मानसिक तनाव और Anxiety से राहत दिलाती है ACT Therapy, समझें इसके 6 स्टेप्स
भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव, चिंता और नकारात्मक भावनाएं बहुत आम हो चुकी है। आमतौर पर महिलाओं पर घर, परिवार और करियर की जिम्मेदारियों का दोहरी दबाव होता है। बार-बार मन में नकारात्मक विचार आना। इन मानसिक चुनौतियों से निपटने के लिए 'एक्सेप्टेंस एंड कमिटमेंट थेरेपी' यानी ACT थेरेपी एक बेहद कारगर तरीका बनकर उभरा है।
असल में यह तरीका आपको अपनी भावनाओं से लड़ने के बजाय उन्हें स्वीकार करना सिखाती है, जिससे आप अपने जीवन के मूल्यों के अनुसार एक बेहतरीन रास्ता का चूज कर सके।
क्या है एक्सेप्टेंस एंड कमिटमेंट थेरेपी (ACT)?
ACT एक प्रकार से मनोचिकित्सा है। इसका मुख्य उद्देश्य नकारात्मक विचारों और भावनाओं को बदलने के जगह उनके साथ सही तालमेल बिठाना है। वैसे यह थेरेपी दो मुख्य बातों पर काम करती हैं-
-स्वीकार करना (Acceptance): असल में यह समझना होगा कि किसी मुश्किल परिस्थिति में उदासी या गुस्सा होना बिल्कुल स्वाभाविक है।
- प्रतिबद्धता (Commitment): अपनी प्राथमिकताओं और मूल्यों के आधार पर जीवन में सकारात्मक बदलाव करने का संकल्प जरुर लें।
गौरतलब है कि हमारा दिमाग हमेशा नकारात्मक विचारों को दोहराता है। उदाहरण के तौर पर किसी भी ऑफिस की मीटिंग से पहले अगर आप सोचती हैं कि "मैं बहुत घबरा रही हूं और सब खराब हो जाएगा", तो ACT थेरेपी इस सोच को बदलने में मदद करती है। यदि आप सोच रहे हैं कि 'घबराहट होना नॉर्मल है, मैं थोड़ी प्रैक्टिस कर लेती हूं, जिससे बेहतर प्रदर्शन दे सकूं।"
किन मानसिक समस्याओं में मददगार है यह थेरेपी?
-तनाव और अत्यधिक चिंता (Anxiety)
-डिप्रेशन और उदासी
-ईटिंग डिसऑर्डर और ओसीडी (OCD)
-पुराना आघात या पीटीएसडी (PTSD)
- किसी गंभीर या पुरानी बीमारी के कारण होने वाला मानसिक तनाव
ACT कैसे काम करता है?
इस थेरेपी के 6 मुख्य स्टेप्स है-
स्वीकार करना (Acceptance): ध्यान रखें कि हर तरह की अच्छी या बुरी भावनाओं को बिना खुद को कोसे स्वीकार करना।
विचारों से दूरी बनाना (Cognitive Defusion): आपको समझना होगा कि विचार सिर्फ मन के ख्याल हैं, कोई अंतिम सच नहीं है।
वर्तमान में जीना (Being Present): भविष्य की बिना चिंता किए हुए सिर्फ आज पर ध्यान देना।
खुद को समझना (Self-as-context): असल में यह महसूस करना कि आपकी पहचान आपके दुखों या विचारों से कहीं बड़े हैं।
अपने मूल्यों को तय करना(Values): आपको यह तय करना होगा कि आपके लिए जीवन में वास्तव में क्या महत्वपूर्ण है।
लक्ष्य के लिए काम करना (Committed Action): जो आपके मूल्यों से मेल खाए, उनके लिए ठोस कदम उठाए।
ACT थेरेपी से मिलने वाले फायदे
- मानसिक स्पष्टता और शांति मिलती है।
- डिप्रेशन, घबराहट और तनाव के लक्षण कम होते हैं।
- मुश्किल परिस्थितियों में सही फैसले लेने की क्षमता बढ़ती है।
- जीवन की क्वालिटी और काम करने की क्षमता में काफी सुधार आता है।
Diabetes और High BP से कमजोर हो सकती है आंखों की रोशनी, Blood Sugar रखें कंट्रोल
खानपान और लाइफस्टाइल से जुड़ी गड़बड़ी ने कई तरह की क्रॉनिक बीमारियों के खतरे को काफी बढ़ा दिया है। लिहाजा कई बीमारियां जो पहले के समय नें बढ़ती उम्र के साथ हुआ करती थी, वह कम उम्र वालों में भी देखी जा रही है। इनमें से एक दिक्कत आखों की है। अब कम उम्र में आंखों की रोशनी कम होने और चश्मा लगने की समस्या बेहद आम बात हो गई हैं। आंखों की रोशनी कम होने के पीछे कई वजह हो सकती हैं।
