RERA Rules: घर खरीदने वालों के लिए ढाल बना रेरा, जानिए कैसे बचाता है आपका पैसा
RERA Rules: घर खरीदना ज्यादातर लोगों के जीवन का सबसे बड़ा फैसला होता है। लेकिन कुछ साल पहले तक फ्लैट बुक करने के बाद सबसे बड़ा डर यही होता था कि पजेशन कब तक मिलेगा? कई लोगों को सालों तक ईएमआई और किराया दोनों देना पड़ा। इसी समस्या को कम करने के लिए 2016 में रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी यानी रेरा लागू किया गया। इसका मकसद बिल्डरों की मनमानी पर लगाम लगाना और खरीदारों को सुरक्षा देना है।
अब किसी भी प्रोजेक्ट को बेचने से पहले उसका रेरा में रजिस्ट्रेशन जरूरी है। हर प्रोजेक्ट को एक रेरा नंबर मिलता है। खरीदार राज्य की रेरा वेबसाइट पर जाकर इस नंबर से कई अहम जानकारी देख सकता है- जैसे मंजूर नक्शा, प्रोजेक्ट का लेआउट, कितने फ्लैट हैं, और पजेशन की तय तारीख क्या है। कई राज्यों में हर तीन महीने में कंस्ट्रक्शन अपडेट भी डाला जाता है। अगर बिल्डर जो तारीख बता रहा है और वेबसाइट पर दर्ज तारीख अलग है, तो यह पहला चेतावनी संकेत हो सकता।
खरीदारों का पैसा अब सुरक्षित
पहले अक्सर बिल्डर एक प्रोजेक्ट का पैसा दूसरे प्रोजेक्ट में लगा देते थे। इससे काम अटक जाता था और खरीदार फंस जाते थे। रेरा के नियम के मुताबिक खरीदारों से ली गई रकम का कम से कम 70% एक अलग बैंक खाते में रखना जरूरी है और वही पैसा उसी प्रोजेक्ट पर खर्च किया जा सकता है। इससे फंड डायवर्जन पर काफी हद तक रोक लगी है।
देरी होने पर बिल्डर को देना पड़ सकता ब्याज
अगर बिल्डर तय समय पर फ्लैट नहीं देता, तो खरीदार पूरी तरह लाचार नहीं रहता। रेरा के तहत उसे देरी पर ब्याज मिलने का अधिकार है। कई मामलों में खरीदार चाहें तो पैसा वापस लेकर रिफंड भी मांग सकते हैं। पहले ऐसे मामलों में कोर्ट के चक्कर सालों तक चलते थे।
कार्पेट एरिया का नियम लागू हुआ
पहले कई बिल्डर 'सुपर बिल्ट-अप एरिया' दिखाकर ज्यादा पैसे लेते थे, लेकिन असली रहने की जगह कम निकलती थी। अब फ्लैट की बिक्री कार्पेट एरिया के आधार पर करनी होती है, यानी घर की असली उपयोग वाली जगह के हिसाब से। इससे खरीदार को साफ पता होता है कि वह किस चीज के लिए पैसे दे रहा।
बड़े बदलाव के लिए खरीदारों की मंजूरी जरूरी
अगर बिल्डर प्रोजेक्ट का लेआउट बदलना चाहता है, खुली जगह कम करना चाहता है या बड़ी डिजाइन बदलाव करना चाहता है, तो उसे कम से कम दो-तिहाई खरीदारों की मंजूरी लेनी होगी। पहले ऐसे बदलाव अक्सर बिना पूछे कर दिए जाते थे।
शिकायत का आसान रास्ता है रेरा
अगर कोई विवाद होता है तो खरीदार सीधे रेरा अथॉरिटी में शिकायत कर सकता है। देरी, गलत जानकारी या निर्माण की खराब गुणवत्ता जैसे मामलों में कई लोगों ने इसका फायदा उठाया है। हालांकि RERA कोई जादुई समाधान नहीं है। हर राज्य में इसके लागू होने का तरीका थोड़ा अलग है और फैसलों को लागू होने में समय भी लग सकता है। फिर भी आज घर खरीदने वाले लोगों की स्थिति पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुई है- बस जरूरी है कि खरीदार खुद भी जानकारी लेकर फैसला करे।
(प्रियंका कुमारी)
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