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गलत वजह से चर्चा में पाकिस्तान का ये जिला, 9 महीने के भीतर 122 लोगों ने की आत्महत्या

इस्लामाबाद, 18 अक्टूबर (आईएएनएस)। पाकिस्तान के सिंध प्रांत का एक जिला गलत वजहों से चर्चा में है। जिले का नाम थारपारकर है और खुदकुशी दर में बढ़ोतरी इसकी पहचान हो गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जनवरी से सितंबर के बीच यहां122 लोगों ने आत्महत्या कर ली।

1,778,407 की आबादी और सात तालुकों में फैले होने के बावजूद, थारपारकर में विशेष मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बहुत सीमित है। जिले के दूर-दराज के गांवों में रहने वाले लोगों को स्टाफ की कमी, पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव और जर्जर सड़कों के कारण चिकित्सा और मनोवैज्ञानिक सहायता पाने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

द फ्राइडे टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के स्वास्थ्य विभाग ने थारपारकर में लोगों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए दो प्रशिक्षित पेशेवरों को नियुक्त किया है।

बार-बार पड़ने वाले सूखे ने थारपारकर के लोगों की समस्याओं को और बढ़ा दिया है। थारपारकर के ग्रामीण इलाकों में अधिकांश परिवार अपनी आजीविका के लिए बारिश और पशुधन पर निर्भर हैं, जिससे वे पानी की कमी, जलवायु परिवर्तन, फसल खराब होने और पशुओं के नुकसान के प्रति बेहद संवेदनशील हो जाते हैं।

सूखा पीड़ितों को अक्सर कृषि कार्यों और दिहाड़ी मजदूरी की तलाश में संघार, मीरपुरखास और बदिन जिलों के सिंचित क्षेत्रों (बैराज क्षेत्रों) की ओर पलायन को मजबूर होना पड़ता है। इससे जिले में पारिवारिक जीवन और सामुदायिक संबंध बाधित होते हैं।

थारपारकर में पुरुष अक्सर काम की तलाश में अकेले पलायन कर जाते हैं। हालांकि, सूखे और अकाल जैसी स्थितियों के दौरान, पीने के पानी, भोजन और आजीविका के अवसरों की तलाश में कभी-कभी पूरे परिवार भी अपने गांव छोड़ देते हैं। इस तरह के विस्थापन से थारपारकर के लोगों के मन में मानसिक तनाव, असुरक्षा और अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता पैदा होती है।

द फ्राइडे टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, थारपारकर में बच्चे गरीबी और पलायन से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। बार-बार होने वाला विस्थापन उनकी पढ़ाई पर असर डालता है, और आर्थिक तंगी के कारण उन्हें अक्सर स्कूल छोड़कर अपने परिवारों की मदद के लिए काम करना पड़ता है।

थारपारकर में महिलाओं को भी कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है; उन्हें पीने का पानी लाने और खाना पकाने के लिए ईंधन (लकड़ी) इकट्ठा करने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। साथ ही, उन्हें कपास की कटाई जैसे कृषि कार्यों के जरिए अपने परिवारों का भरण-पोषण भी करना पड़ता है। इन जिम्मेदारियों के अलावा, गरीबी के कारण स्वास्थ्य संकट भी पैदा होता है।

कुछ मामलों में, थारपारकर की महिलाओं को घरेलू हिंसा के कारण शारीरिक और मानसिक तनाव का भी सामना करना पड़ता है। अली नवाज रहीमू ने द फ्राइडे टाइम्स की एक रिपोर्ट में कहा, हालांकि आत्महत्या एक गंभीर समस्या है और इसे किसी एक कारण से नहीं जोड़ा जा सकता, लेकिन थारपारकर में लगातार गरीबी, बेरोजगारी, पारिवारिक कलह, सामाजिक दबाव, विस्थापन और मानसिक स्वास्थ्य के लिए अपर्याप्त मदद लोगों में मानसिक परेशानी का कारण बन सकते हैं। फिर भी, थारपारकर में आत्महत्या के मामलों में हुई बढ़ोतरी के पीछे के वास्तविक कारणों का पता लगाने के लिए केवल अनुमान लगाने के बजाय, गहन शोध की आवश्यकता है। सही स्थिति को समझने के लिए थारपारकर के पिछले वर्षों के आंकड़ों से तुलना करना भी जरूरी है।

