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Jaishankar और Chidambaram की भिड़ंत देखकर मजा आ जायेगा ! Regime Change को लेकर दोनों के बीच हुई गर्मागर्म बहस से चढ़ गया सियासी पारा

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम ने लोकतंत्र में ‘Regime Change’ यानी सत्ता परिवर्तन को सामान्य बताते हुए बीजेपी पर निशाना साधा, तो विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ऐसा जवाब दिया कि बहस का रुख ही बदल गया। जयशंकर ने साफ सवाल उठाया कि अगर विपक्ष का मकसद सिर्फ चुनाव के जरिए सरकार बदलना है, तो फिर बांग्लादेश के आंदोलन का उदाहरण देने और सड़क पर दबाव बनाकर सत्ता परिवर्तन की बात करने की जरूरत क्यों पड़ रही है?

देखा जाये तो जयशंकर का यह पलटवार केवल चिदम्बरम के एक ट्वीट का जवाब नहीं, बल्कि उन विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए भी राजनीतिक संदेश है, जो सरकार के खिलाफ आंदोलन को सत्ता परिवर्तन की मुहिम से जोड़ रहे हैं। बीजेपी और विपक्ष के बीच ‘Regime Change’ को लेकर छिड़ी यह जंग अब लोकतंत्र, चुनाव और सड़कों पर होने वाले आंदोलनों की सीमाओं पर आकर टिक गई है।

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चिदम्बरम ने क्या कहा, जयशंकर ने कहां घेरा?

दरअसल, चिदम्बरम ने अपने ट्वीट में बीजेपी पर तंज कसते हुए पूछा कि ‘Regime Change’ शब्द के इस्तेमाल पर पार्टी इतना बौखला क्यों रही है? उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन सामान्य प्रक्रिया है और विपक्ष का काम सरकार का ‘विरोध करना, पर्दाफाश करना और सत्ता से हटाना’ है। चिदम्बरम ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा कि राजनीति में विरोध, संसद में सरकार को बेनकाब करना और चुनाव के जरिए सत्ता से हटाना विपक्ष की जिम्मेदारी है।

सुनने में चिदम्बरम की दलील लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप लगती है, लेकिन विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बहस को केवल शब्दों के अर्थ तक सीमित रखने से इंकार कर दिया। उन्होंने अपने जवाब में कहा कि ‘लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन सामान्य है’ जैसी नसीहत देने से पहले यह देखना चाहिए कि किस संदर्भ में इस शब्द का इस्तेमाल हो रहा है।

जयशंकर ने सवाल उठाया कि जब प्रशांत भूषण और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की नेता नेहा बोरा बांग्लादेश के Gen Z आंदोलन का हवाला देते हुए सत्ता परिवर्तन की बात करते हैं, तो उसे केवल सामान्य चुनावी राजनीति बताकर कैसे खारिज किया जा सकता है? उन्होंने कहा कि बांग्लादेश के आंदोलन से प्रेरणा लेने और चुनावी प्रक्रिया के जरिए सरकार बदलने की बात करने के बीच एक बुनियादी अंतर है।

बांग्लादेश का उदाहरण देकर विपक्ष खुद घिरा?

देखा जाये तो इस पूरे विवाद की जड़ प्रशांत भूषण का ‘Regime Change’ वाला बयान और नेहा बोरा का बांग्लादेश के Gen Z आंदोलन को प्रेरणास्रोत बताना है। प्रशांत भूषण ने कहा था कि वे सत्ता परिवर्तन चाहते हैं और इसे हासिल करने के लिए संघर्ष करेंगे। वहीं, नेहा बोरा ने बांग्लादेश के आंदोलन की तारीफ करते हुए कहा था कि उसने भारत के युवाओं को रास्ता दिखाया है। इन बयानों ने बीजेपी को विपक्ष पर हमला बोलने का मौका दे दिया।

यहीं जयशंकर ने विपक्ष की दलील पर सबसे तीखा सवाल खड़ा किया। अगर मकसद सिर्फ चुनाव लड़कर सरकार बदलना है, तो बांग्लादेश के आंदोलन का उदाहरण क्यों? चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध को ‘सत्ता परिवर्तन की लड़ाई’ के रूप में पेश करने की जरूरत क्यों? और जब चुनाव में जनता का फैसला ही अंतिम होना चाहिए, तो सड़क के दबाव को सत्ता परिवर्तन का रास्ता बताने की जरूरत क्या है?

