ने आगे कहा, "कुछ NGO दस्ताने दान करते हैं, इसलिए मैं उनका इस्तेमाल करता हूं। लेकिन इसके अलावा, मैं बहुत कम कपड़े पहनकर टैंक के अंदर जाता हूं।"
पिछले 35 सालों से इस आंदोलन से जुड़ीं 64 साल की दीप्ति सुकुमार ने कहा कि जब सरकार यह मानती है कि यह काम खतरनाक है और इसे करते हुए लोगों की मौत होती रहती है, तो ये सिर्फ़ मौतें नहीं हैं, बल्कि "सरकार की निगरानी में हत्या" के मामले हैं। अंबेडकर यूनिवर्सिटी में जाति और पेशे के मामलों के जानकार, 33 साल के एक PhD स्कॉलर ने कहा कि सरकार ने भले ही सफाई अभियानों पर बहुत ध्यान दिया हो, लेकिन सबसे ज़्यादा जोखिम वाले काम करने वाले मज़दूरों के पास अब भी ज़रूरी सुरक्षा नहीं है।
इस प्रदर्शन में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सिस्ट) की नेता वृंदा करात और सांसद मनोज कुमार झा भी शामिल हुए। करात ने कहा, "ये सफाई कर्मचारी जीवित रहते हुए तो किसी को दिखाई नहीं देते, लेकिन मरने के बाद सरकार उनके साथ ऐसा व्यवहार करती है जैसे वे कभी थे ही नहीं।"
जाति और सेप्टिक टैंक से जुड़ी मौतों के बीच संबंध की ओर ध्यान दिलाते हुए झा ने कहा कि सफाई कर्मचारी बहुत जोखिम भरे काम में लगे होते हैं और उन्हें बहुत कम सुरक्षा मिलती है, साथ ही इनमें से ज़्यादातर लोग हाशिए पर रहने वाले समुदायों से आते हैं।
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