रिपोर्ट के अनुसार, सिंध सरकार को थारपारकर में अस्पतालों और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों पर मनोचिकित्सकों, मनोवैज्ञानिकों और परामर्शदाताओं (काउंसलरों) की नियुक्ति करके स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना चाहिए। सरकार को ऐसी जगहों पर मोबाइल मेंटल हेल्थ टीम और रेफरल सेवाएं शुरू करनी चाहिए, जहां परिवहन की सुविधा कम है और लोगों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सीमित है। इसके अलावा, अधिकारियों को लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े सामाजिक कलंक (स्टिग्मा) को कम करने और मानसिक तनाव के शुरुआती लक्षणों को पहचानने में लोगों की मदद करने के लिए सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने चाहिए।

--आईएएनएस

केआर/

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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Explainer: इजरायल के चुनावों में सभी दलों के लिए कितना अहम है फिलिस्तीन का मुद्दा?

Explainer: इजरायल में 27 अक्टूबर को आम चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में हर कोई ये जानने को उत्सुक है कि क्या इजरायल में भी भारत की तरह देशभक्ति को लेकर संसदीय चुनाव में लोग मतदान करते हैं. जहां भारत के संसदीय चुनाव में देशभक्ति और पाकिस्तान बेहद अहम मुद्दा माना जाता है तो इजरायल के चुनावों में भी देशभक्ति बहुत बड़ा मुद्दा बन गया है.

दरअसल, फिलिस्तीनी राज्य को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिल रही बढ़ती मान्यता और गाजा में इजरायल द्वारा नरसंहार किए जाने के संयुक्त राष्ट्र निष्कर्ष के बीच इजराइल में 27 अक्टूबर के संसदीय चुनाव होने वाले हैं. इस चुनाव में मुख्य उम्मीदवार फिलिस्तीनी स्वतंत्रता के खिलाफ प्रचार कर रहे हैं और अधिक सैन्य कार्रवाई का वादा कर रहे हैं.

नेतन्याहू की पार्टी ने गाजा और वेस्ट बैंक में सख्ती का लिया संकल्प

इजरायल के आम चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके दक्षिणपंथी गठबंधन ने गाजा और कब्जे वाले वेस्ट बैंक में अपनी नीतियों को और सख्ती से लागू करने का संकल्प लिया है. वहीं, विपक्ष के प्रमुख नेता भी फिलिस्तीनी राज्य के विचार को खारिज करते हैं.

वे गाजा में हुई तबाही के लिए नेतन्याहू की आलोचना करने के बजाय, हमास को खत्म करने में उनकी विफलता को लेकर उन पर निशाना साध रहे हैं, यानी इजरायल में सत्ताधारी और विपक्षी दोनों दलों के लिए फिलिस्तीन बेहद बड़ी मुद्दा है. ऐसे में दोनों ही दल फिलिस्तीन की आजादी के खिलाफ चुनाव प्रचार कर रहे हैं.

विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच फिलिस्तीनी क्षेत्रों के विलय, बस्तियों के विस्तार और फिलिस्तीनी इलाकों के प्रशासन को लेकर अलग-अलग राय है. लेकिन उनके रुख से यह संकेत मिलता है कि अगर नेतन्याहू की जगह कोई और आता भी है, तो भी उन नीतियों में बदलाव आने की संभावना कम है.

जिन्होंने कब्जे को लंबा खींचा है और फिलिस्तीनियों को उनकी संप्रभुता से वंचित रखा है. इस बार के संसदीय चुनाव में विपक्षी दलों के गठबंधन को 50 सीटें और नेतन्याहू के मौजूदा गठबंधन को 47 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है. लेकिन दोनों ही आंकड़े बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटों से कम हैं.

