अष्टमी-नवमी पर Navratri Kanya Bhoj के लिए तैयार करें ये 5 स्वादिष्ट पकवान
नवरात्रि पर्व में मां दुर्गा के अलग-अलग रुपों की पूजा की जाती है। अष्टमी-नवमी के दिन कन्या पूजन किया जाता है। कन्या पूजन पवित्र अनुष्ठानों में से एक है। नवरात्रि के पावन अवसर पर छोटी-छोटी कन्याओं को माता रानी का रुप मानकर उनका स्वागत और पूजन किया जाता है।
कंजक को विशेष भोग अर्पित किए जाते हैं, जैसे कि हलवा, पूड़ी और काले चने का प्रसाद सबसे पहले याद आता है। जैसे-जैसे समय बदल रहा है लोग पारंपरिक भोग के साथ ही अन्य चीजें भी शामिल करने लगे हैं। आज के इस लेख में हम आपको 5 रेसिपीज बताने जा रहे, जिन्हें आप कंजक पूजन में बना सकती है।
कन्या भोज में क्या क्या बना सकते हैं?
यदि आप शारदीय नवरात्रि में कजंक पूजा में कन्याओं को काले चने, पूड़ी और खीर की जगह कुछ और बना सकते हैं।
काबुली चने की सूखी सब्जी बनाने का आसान तरीका
खासतौर पर लोग काले चने को फ्राई करके सूखी सब्जी बनाते हैं। लेकिन आप कजंक में कुछ अलग बनाना चाहती है, तो काबुली चने की सूखी सब्जी बना सकती हैं। इसके लिए चनों को रातभर भिगोकर रखने की जरुरत होगी। फिर सुबह 3-4 बार पानी से अच्छे से धोकर उबालें। इसके बाद कुकर में तेल गर्म डालकर करें। इसमें जीरा और हरी मिर्च डालकर भूनें। फिर इसमें टमाटर डालकर पकाएं। अब सूखे मसाले डालकर तेल छोड़ने तक पकाएं। उबले हुए चने डालकर 5 मिनट फ्राई करें। अब इसमें आधा गिलास पानी डालें और 2 सीटी लगाकर पकाएं। आखिर में गैस बंद कर दें और फिर हरा धनिया डालें। काबुली चने की सूखी सब्जी बनकर तैयार कर लें।
आटे का हलवा बनाने का तरीका
इसके लिए सबसे पहले आप गेंहू के आटे को अच्छे से छान लें। अब कड़ाही को अच्छे से गरम कर लें। इसमें घी डालें और गर्म करें। फिर धीरे-धीरे आटा डालते हुए चलाएं। गैस फी फ्लेम का खास ध्यान रखें। आटा को तब तक भूनें जब तक व सुनहरा न हो जाए। फिर स्वादानुसार चीनी और 6-7 चम्मच और घी डालें। फिर इसमें पानी डालें और लगातार चलाते हुए पकाएं।
मसाला आलू
मसाला आलू बनाने के लिए सबसे पहले उबले हुए आलूओं को मोटे टुकड़ों में तोड़ लें। इसके बाद अब एक कड़ाही में शुद्ध घी या व्रत वाला तेल गर्म करें। इसमें जीरा, हींग, कटी हुई हरी मिर्च और अदरक का पेस्ट डालकर भूनें। इसमें हल्दी पाउडर, धनिया पाउडर और कश्मीरी लाल मिर्च डालें। इसमें अब कटे हुए टमाटर की प्यूरी डालकर तब तक पकाएं, जब तक मसाला तेल न छोड़ दे। इसमें आलू और स्वादानुसार सेंधा नमक या सादा नमक मिलाएं। आखिर में थोड़ा पानी डालकर 5 मिनट उबालें और बारीक हरा धनिया डालकर गरमा-गरम परोसें।
मखाने की खीर
मखाने की खीर बनाने के लिए एक भरी तले के बर्तन में 1 लीटर दूध को उबलने के लिए रख दें। जब तक दूध गाढ़ा हो रहे है, तब तक एक पैन में एक चम्मच घी गर्म करें और इसमें एक कप मखानों को हल्का सुनहरा और कुरकुरा होने तक भून लें। इसके बाद थोड़े से मखाने को दरदरा पीस लें और बाकी को साबुत ही रहने दें। जब दूध आधा रह जाए, तो इसमें पिसे और साबुत मखाने, कटे हुए बादाम-काजू और इलायची पाउडर डालें। इसमें धीमी आंच पर पकने दें। आखिर में अपनी पसंद के अनुसार चीनी या मिश्री मिलाएं। 5 मिनट और उबालकर गैस बंद कर दें, जिससे स्वादिष्ट मखाने की खीर तैयार है।
पूड़ी की जगह लूची
आप पूड़ी की जगह बंगाल की प्रसिद्ध 'लूची' कन्या भोज के लिए बना सकते हैं। इसे बनाने के लिए मैदे में थोड़ा-सा नमक और एक चम्मच शुद्ध घी या रिफाइंड तेल डालकर अच्छे से मिला लें। फिर इसमें गुनगुने पानी या दूध की सहायता से पूरी के आटे से थोड़ा नरम आटा गूंथ लें और फिर 15-20 मिनट के लिए ढक कर रख दें। अब आटे की छोटी-छोटी लोइयां बनाकर बिना सूखा आटा या हल्का सा तेल लगाकर पतली-पतली बेल लें। फिर एक कड़ाही में घी या तेल तेज गर्म करें और लूची को डालकर दोनों तरफ हल्का सुनहरा और फुला हुआ भून लें।
गलत वजह से चर्चा में पाकिस्तान का ये जिला, 9 महीने के भीतर 122 लोगों ने की आत्महत्या
इस्लामाबाद, 18 अक्टूबर (आईएएनएस)। पाकिस्तान के सिंध प्रांत का एक जिला गलत वजहों से चर्चा में है। जिले का नाम थारपारकर है और खुदकुशी दर में बढ़ोतरी इसकी पहचान हो गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जनवरी से सितंबर के बीच यहां122 लोगों ने आत्महत्या कर ली।
