क्या है SEM कोर्ट, जिसने CJP नेताओं को भेजा था तिहाड़? जानिए इसकी ताकत, सीमाएं और जमानतदार रिजेक्ट करने का पूरा नियम...
Special Executive Magistrate: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत को लेकर एक शब्द बार-बार सुर्खियों में है, वह है SEM कोर्ट. दरअसल, ये स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट कोर्ट होती है. आखिर यह अदालत क्या होती है, इसके पास कितनी ताकत है और इसकी सीमाएं क्या हैं. आइए आपको आसान भाषा में बताते हैं.
SEM कोर्ट आखिर क्या होती है?
SEM का मतलब है स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट होता है. जानकारी के मुताबिक यह सामान्य आपराधिक अदालत की तरह मुकदमा चलाने वाला जज नहीं होता है. बल्कि इस कोर्ट के जज के पास कार्यपालिका का अधिकारी होता है. जिसे कानून-व्यवस्था और शांति बनाए रखने से जुड़े खास काम सौंपे जाते हैं. राज्य सरकार किसी क्षेत्र या किसी खास काम के लिए ऐसे मजिस्ट्रेट नियुक्त कर सकती है.
#WATCH | Delhi: CJP leaders Saurav Das and Ashutosh Ranka are brought to Mandir Marg to be produced before the SEM Court. pic.twitter.com/nzs9ptPLnr
— ANI (@ANI) October 21, 2026
यह न्यायिक मजिस्ट्रेट से कैसे अलग है?
न्यायिक मजिस्ट्रेट अपराधों की सुनवाई करता है, सबूत देखता है और दोषी या निर्दोष तय करता है. वहीं, कार्यपालक मजिस्ट्रेट का काम मुख्य रूप से रोकथाम का होता है. जो शांति भंग होने की आशंका पर पहले से कदम उठाना आदि. इसीलिए इसकी कार्यवाही आम तौर पर सजा देने के लिए नहीं बल्कि गड़बड़ी रोकने के लिए होती है.
SEM के पास कौन-सी बड़ी ताकतें होती हैं?
कानून के जानकारों के मुताबिक SEM कोर्ट निषेधाज्ञा के आदेश दे सकता है. जैसे हाल में चर्चा में रही बीएनएसएस की धारा 163. इसके अलावा शांति भंग की आशंका वाले व्यक्ति से 'बॉन्ड' भरवाने, यानी भविष्य में अच्छा आचरण रखने का लिखित वादा लेने और उसके साथ जमानतदार मांगने का अधिकार भी होता है. अगर कोई व्यक्ति यह सुरक्षा बॉन्ड या जमानतदार पेश नहीं कर पाता तो उसे तय अवधि के लिए न्यायिक हिरासत में भेजा जा सकता है.
क्या SEM किसी को सजा सुना सकता है?
जानकारी के मुताबिक SEM किसी आपराधिक मामले में किसी को दोषी ठहराकर सजा नहीं सुनाता है. कोर्ट का उसकी हिरासत का मकसद सजा नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि शांति बनी रहे. इसलिए कोर्ट की हिरासत आम तौर पर सीमित अवधि के लिए होती है और उसके लिए कारण दर्ज करना जरूरी माना जाता है.
जमानतदार को खारिज करने का अधिकार किसके पास होता है?
कानून मजिस्ट्रेट को यह परखने की छूट देता है कि जमानतदार वाकई योग्य और भरोसेमंद है या नहीं. इसका मकसद यह देखना होता है कि जमानतदार का आरोपी पर कितना नियंत्रण है और क्या वह उसे जरूरत पड़ने पर अदालत के सामने पेश कर सकता है या नहीं. लेकिन यह अधिकार मनमाना नहीं माना जा सकता और इसका इस्तेमाल ठोस कारणों के साथ होना चाहिए.
