दिल्ली और मुंबई समेत कई हवाई अड्डों पर सैकड़ों यात्रियों को असुविधा का सामना करना पड़ा, जब एयरलाइंस द्वारा बुकिंग और चेक-इन के लिए इस्तेमाल की जाने वाली प्रणाली नेविटेयर में 45 मिनट की तकनीकी खराबी आ गई। दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर यह खराबी सुबह करीब 6:45 बजे सामने आई। व्यवधान के दौरान, एयरलाइंस को यात्रियों की जानकारी मैन्युअल रूप से प्रबंधित करनी पड़ी, जिससे सुबह की भीड़भाड़ के समय लंबी कतारें लग गईं। इंडिगो, अकासा एयर और एयर इंडिया एक्सप्रेस समेत कई एयरलाइंस प्रभावित हुईं। सूत्रों ने बताया कि इंडिगो ने लगभग 25 मिनट में अपने सिस्टम को बहाल कर लिया। सूत्रों के अनुसार, नेविटेयर का सिस्टम लगभग दो घंटे बाद सुबह 8:25 बजे तक पूरी तरह से बहाल हो गया।
मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर भी ऐसी ही स्थिति देखने को मिली, जहां नेविटेयर सिस्टम में खराबी के कारण कई यात्रियों ने चेक-इन काउंटरों पर देरी और भीड़भाड़ की शिकायत की। नेविटेयर एयरलाइन आरक्षण, चेक-इन और बोर्डिंग के लिए महत्वपूर्ण तकनीक प्रदान करती है। जब यह सिस्टम विफल हो जाता है, तो एयरलाइनें यात्रियों को कुशलतापूर्वक सेवा देने में असमर्थ हो जाती हैं, जिससे अक्सर देरी और भीड़भाड़ हो जाती है। इस घटना ने पिछले साल नवंबर में हुई एक बड़ी व्यवधान की यादें ताजा कर दीं, जब दिल्ली हवाई अड्डे पर वायु यातायात नियंत्रण प्रणाली में तकनीकी खराबी के कारण 800 से अधिक उड़ानें विलंबित हो गई थीं। दिल्ली हवाई अड्डा, जो भारत का सबसे व्यस्त हवाई अड्डा है, प्रतिदिन 1,500 से अधिक उड़ानों का संचालन करता है, जबकि मुंबई हवाई अड्डा लगभग 1,000 उड़ानों का संचालन करता है।
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साल 2004 में टी20 क्रिकेट सिर्फ एक नई अवधारणा था और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस फॉर्मेट की शुरुआत भी नहीं हुई थी। आज यही प्रारूप वैश्विक क्रिकेट का सबसे आकर्षक और व्यावसायिक रूप बन चुका है। इसी दौर में पाकिस्तान के गुजरांवाला में जन्मे 17 वर्षीय साद बिन जफर अपने परिवार के साथ कनाडा चले गए थे। क्रिकेट उस समय उनके जीवन का लक्ष्य नहीं, बल्कि शिक्षा प्राथमिकता थी।
मौजूद जानकारी के अनुसार साद ने बताया कि परिवार ने उन्हें बेहतर पढ़ाई के लिए कनाडा भेजने का फैसला किया था। उनके पिता चाहते थे कि वह पढ़ाई पर ध्यान दें और क्रिकेट को शौक तक सीमित रखें। शुरुआती वर्षों में उन्होंने पाकिस्तान में स्कूल क्रिकेट खेला, लेकिन पेशेवर करियर बनाने का विचार तब तक स्पष्ट नहीं था।
कनाडा पहुंचने के बाद उन्होंने टोरंटो विश्वविद्यालय से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में स्नातक की डिग्री हासिल की। पढ़ाई के साथ-साथ वह स्थानीय सुपर 9 लीग में क्लब क्रिकेट खेलते रहे और 2008 में कनाडा के लिए अंतरराष्ट्रीय पदार्पण किया। हालांकि 2008 से 2015 के बीच उनका करियर उतार-चढ़ाव भरा रहा। टीम में चयन और बाहर होना लगातार चलता रहा, लेकिन उन्होंने संघर्ष जारी रखा।
गौरतलब है कि 2015 के बाद उन्होंने टीम में अपनी जगह मजबूत की और धीरे-धीरे कनाडा की गेंदबाजी इकाई के अहम सदस्य बन गए। टी20 विश्व कप 2026 में वह टीम के सबसे अनुभवी खिलाड़ी के रूप में उतरे हैं और अब तक चार विकेट लेकर अग्रणी विकेट लेने वाले गेंदबाज भी हैं। चेन्नई के एमए चिदंबरम स्टेडियम में अफगानिस्तान के खिलाफ होने वाले मुकाबले से पहले उन्होंने कहा कि टीम का लक्ष्य अपनी पूरी क्षमता दिखाना है।
साद ने कनाडा को क्वालीफायर के जरिए टी20 विश्व कप तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई और बाद में टूर्नामेंट इतिहास में देश के पहले कप्तान भी बने। उनके नेतृत्व में कनाडा ने 2023 में वनडे दर्जा दोबारा हासिल किया। हालांकि अब वह कप्तान नहीं हैं, लेकिन टीम में एक सीनियर ऑलराउंडर के तौर पर युवाओं का मार्गदर्शन कर रहे हैं।
बता दें कि नवंबर 2021 में उन्होंने टी20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में एक दुर्लभ उपलब्धि हासिल की थी। पनामा के खिलाफ मुकाबले में उन्होंने चार ओवर में एक भी रन नहीं दिया और दो विकेट झटके। इस प्रदर्शन ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग पहचान दिलाई।
क्रिकेट लंबे समय तक कनाडा में पूर्णकालिक पेशा नहीं था। साद बीमा कंपनी में प्रोक्योरमेंट एनालिस्ट के तौर पर काम करते हुए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलते रहे। दौरों के लिए छुट्टी लेना और कभी-कभी यात्रा के दौरान दूरस्थ रूप से काम करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। उन्होंने स्वीकार किया कि कई बार नौकरी और क्रिकेट के बीच चुनाव करना पड़ा, लेकिन उन्होंने क्रिकेट नहीं छोड़ा।
2018 में जीटी20 फाइनल में प्लेयर ऑफ द मैच बनने और फ्रेंचाइजी लीगों में अवसर मिलने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़कर पूरी तरह क्रिकेट पर ध्यान केंद्रित करने का निर्णय लिया। वह कैरेबियन प्रीमियर लीग में भी खेल चुके हैं, जिससे उनके अनुभव में और इजाफा हुआ।
साद बताते हैं कि जब उन्हें राष्ट्रीय टीम में जगह मिली और लगातार प्रदर्शन करने लगे, तब उनके माता-पिता का नजरिया बदला। जो पिता कभी पढ़ाई को प्राथमिकता देने की सलाह देते थे, वही अब उनके करियर पर गर्व महसूस करते हैं। दो दशकों की इस यात्रा में शिक्षा और संघर्ष दोनों साथ-साथ चले और आज वह कनाडा क्रिकेट की पहचान बन चुके हैं।
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