शरीर में मौजूद कुछ बीमारियों के कारण धीरे-धीरे आंखों को भी नुकसान हो रहा है। डायबिटीज इसका एक बड़ा उदाहरण है। लंबे समय तक हाई ब्लड शुगर की समस्या होने पर आंखों के पीछे मौजूद रेटिना की छोटी ब्लड वेसेल्स को नुकसान होता है। जिस कारण डायबिटिक रेटिनोपैथी जैसी समस्या हो सकती है। वहीं डायबिटीज से ग्लूकोमा और मोतियाबिंद का भी जोखिम बढ़ जाता है। ठीक उसी तरह हाई बीपी की समस्या भी आंखों की ब्लड वेसेल्स को नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आंखों की बढ़ती समस्याओं के पीछे की बीमारियों के बारे में बताने जा रहे हैं।
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डायबिटीज वालों में अधिक खतरा
लंबे समय तक ब्लड शुगर हाई रहने की वजह से आंख की रेटिना की ब्लड वेसेल्स को नुकसान हो सकता है। इसको डायबिटिक रेटिनोपैथी कहा जाता है।
हालांकि शुरूआत में इसका कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखता है। हालांकि समय के साथ आपकी रोशनी धुंधली दिखने लगे, आंखों के सामने धब्बे या रोशनी कम होने जैसी समस्या हो सकती है।
डायबिटीज वाले लोगों में ग्लूकोमा और मोतियाबिंद का खतरा बढ़ा हुआ देखा जाता रहा है।
डायबिटीज के शिकार लोगों को आंखों से जुड़ी समस्या को कम करने के लिए ब्लड शुगर को कंट्रोल में रखने के साथ-साथ साल में कम से कम 1 बार आंखों की जांच जरूर कराना चाहिए।
हाई ब्लड प्रेशर की समस्या
लगातार ब्लड प्रेशर बढ़े रहने से शरीर की रक्त वाहिकाओं पर दबाव पड़ता है। आंखों में मौजूद छोटी रक्त वाहिकाएं भी इससे प्रभावित हो सकती हैं। इसलिए हाई बीपी वाले लोगों को नियमित रूप से अपना ब्लड प्रेशर कंट्रोल रखना चाहिए।
अगर आपकी आंखों की रोशनी अचानक से धुंधली हो जाती है, आंखों के सामने अचानक धब्बे दिखाई दें या नजर में अचानक बदलाव महसूस होने लगे, तो इसको सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
आंखों की समस्या होने के अलावा ब्लड प्रेशर हाई रहने पर फौरन डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।
ग्लूकोमा और मोतियाबिंद की समस्या होना
ग्लूकोमा बीमारी आंख की ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचाती है। अगर इसका समय पर इलाज नहीं हो, तो इससे धीरे-धीरे नजर कमजोर हो सकती है। वहीं मोतियाबिंद की समस्या होने पर आंखों का प्राकृतिक लेंस धुंधला होने लगता है। जिस कारण देखने में परेशानी होती है।
उम्र बढ़ने के साथ मोतियाबिंद का खतरा बढ़ जाता है। डायबिटीज वाले लोगों में इन दोनों तरह की समस्याओं का जोखिम ज्यादा रहता है। आंखों में लगातार रोशनी के आसपास घेरा, लगातार धुंधलापन या नजर में बदलाव जैसे लक्षण होने पर जांच करना चाहिए।
लक्षण न हों तब भी आंखों की जांच कराएं
आंखों की कुछ गंभीर बीमारियां ऐसी भी हो सकती हैं, जो बिना किसी शुरूआती लक्षण के बढ़ती हैं। डायबिटिक रेटिनोपैथी इसका उदाहरण है। इसलिए सिर्फ नजर कम होने पर ही आंखों की जांच नहीं करानी चाहिए, बल्कि डायबिटीज से पीड़ित लोगों को भी नियमित रूप से आई चेकअप कराते रहना चाहिए।
ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर को कंट्रोल में रखना, धूम्रपान से दूरी बनाना और डॉक्टर की बताई गई जांच कराना आंखों की रोशनी को बचाए रखने में सहायता कर सकता है।
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