???? VIDEO OF HIGH COURT - SAURAV DAS AND ASHUTOSH RANKA HEARING
— Omkar Rathore (@omiverseglobal) October 21, 2026
Just see the Judge Sahab and CJP lawyer ???? pic.twitter.com/PbUHRqEMDf https://t.co/C5mLuJywJ6
सौरव दास और आशुतोष रांका का मामला क्या है?
CJP के ये दोनों सह-संयोजक दिल्ली के प्रतिबंधित जंतर-मंतर पर प्रदर्शन में शामिल थे. 13 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने एहतिहातन कार्रवाई करते हुए दोनों को हिरासत में लिया था. पुलिस के मुताबिक 14 अक्टूबर को उन्हें SEM के सामने पेश किया गया. जहां से दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया था.
सौरव दास और आशुतोष रांका की हिरासत कैसे बढ़ती गई?
जानकारी के मुताबिक पांच दिन पूरे होने के बाद 19 अक्टूबर को दोनों को फिर SEM के सामने पेश किया गया. जहां जिरह के दौरान दिल्ली पुलिस ने दोनों को आगे और पांच दिन हिरासत में भेजने की मांग की. लेकिन अदालत ने सिर्फ दो दिन की मंजूरी दी. इसके साथ दोनों को 21 अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. अदालत ने बचाव पक्ष को दो दिन के भीतर लिखित जवाब और नए जमानतदारों की सूची दाखिल करने को भी कहा था. 21 अक्टूबर को फिर दोनों के मामले में सुनवाई है, जिस पर कोर्ट कोई निर्णय लेगी.
SEM ने अपने आदेश में क्या कारण बताए?
इससे पहले इस मामले में मजिस्ट्रेट ने कहा कि था दोनों ने 11 अक्टूबर को दिया अपना बॉन्ड जानबूझकर तोड़ा और तुरंत शांति भंग की. आदेश में यह भी लिखा गया था कि दोनों का आचरण कानून के प्रति सम्मान नहीं दिखाता और वे प्रतिबंधित इलाकों में प्रदर्शन के आदी रहे हैं. अदालत के मुताबिक भविष्य में ऐसा न करने का उनका आश्वासन भी रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के सामने भरोसा जगाने में विफल रहा.
SEM ने जमानतदारों को लेकर आदेश में क्या कहा था?
आदेश के मुताबिक मजिस्ट्रेट ने नए जमानतदारों से व्यक्तिगत पूछताछ की. एक जमानतदार के बॉन्ड और पहचान पत्र में तस्वीरों का अंतर पाया गया और जब उससे दूसरा पहचान पत्र मांगा गया तो वह पेश नहीं कर सका. दूसरा जमानतदार उस व्यक्ति के बारे में माता-पिता का नाम और पता जैसी बुनियादी जानकारी तक नहीं बता पाया जिसके लिए वह जमानत देने आया था. अदालत ने माना कि इन दोनों का आरोपियों पर कोई नियंत्रण नहीं है.
CJP और उसके वकीलों का क्या कहना है?
CJP का आरोप है कि जमानतदारों को खारिज करना पुलिस कार्रवाई की मंशा पर सवाल खड़े करता है. उसके वकीलों ने मीडिया में दिए बयान में कहा कि यह आदेश कानून और सुप्रीम कोर्ट के तय किए गए 'ड्यू प्रोसेस' का उल्लंघन है. वकीलों का दावा है कि पिछले चार दिनों में मजिस्ट्रेट ने आठ अलग-अलग लोगों को जमानतदार के रूप में खारिज किया है.
क्या SEM के आदेश को चुनौती दी जा सकती है?
SEM का आदेश अंतिम नहीं होता है. CJP के दोनों नेताओं ने इस आदेश को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी है और याचिका वापस भी ले ली. बता दें इस केस की सुनवाई कर रहे मजिस्ट्रेट को धमकी मिलने की शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने एनसीआर यानी गैर-संज्ञेय अपराध की रिपोर्ट दर्ज की है.
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