जयशंकर का तर्क है कि लोकतंत्र में विरोध करना, सरकार की आलोचना करना और प्रदर्शन करना नागरिकों का अधिकार है। लेकिन इन अधिकारों की चर्चा करते हुए संवैधानिक व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया की अहमियत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने विपक्ष को चेताया कि भारत में अगली सरकार का फैसला किसी आंदोलन के दबाव से नहीं, बल्कि मतदाताओं के वोट से होना चाहिए।

विपक्ष को आईना: चुनाव में चुनौती दीजिए, सड़क को विकल्प मत बनाइए

देखा जाये तो चिदम्बरम की ‘Oppose, Expose and Depose’ वाली लाइन राजनीतिक रूप से आकर्षक जरूर है, लेकिन जयशंकर के जवाब ने इस नारे के तीसरे हिस्से पर ही बहस खड़ी कर दी है। सरकार का विरोध कीजिए, उसकी नीतियों का पर्दाफाश कीजिए और उसे सत्ता से हटाना चाहते हैं तो जनता के बीच जाइए, चुनाव लड़िए और जनादेश हासिल कीजिए। लेकिन सत्ता परिवर्तन की मांग के साथ ऐसे आंदोलनों का उदाहरण देना, जिनके परिणामस्वरूप किसी देश की निर्वाचित सरकार सत्ता से बाहर हो गई, एक अलग राजनीतिक संदेश भी दे सकता है।

यही वह बिंदु है, जहां कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। क्या उनकी लड़ाई चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची और चुनावी पारदर्शिता जैसे मुद्दों तक सीमित है या वे इसे मौजूदा सरकार को सत्ता से हटाने के व्यापक आंदोलन में बदलना चाहते हैं? सरकार की आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन आलोचना और राजनीतिक अस्थिरता के बीच अंतर बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।

2029 की लड़ाई का ट्रेलर या लोकतंत्र की नई बहस?

देखा जाये तो एस. जयशंकर ने अपने ट्वीट में स्पष्ट संदेश दिया कि भारत और बांग्लादेश की राजनीतिक परिस्थितियों को एक जैसा नहीं माना जा सकता। उन्होंने जोर दिया कि भारत की संस्थाएं, मतदाता और संविधान ही देश की अगली सरकार तय करेंगे, न कि सड़कों पर होने वाला ऐसा प्रदर्शन जिसे चुनावी जनादेश के विकल्प के तौर पर पेश किया जाए। अब सवाल चिदम्बरम और विपक्ष के सामने है। यदि ‘Depose’ का अर्थ चुनाव में हराकर सत्ता से हटाना है, तो इसे लेकर विवाद की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। लेकिन यदि बांग्लादेश के आंदोलन को भारत में सत्ता परिवर्तन का मॉडल बताकर पेश किया जाएगा, तो उसके राजनीतिक निहितार्थ पर सवाल उठना भी स्वाभाविक है।

बहरहाल, जयशंकर ने विपक्ष को यह संदेश देने की कोशिश की है कि लोकतंत्र में सरकार बदलने की इच्छा रखना और सरकार बदलने का संवैधानिक रास्ता छोड़ देना, दो बिल्कुल अलग बातें हैं। अब विपक्ष को अपने बयानों से आगे बढ़कर यह स्पष्ट करना होगा कि उसकी ‘Regime Change’ की लड़ाई मतपेटी तक सीमित है या वह सड़कों के दबाव को भी सत्ता परिवर्तन के हथियार के रूप में देखता है। यही इस राजनीतिक टकराव का सबसे अहम सवाल है।

