Home Loan Tips: दो होम लोन की ईएमआई से परेशान? जानिए कैसे दोनों को एक में मिलाया जा सकता
Home Loan Tips: पहले घर के लिए एक होम लोन लिया। कुछ साल बाद दूसरा घर खरीदा या बेहतर ब्याज दर के लिए लोन ट्रांसफर किया। देखते-देखते दो ईएमआई, 2 ब्याज दरें, दो स्टेटमेंट और दो बैंकों से डीलिंग शुरू हो गई। कागज पर यह आसान लगता है, लेकिन असल जिंदगी में हिसाब रखना मुश्किल हो जाता है।
यहीं से दो होम लोन को एक में मिलाने का विकल्प सामने आता है। एक बैंक, एक ईएमआई और एक ही स्टेटमेंट। सुनने में आसान, लेकिन फैसला लेने से पहले पूरा गणित समझना जरूरी है।
लोग लोन क्यों मिलाना चाहते हैं?
सबसे बड़ा कारण है ब्याज दर। मान लीजिए एक लोन 9.25 फीसदी पर है और दूसरा 8.70% पर। अगर मौजूदा दर 8.30% मिल रही, तो दोनों लोन एक ही बैंक में ट्रांसफर कर कम ब्याज पर लिया जा सकता। इससे कुल ब्याज का बोझ घट सकता।
दूसरा कारण है आसान मैनेजमेंट। अलग-अलग तारीख की दो ईएमआई मिस होने का खतरा बढ़ाती हैं। एक लोन होने से यह जोखिम कम होता है। कुछ लोग कैश फ्लो सुधारने के लिए भी ऐसा करते हैं। अगर नए ढांचे में ईएमआई थोड़ी कम हो जाए तो महीने का दबाव घट सकता है।
कैसे होता है कंसोलिडेशन?
आमतौर पर यह बैलेंस ट्रांसफर के जरिए होता है। आप किसी बैंक या हाउसिंग फाइनेंस कंपनी से संपर्क करते हैं, जो आपके दोनों लोन की बकाया राशि अपने यहां ट्रांसफर करने को तैयार हो।
बैंक आपकी आय, क्रेडिट स्कोर, प्रॉपर्टी के कागजात और मौजूदा लोन स्टेटमेंट जांचता है। मंजूरी मिलने पर वह संयुक्त बकाया राशि का नया सैंक्शन लेटर जारी करता है। फिर नया बैंक पुराने बैंकों को भुगतान कर देता है और दोनों पुराने लोन बंद हो जाते हैं। इसके बाद आप सिर्फ एक ईएमआई भरते हैं।
किन बातों का रखें ध्यान?
सबसे पहले ब्याज दर का फर्क देखें। एक चौथाई फीसदी की मामूली कमी शायद प्रोसेसिंग फीस, लीगल चार्ज और वैल्यूएशन फीस के मुकाबले फायदेमंद न हो। लेकिन 0.75% या उससे ज्यादा की कमी बड़े लोन पर लंबी अवधि में अच्छी बचत दे सकती। दूसरा, अवधि यानी टेन्योर देखें। अगर एक लोन में सिर्फ 5 साल बाकी हैं और नया लोन 20 साल के लिए ले लेते हैं, तो ईएमआई भले घटे, कुल ब्याज बढ़ सकता है। सिर्फ ईएमआई कम होने के झांसे में न आएं। हमेशा कुल चुकाए जाने वाले ब्याज की तुलना करें।
टैक्स का भी रखें ध्यान
अगर एक घर खुद के रहने के लिए है और दूसरा किराए पर, तो टैक्स में छूट का तरीका अलग होता है। लोन मिलाने के बाद भी रिकॉर्ड साफ रखें कि किस प्रॉपर्टी पर कितना लोन है, ताकि आयकर छूट सही मिल सके। जरूरत पड़े तो टैक्स एक्सपर्ट से सलाह लें। जब आपको साफ तौर पर कम ब्याज दर मिले और आप लंबे समय तक उसी लोन के साथ बने रहने वाले हों। अगर ब्याज में मामूली फर्क है और चार्ज ज्यादा हैं, तो सिर्फ सुविधा के लिए ज्यादा खर्च करना समझदारी नहीं।
दो होम लोन को एक में मिलाना जिंदगी आसान बना सकता है और पैसे भी बचा सकता है। लेकिन फैसला लेने से पहले पूरा हिसाब जरूर लगाएं। सुविधा अच्छी है, लेकिन लंबी अवधि की लागत उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है।
(प्रियंका कुमारी)
ITR Refund Rule: आईटीआर रिफंड पर ब्याज क्यों नहीं मिला? जानिए इनकम टैक्स कानून क्या कहता
ITR Refund Rule: पिछले कुछ दिनों में बड़ी संख्या में टैक्सपेयर्स को उनका इनकम टैक्स रिफंड मिला है। कई मामलों में रकम भी बड़ी है। लेकिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कई लोगों ने शिकायत की है कि उन्हें रिफंड तो मिला, पर उस पर मिलने वाला ब्याज नहीं जोड़ा गया। तो सवाल है कि सरकार रिफंड पर ब्याज कैसे और कब देती है?