2022 में सत्ता में आई लिकुड पार्टी

नेतन्याहू की लिकुड पार्टी दिसंबर 2022 में सत्ता में आई सरकार का नेतृत्व कर रही है, जिसने गाजा को तबाह करने और सैन्य अभियान में लगभग 75,000 लोगों की जान ले ली. नेतन्याहू पर कथित युद्ध अपराधों और मानवता के विरुद्ध अपराधों, जिनमें भुखमरी को युद्ध के तरीके के रूप में इस्तेमाल करना भी शामिल है. जिसके लिए उनके खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय का गिरफ्तारी वारंट जारी है. फिर भी उनकी पार्टी 18 संभावित सीटों के साथ दूसरे स्थान पर है.

गाजा के मुद्दे पर, उनका कहना है कि इजरायली सेना द्वारा कब्जा समाप्त करने से पहले हमास को पूरी तरह से निरस्त्र होना होगा. लिकुड पार्टी फिलिस्तीनी राज्य को एक सुरक्षा खतरा बताती है और विपक्षी नेताओं पर इसका समर्थन करने का आरोप लगाती है, जबकि वे स्पष्ट रूप से इसका विरोध करते हैं.

नेतन्याहू की सरकार ने कब्जे वाले वेस्ट बैंक में बस्तियों के विस्तार में तेजी लाई है, साथ ही मंत्री निर्माण को फिलिस्तीनी स्वतंत्रता को रोकने के साधन के रूप में दिखा रहे हैं. सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण में, नेतन्याहू ने वेस्ट बैंक में फिलिस्तीनियों के खिलाफ इजरायली कब्जेदार हिंसा की रिकॉर्ड स्तर की खबरों को "मुट्ठी भर युवा किशोर अपराधियों" का मामला बताकर खारिज कर दिया था.

रिलिजियस जायनवाद ने किया बस्तियों के विस्तार का वादा

इजरायल के वित्त मंत्री बेजलेल स्मोट्रिच की पार्टी 'रिलिजियस जायनवाद' (Religious Zionism)- जो नेतन्याहू के गठबंधन में एक कट्टर दक्षिणपंथी सहयोगी है- को अनुमानित 6 सीटें मिली हैं. यह पार्टी एक बार फिर नेतन्याहू को सरकार चलाने में मदद कर सकती है. सितंबर में एक पॉडकास्ट पर बोलते हुए, स्मोट्रिच ने फिलिस्तीनी प्राधिकरण को खत्म करने और इजरायल के विनाशकारी युद्ध को वेस्ट बैंक तक ले जाने की वकालत की थी. उन्होंने कहा था, "वहां भी वही करें जो हमने गाजा में किया है." उन्होंने गाजा के उस इलाके को भी इजरायल में मिलाने की मांग की, जिस पर अभी इजरायल का कब्ज़ा है.

सितंबर 2025 में पेश किए गए एक प्रस्ताव के तहत, वेस्ट बैंक को लेकर उनके एजेंडे में वहां के लगभग 82% इलाके को इजरायल में मिलाना शामिल है. इससे फिलिस्तीनी लोग एक एकजुट राज्य के बजाय अलग-अलग बिखरे हुए इलाकों में सिमट कर रह जाएंगे. इस रणनीति का मुख्य घोषित लक्ष्य एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की संभावना को हमेशा के लिए खत्म करना है. 

'ज्यूइश पावर' (Jewish Power):

'ज्यूइश पावर' फिलिस्तीन में बड़े पैमाने पर लोगों को बेदखल करना चाहती है. जिसे पार्टी ने 'स्वैच्छिक पलायन' का नाम दिया गया है. राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-गवीर की पार्टी 'ज्यूइश पावर'- जो गठबंधन में एक और कट्टर दक्षिणपंथी सहयोगी है को अनुमानित 8 सीटें मिली हैं. सितंबर में एक चुनावी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान, बेन-गवीर ने गाजा से 18.6 लाख फिलिस्तीनियों को सात साल के भीतर विस्थापित करने की योजना पेश की. उन्होंने इसे "स्वैच्छिक पलायन" का नाम दिया.

