US Supreme Court vs Donald Trump: कोर्ट ने टैरिफ रद्द किया, 3 घंटे में ट्रंप का पलटवार; सभी देशों पर 10% एक्स्ट्रा टैरिफ
वॉशिंगटन/नई दिल्ली। अमेरिका की राजनीति में एक बार फिर कार्यपालिका और न्यायपालिका आमने-सामने खड़ी हो गई हैं। यूनाइटेड स्टेट्स प्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए ग्लोबल टैरिफ को 6-3 के बहुमत से असंवैधानिक घोषित कर दिया। लेकिन फैसले के महज तीन घंटे के भीतर ट्रंप ने ‘सेक्शन 122’ का सहारा लेते हुए दुनिया भर के देशों पर 10% अतिरिक्त टैरिफ लगाने की नई घोषणा कर दी। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ अमेरिका की संवैधानिक व्यवस्था में बहस छेड़ दी है, बल्कि वैश्विक व्यापार जगत में भी हलचल मचा दी है।
6-3 बहुमत से टैरिफ रद्द, कोर्ट ने क्या कहा?
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि संविधान के आर्टिकल I के तहत टैक्स और टैरिफ लगाने का विशेषाधिकार कांग्रेस के पास सुरक्षित है, न कि राष्ट्रपति के पास। कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति द्वारा व्यापक ‘ग्लोबल टैरिफ’ लागू करना शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत का उल्लंघन है।
6-3 के फैसले में बहुमत के जजों ने माना कि कार्यकारी आदेश के जरिए इस प्रकार के व्यापक आर्थिक निर्णय लेना संवैधानिक दायरे से बाहर है। इस निर्णय के साथ ही अन्य देशों पर लगाए गए सभी टैरिफ स्वतः अवैध हो गए, जिनमें भारत पर लगाया गया 18% रेसिप्रोकल टैरिफ भी शामिल था।
जजों पर भड़के ट्रंप, बताया ‘देश के लिए कलंक’
फैसले के तुरंत बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों में राष्ट्रहित में फैसले लेने की हिम्मत नहीं है और वे विदेशी ताकतों के दबाव में काम कर रहे हैं। ट्रंप ने यह भी दावा किया कि 2024 के चुनाव में मिले भारी जनसमर्थन के बावजूद अदालत उनके आर्थिक एजेंडे को रोकने की कोशिश कर रही है।
ट्रंप का कहना है कि अमेरिका के बढ़ते व्यापार घाटे को कम करना उनकी प्राथमिकता है और वे इस लक्ष्य से पीछे नहीं हटेंगे। उनका तर्क है कि कठोर टैरिफ नीति के बिना अमेरिका अपनी घरेलू इंडस्ट्री और रोजगार की रक्षा नहीं कर सकता।
सेक्शन 122 क्या है? कैसे पलटा दांव
सुप्रीम कोर्ट के झटके के मात्र तीन घंटे बाद ट्रंप प्रशासन ने Trade Act 1974 के सेक्शन 122 का हवाला देते हुए नया आदेश जारी किया। इस प्रावधान के तहत राष्ट्रपति को असाधारण व्यापार घाटे की स्थिति में अधिकतम 15% तक अस्थायी टैरिफ लगाने का अधिकार है, जिसकी समय-सीमा 150 दिन तक होती है।
इसी अधिकार का उपयोग करते हुए ट्रंप ने 10% अतिरिक्त टैरिफ लागू करने की घोषणा की। हालांकि यह कदम अस्थायी है, लेकिन इसका प्रभाव व्यापक हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कोर्ट के फैसले को तकनीकी रूप से दरकिनार करने की रणनीति है।
कांग्रेस बनाम राष्ट्रपति: नई संवैधानिक बहस
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आर्थिक नीतियों पर अंतिम अधिकार किसका है। कोर्ट ने साफ किया कि विधायी शक्तियां कांग्रेस के पास हैं, जबकि राष्ट्रपति ने यह संकेत दिया है कि वे कार्यकारी अधिकारों की अधिकतम सीमा तक अपने एजेंडे को आगे बढ़ाएंगे।
अब नजर इस बात पर रहेगी कि क्या अमेरिकी कांग्रेस इस 10% अस्थायी टैरिफ को चुनौती देगी या किसी विधायी हस्तक्षेप के जरिए स्थिति स्पष्ट करेगी।
वैश्विक बाजारों में हलचल, भारत पर क्या असर?
ट्रंप के नए कदम से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता देखी गई है। एशियाई और यूरोपीय बाजारों में शुरुआती गिरावट दर्ज की गई। भारत, चीन और यूरोपीय संघ के साथ अमेरिका के व्यापारिक रिश्तों में फिर से तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
भारत के लिए राहत की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से 18% रेसिप्रोकल टैरिफ रद्द हो गया था, लेकिन नया 10% टैरिफ अस्थायी रूप से प्रभावी रहेगा। इससे निर्यात-आधारित उद्योगों पर दबाव बढ़ सकता है, खासकर टेक्सटाइल, ऑटो पार्ट्स और फार्मा सेक्टर पर।
वैश्विक सप्लाई चेन पर भी इसका असर पड़ सकता है। 150 दिनों की यह अवधि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए रणनीतिक अनिश्चितता लेकर आई है, जिससे निवेश और उत्पादन निर्णय प्रभावित हो सकते हैं।
आगे क्या?
- आने वाले दिनों में तीन संभावित परिदृश्य उभर सकते हैं:
- कांग्रेस हस्तक्षेप कर राष्ट्रपति के अधिकारों की सीमा स्पष्ट करे।
- नया टैरिफ भी अदालत में चुनौती का सामना करे।
- 150 दिन की अवधि के भीतर किसी समझौते या संशोधित व्यापार नीति का रास्ता निकले।
- अमेरिका में कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच यह टकराव केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं है; इसका असर वैश्विक व्यापार व्यवस्था पर भी पड़ेगा।
निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट के 6-3 फैसले और उसके तीन घंटे बाद ट्रंप के 10% नए टैरिफ ऐलान ने अमेरिकी राजनीति को एक नए संवैधानिक मोड़ पर ला खड़ा किया है। यह मामला अब सिर्फ टैरिफ नीति का नहीं, बल्कि शक्तियों के संतुलन का बन गया है। आने वाले 150 दिन यह तय करेंगे कि अमेरिका की व्यापार नीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका कितना व्यापक प्रभाव पड़ेगा।
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