टैक्स एक्सपर्ट्स के मुताबिक, कानून के तहत टैक्सपेयर्स को साधारण ब्याज 0.50% हर महीने या उसके हिस्से के हिसाब से मिलता है। यह ब्याज उस असेसमेंट ईयर की 1 अप्रैल से लेकर रिफंड मिलने की तारीख तक जोड़ा जाता है। एक्सपर्ट्स बताते हैं कि अगर रिटर्न तय तारीख के बाद फाइल किया गया है, तो ब्याज सिर्फ फाइलिंग की तारीख से लेकर रिफंड मिलने तक ही मिलेगा। लेकिन हर केस में ब्याज मिलना जरूरी नहीं है। टैक्स एक्सपर्ट्स के मुताबिक, कुछ स्थितियों में ब्याज कम या बिल्कुल नहीं मिलता।
- जैसे -अगर रिफंड की रकम धारा 143(1) के तहत तय टैक्स की 10% से कम है, तो ब्याज नहीं मिलेगा।
- अगर रिटर्न धारा 139(1) की तय तारीख के बाद फाइल किया गया है, तो ब्याज सीमित अवधि के लिए मिलेगा।
- अगर रिफंड में देरी टैक्सपेयर्स की वजह से हुई है, तो उस अवधि का ब्याज काट दिया जाएगा।
अब अगर किसी को लगे कि ब्याज कम मिला है तो क्या करें?
सबसे पहले अपने ई-फाइलिंग पोर्टल पर दर्ज ईमेल और मोबाइल नंबर चेक करें। हो सकता है विभाग की तरफ से कोई सूचना आई हो। रिटर्न प्रोसेस होने के बाद धारा 143(1) के तहत इंटिमेशन जारी होता है। इसमें टैक्सपेयर्स और विभाग की गणना का पूरा ब्यौरा होता है, जिससे गलती का पता चल सकता है।
कानून कहता है कि टैक्सपेयर्स को रिफंड की वास्तविक तारीख तक ब्याज मिलना चाहिए। अगर 143(1) की इंटिमेशन और रिफंड मिलने की तारीख के बीच ज्यादा देरी हुई है, तो सीपीसी में रेक्टिफिकेशन एप्लिकेशन देकर अतिरिक्त ब्याज की मांग की जा सकती है।
रिफंड में देरी के कारण भी समझ लें-
- ITR और फॉर्म 26AS या AIS में आंकड़ों का अंतर
- बैंक अकाउंट की गलत जानकारी या वैलिडेशन न होना
- बिना पात्रता के डिडक्शन या छूट का दावा
- आईटीआर समय पर ई-वेरिफाई न करना
- बड़े या असामान्य ट्रांजैक्शन की जांच
- विभाग की आंतरिक या सिस्टम संबंधी देरी
ITR फाइल करना ही काफी नहीं है। प्रोफाइल में सही ईमेल और मोबाइल नंबर अपडेट रखें ताकि विभाग की हर सूचना समय पर मिले। अगर पुराने टैक्स डिमांड से एडजस्टमेंट होना है, तो विभाग को पहले जानकारी देना और आपत्ति सुनना जरूरी है।
(प्रियंका कुमारी)
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