बेन-गवीर फिलिस्तीनियों के स्वशासन के बजाय गाजा में इजरायली बस्तियों को फिर से बसाने की वकालत करते हैं. उन्होंने फिलिस्तीनी कैदियों को मिलने वाले भोजन में कटौती जैसे कठोर कदमों का भी बचाव किया है. अगस्त 2026 में, उन्होंने इजरायली सेना से गाजा में हर रात "30 से 40" लोगों को मारने के लिए कहा, और साथ ही यह भी दावा किया कि "पूरा गाजा" इजराइल का है.

यशार के आइसेनकोट ने फिलिस्तीनी संप्रभुता को खारिज किया

पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाले 'यशार' गठबंधन को चुनावों में 20 सीटें मिलने का अनुमान है, जिससे वे विपक्षी सरकार का नेतृत्व करने के प्रमुख दावेदार बन गए हैं. 15 अक्टूबर को गाजा के पास बोलते हुए, आइसेनकोट ने प्रधानमंत्री बनने के 18 महीनों के भीतर हमास के शासन को खत्म करने का वादा किया. उन्होंने कहा कि यह काम या तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ढांचे के जरिए या फिर सैन्य कार्रवाई से किया जाएगा. इससे इस बात की संभावना बनी रहती है कि इस इलाके में इजरायली सेना आगे भी सैन्य अभियान चला सकती है.

11 अक्टूबर को 'चैनल 7' के एक पॉडकास्ट में, आइसेनकोट ने 'दो लोगों के लिए दो राज्यों' (टू-स्टेट सॉल्यूशन) के सिद्धांत को खारिज करते हुए कहा कि "यह एक गलती है." वे लाखों फिलिस्तीनियों को इजरायल में शामिल करने का भी विरोध करते हैं. उनका कहना है कि वे इजरायल में यहूदी बहुमत को मजबूत बनाए रखना चाहते हैं.

टुगेदर: बेनेट और लैपिड ने फिलिस्तीनी राज्य के गठन का विरोध किया

पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड के 'टुगेदर' गठबंधन को 12 सीटें मिलने का अनुमान है. यह गठबंधन विपक्षी खेमे में एक अहम साझेदार के रूप में उभर सकता है. गाजा के भविष्य को लेकर दोनों के बीच मतभेद होने के बावजूद, दोनों ने निकट भविष्य में फिलिस्तीनी राज्य के गठन का विरोध किया है.

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बेनेट फिलिस्तीनी राज्य के गठन को खारिज करते हैं. उनका कहना है कि गाजा में इजरायली सैन्य अभियान तब तक जारी रहना चाहिए, जब तक कि हमास के हथियार न छीन लिए जाएं. हालांकि लैपिड ने लंबे समय के नजरिए से 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' (दो-राज्य समाधान) का समर्थन किया है, लेकिन उन्होंने वेस्ट बैंक में इजरायली बस्तियों के विस्तार को रोकने या पलटने का कोई वादा नहीं किया है.

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चार्ल्स मटाटा ने कोर्स रिकॉर्ड के साथ जीता दिल्ली हाफ मैराथन, भारतीय एलीट वर्ग में शैलेश और अंकिता चमके

Charles Matata clinched Delhi Half Marathon: केन्या के चार्ल्स मटाटा ने वेदांता दिल्ली हाफ मैराथन के मेंस एलीट वर्ग में 58 मिनट 52 सेकंड का समय निकालकर नया कोर्स रिकॉर्ड बनाया और खिताब अपने नाम किया. वहीं, महिला वर्ग में इथियोपिया की वुडिनेश अलेमु चैंपियन बनीं. दिल्ली की सड़कों पर आयोजित इस प्रतिष्ठित दौड़ में करीब 40 हजार धावकों ने हिस्सा लिया. इस दौरान भारतीय एलीट वर्ग में शैलेश कुशवाहा और महिला वर्ग में अंकिता ध्यानी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए अपने-अपने वर्ग में शीर्ष स्थान हासिल किया. Sun, 18 Oct 2026 15:58:00 +0530

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