1,778,407 की आबादी और सात तालुकों में फैले होने के बावजूद, थारपारकर में विशेष मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बहुत सीमित है। जिले के दूर-दराज के गांवों में रहने वाले लोगों को स्टाफ की कमी, पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव और जर्जर सड़कों के कारण चिकित्सा और मनोवैज्ञानिक सहायता पाने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
द फ्राइडे टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के स्वास्थ्य विभाग ने थारपारकर में लोगों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए दो प्रशिक्षित पेशेवरों को नियुक्त किया है।
बार-बार पड़ने वाले सूखे ने थारपारकर के लोगों की समस्याओं को और बढ़ा दिया है। थारपारकर के ग्रामीण इलाकों में अधिकांश परिवार अपनी आजीविका के लिए बारिश और पशुधन पर निर्भर हैं, जिससे वे पानी की कमी, जलवायु परिवर्तन, फसल खराब होने और पशुओं के नुकसान के प्रति बेहद संवेदनशील हो जाते हैं।
सूखा पीड़ितों को अक्सर कृषि कार्यों और दिहाड़ी मजदूरी की तलाश में संघार, मीरपुरखास और बदिन जिलों के सिंचित क्षेत्रों (बैराज क्षेत्रों) की ओर पलायन को मजबूर होना पड़ता है। इससे जिले में पारिवारिक जीवन और सामुदायिक संबंध बाधित होते हैं।
थारपारकर में पुरुष अक्सर काम की तलाश में अकेले पलायन कर जाते हैं। हालांकि, सूखे और अकाल जैसी स्थितियों के दौरान, पीने के पानी, भोजन और आजीविका के अवसरों की तलाश में कभी-कभी पूरे परिवार भी अपने गांव छोड़ देते हैं। इस तरह के विस्थापन से थारपारकर के लोगों के मन में मानसिक तनाव, असुरक्षा और अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता पैदा होती है।
द फ्राइडे टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, थारपारकर में बच्चे गरीबी और पलायन से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। बार-बार होने वाला विस्थापन उनकी पढ़ाई पर असर डालता है, और आर्थिक तंगी के कारण उन्हें अक्सर स्कूल छोड़कर अपने परिवारों की मदद के लिए काम करना पड़ता है।
थारपारकर में महिलाओं को भी कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है; उन्हें पीने का पानी लाने और खाना पकाने के लिए ईंधन (लकड़ी) इकट्ठा करने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। साथ ही, उन्हें कपास की कटाई जैसे कृषि कार्यों के जरिए अपने परिवारों का भरण-पोषण भी करना पड़ता है। इन जिम्मेदारियों के अलावा, गरीबी के कारण स्वास्थ्य संकट भी पैदा होता है।
कुछ मामलों में, थारपारकर की महिलाओं को घरेलू हिंसा के कारण शारीरिक और मानसिक तनाव का भी सामना करना पड़ता है। अली नवाज रहीमू ने द फ्राइडे टाइम्स की एक रिपोर्ट में कहा, हालांकि आत्महत्या एक गंभीर समस्या है और इसे किसी एक कारण से नहीं जोड़ा जा सकता, लेकिन थारपारकर में लगातार गरीबी, बेरोजगारी, पारिवारिक कलह, सामाजिक दबाव, विस्थापन और मानसिक स्वास्थ्य के लिए अपर्याप्त मदद लोगों में मानसिक परेशानी का कारण बन सकते हैं। फिर भी, थारपारकर में आत्महत्या के मामलों में हुई बढ़ोतरी के पीछे के वास्तविक कारणों का पता लगाने के लिए केवल अनुमान लगाने के बजाय, गहन शोध की आवश्यकता है। सही स्थिति को समझने के लिए थारपारकर के पिछले वर्षों के आंकड़ों से तुलना करना भी जरूरी है।
रिपोर्ट के अनुसार, सिंध सरकार को थारपारकर में अस्पतालों और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों पर मनोचिकित्सकों, मनोवैज्ञानिकों और परामर्शदाताओं (काउंसलरों) की नियुक्ति करके स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना चाहिए। सरकार को ऐसी जगहों पर मोबाइल मेंटल हेल्थ टीम और रेफरल सेवाएं शुरू करनी चाहिए, जहां परिवहन की सुविधा कम है और लोगों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सीमित है। इसके अलावा, अधिकारियों को लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े सामाजिक कलंक (स्टिग्मा) को कम करने और मानसिक तनाव के शुरुआती लक्षणों को पहचानने में लोगों की मदद करने के लिए सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने चाहिए।
--आईएएनएस
केआर/
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