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मुजफ्फरनगर की 6 विधानसभा सीटों पर किसका चलेगा जादू? 2027 से पहले समझें पूरा सियासी समीकरण
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज होने लगी हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले की राजनीति पर भी सभी की नजरें रहेंगी. इसकी वजह जिले का बदलता चुनावी इतिहास और यहां के सामाजिक, जातीय व किसान राजनीति से जुड़े समीकरण हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने जिले की सभी छह सीटों पर जीत हासिल कर अपना दबदबा कायम किया था. हालांकि, 2022 के चुनाव में तस्वीर बदल गई और भाजपा को केवल दो सीटों पर जीत मिली, जबकि समाजवादी पार्टी (SP) और राष्ट्रीय लोकदल (RLD) के गठबंधन ने चार सीटों पर कब्जा जमाया. इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भी जिले की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला. समाजवादी पार्टी के हरेंद्र सिंह मलिक ने भाजपा के संजीव बालियान को हराकर मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट पर जीत दर्ज की. अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह देखना दिलचस्प होगा कि पिछले चुनावों के नतीजे और बदले हुए राजनीतिक गठबंधन किस तरह असर डालते हैं.
2027 में बदला होगा गठबंधन का समीकरण
2022 के विधानसभा चुनाव में सपा और रालोद ने गठबंधन करके चुनाव लड़ा था. उस समय दोनों दलों ने मिलकर भाजपा को कड़ी चुनौती दी और जिले की छह में से चार सीटें अपने नाम कीं. हालांकि, चुनाव के बाद रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी ने सपा का साथ छोड़कर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का रुख कर लिया. मौजूदा राजनीतिक स्थिति में जयंत चौधरी केंद्र सरकार में मंत्री हैं. 2027 के विधानसभा चुनाव में रालोद के एनडीए के साथ चुनाव लड़ने की संभावना जिले के राजनीतिक समीकरणों को नए सिरे से प्रभावित कर सकती है. ऐसे में मुजफ्फरनगर की सभी छह सीटों पर भाजपा, रालोद और सपा की रणनीति अहम होगी. हालांकि, चुनाव में सीटों का बंटवारा, उम्मीदवारों का चयन और स्थानीय मुद्दे भी नतीजों को प्रभावित करेंगे.
मुजफ्फरनगर जिले में छह विधानसभा सीटें हैं—मुजफ्फरनगर सदर, पुरकाजी, चरथावल, बुढ़ाना, खतौली और मीरापुर. आइए, इन सभी सीटों के पिछले दो विधानसभा चुनावों के नतीजों पर नजर डालते हैं.
मुजफ्फरनगर सदर: कपिल देव अग्रवाल ने लगातार दो बार दर्ज की जीत
मुजफ्फरनगर सदर विधानसभा सीट पर भाजपा ने 2017 और 2022 में जीत हासिल की. भाजपा के कपिल देव अग्रवाल ने समाजवादी पार्टी के गौरव स्वरूप को लगभग 14 हजार वोटों के अंतर से हराया था. 2022 के विधानसभा चुनाव में भी कपिल देव अग्रवाल अपनी सीट बचाने में सफल रहे. जिले की उन दो सीटों में मुजफ्फरनगर सदर शामिल रही, जहां भाजपा लगातार दूसरी बार जीत दर्ज करने में कामयाब हुई. 2027 के चुनाव में इस सीट पर भाजपा के प्रदर्शन के साथ-साथ विपक्ष की रणनीति पर भी नजर रहेगी. पिछले चुनावों में भाजपा की लगातार जीत उसके लिए एक मजबूत आधार है, लेकिन आगामी चुनाव में स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवारों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी.