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UP Election 2027: संविधान दिवस पर Akhilesh Yadav जारी करेंगे SP का जन-मन घोषणापत्र

समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने घोषणा की है कि 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले, पार्टी 26 नवंबर यानी 'संविधान दिवस' के मौके पर 'जन-मन घोषणापत्र' जारी करेगी। 'सत्ताईस का संकल्प' (Resolve of Twenty-Seven) नाम का यह घोषणापत्र PDA की आकांक्षाओं को दर्शाएगा। PDA एक ऐसा गठबंधन है जो पिछड़ा (पिछड़े वर्ग), दलित और अल्पसंख्यक समुदायों का प्रतिनिधित्व करता है।

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सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर अखिलेश यादव ने कहा कि सत्ताईस का संकल्प: PDA का घोषणापत्र। 26 नवंबर को 'संविधान दिवस' के पवित्र लोकतांत्रिक अवसर पर, हम 'जन-मन घोषणापत्र' जारी करेंगे। यह घोषणा ऐसे समय में आई है जब उत्तर प्रदेश अगले साल होने वाले चुनावों की तैयारी कर रहा है, और समाजवादी पार्टी इन चुनावों के लिए अपनी विस्तृत योजनाएं और पहल सामने रखने की तैयारी में है। 2027 का मुकाबला मुख्य रूप से भारतीय जनता पार्टी (BJP) और समाजवादी पार्टी (SP) के बीच होने की उम्मीद है।

उत्तर प्रदेश की मौजूदा विधानसभा में 403 निर्वाचित सदस्य हैं: इनमें से 258 BJP से, 107 SP से और 13 अपना दल से हैं। समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करने वाली कांग्रेस, 2022 के चुनावों में खराब प्रदर्शन के बाद राज्य में अपनी स्थिति फिर से मजबूत करना चाहती है; 2022 में कांग्रेस ने चुनाव लड़ी गई 399 सीटों में से केवल दो सीटें जीती थीं। 2022 में, अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी ने 32.06 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 111 सीटें हासिल कीं और BJP के बाद दूसरे स्थान पर रही।

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बहुजन समाज पार्टी (BSP) और इंडियन नेशनल कांग्रेस जैसी अन्य प्रमुख पार्टियां दहाई के आंकड़े तक भी नहीं पहुंच सकीं। BSP ने एक सीट जीती और उसे 12.88 प्रतिशत वोट मिले। वहीं, AIMIM, जिसे 2022 में कोई सीट नहीं मिली थी, अब मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन को मजबूत करने की योजना बना रही है, ताकि वह 2025 के बिहार चुनावों जैसी सफलता को यहां भी दोहरा सके।

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  Sports

टीम इंडिया को मिला नया चीफ सिलेक्‍टर, BCCI ने किया अगरकर के रिप्‍लेसमेंट का ऐलान, स्‍टार स्पिनर को मिली कमान

Pragyan Ojha Replace Ajit Agarkar as Chief Selector: बीसीसीआई ने अजीत अगरकर का कार्यकाल समाप्त होने के बाद पूर्व स्पिनर प्रज्ञान ओझा को मेंस सिलेक्शन कमेटी का नया चेयरपर्सन नियुक्त किया है. इसके साथ ही, पूर्व भारतीय स्पिनर रमेश पवार को चयन समिति का नया सदस्य बनाया गया है. पवार के पास महिला टीम की कोचिंग का शानदार अनुभव है. अगरकर के नेतृत्व में भारत ने कई ऐतिहासिक ट्रॉफियां जीती हैं, और अब यह नई टीम भारतीय क्रिकेट के भविष्य की दिशा तय करेगी. Mon, 19 Oct 2026 16:41:41 +0530

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'सपा के लोगों बरनोल लगेगा' Rampur में बोले Asaduddin Owaisi | #shorts #viralshorts #tmktech #vivo #v29pro
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