जानें कौन सी पार्टी कितनी बार जीतीं चुनाव
| वर्ष | विजेता | पार्टी |
|---|---|---|
| 1951/52 | द्वारका प्रसाद (मittal) | कांग्रेस (INC) |
| 1957 | द्वारका प्रसाद | कांग्रेस (INC) |
| 1962 | केशव गुप्ता | कांग्रेस (INC) |
| 1967 | वी. स्वरूप (विष्णु स्वरूप) | निर्दलीय (IND) |
| 1969 | सईद मुर्तजा | भारतीय क्रांति दल (BKD) |
| 1974 | चितरंजन स्वरूप | कांग्रेस (INC) |
| 1977 | मालती शर्मा | जनता पार्टी (JNP) |
| 1980 | विद्या भूषण | कांग्रेस (I) |
| 1985 | चारुशीला | कांग्रेस (INC) |
| 1989 | सोमांश प्रकाश | जनता दल (JD) |
| 1991 | सुरेश संगल | भाजपा (BJP) |
| 1993 | सुरेश संगल | भाजपा (BJP) |
| 1996 | सुशीला देवी (अग्रवाल) | भाजपा (BJP) |
| 2002 | चितरंजन स्वरूप | समाजवादी पार्टी (SP) |
| 2007 | अशोक कुमार कंसल | भाजपा (BJP) |
| 2012 | चितरंजन स्वरूप | समाजवादी पार्टी (SP) |
| 2016 (उपचुनाव) | कपिल देव अग्रवाल | भाजपा (BJP) |
| 2017 | कपिल देव अग्रवाल | भाजपा (BJP) |
| 2022 | कपिल देव अग्रवाल | भाजपा (BJP) |
2. पुरकाजी: भाजपा से रालोद के खाते में गई सीट
पुरकाजी विधानसभा सीट पर 2017 के चुनाव में भाजपा के प्रमोद ऊंटवाल ने कांग्रेस के दीपक कुमार को 11,253 वोटों से हराया था. उस चुनाव में भाजपा ने मुजफ्फरनगर जिले की सभी छह सीटों पर जीत हासिल की थी. हालांकि, 2022 में यहां मुकाबले का परिणाम बदल गया. रालोद के अनिल कुमार को 92,672 वोट मिले, जबकि भाजपा के प्रमोद ऊंटवाल को 86,140 वोट प्राप्त हुए. इस तरह अनिल कुमार ने 6,532 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की. पुरकाजी में पांच साल के भीतर सत्ता परिवर्तन ने यह संकेत दिया कि जिले में चुनावी समीकरण स्थिर नहीं रहे. 2027 में रालोद के एनडीए के साथ आने की स्थिति में इस सीट का मुकाबला नए राजनीतिक संदर्भ में देखा जाएगा.
| वर्ष | विजेता | पार्टी | वोट | मार्जिन | रनर-अप |
|---|---|---|---|---|---|
| 2012 | अनिल कुमार | बसपा (BSP) | 53,491 | 8,908 | दीपक कुमार (कांग्रेस) |
| 2017 | प्रमोद उत्वाल (उंटवाल) | भाजपा (BJP) | 77,491 | 11,253 | दीपक कुमार (कांग्रेस) |
| 2022 | अनिल कुमार | रालोद (RLD) | 92,672 | 6,532 | प्रमोद उत्वाल (भाजपा) |
3. चरथावल: 2022 में सपा ने भाजपा को दी शिकस्त
चरथावल विधानसभा सीट पर 2017 के चुनाव में भाजपा के विजय कश्यप ने सपा के मुकेश चौधरी को 23,231 वोटों से हराया था. इस जीत के साथ भाजपा ने जिले की सभी छह सीटों पर जीत दर्ज की थी. लेकिन 2022 के चुनाव में यहां नतीजा भाजपा के पक्ष में नहीं रहा. समाजवादी पार्टी के पंकज मलिक को 97,363 वोट मिले, जबकि भाजपा की सपना कश्यप को 92,029 वोट प्राप्त हुए. पंकज मलिक ने 5,334 वोटों के अंतर से जीत हासिल की. चरथावल का पिछला चुनाव बताता है कि यहां मुकाबला काफी करीबी रहा था. 2027 में सपा अपनी पिछली जीत को बरकरार रखने की कोशिश करेगी, जबकि भाजपा इस सीट को वापस हासिल करने के लिए रणनीति बनाएगी. रालोद के एनडीए में शामिल होने के बाद गठबंधन की चुनावी रणनीति भी इस सीट पर चर्चा का विषय रह सकती है.
| वर्ष | विजेता | पार्टी |
|---|---|---|
| 1967 | हरिश चंद्र | संयुक्त समाजवादी पार्टी (SSP) |
| 1969 | नैन सिंह | भारतीय क्रांति दल (BKD) |
| 1974 | नंद राम | भारतीय क्रांति दल (BKD) |
| 1977 | नंद राम | जनता पार्टी (JNP) |
| 1980 | राम प्रसाद | कांग्रेस (I) |
| 1985 | फूल सिंह | कांग्रेस (INC) |
| 1989 | जी.एस. विनोद | जनता दल (JD) |
| 1991 | जी.एस. विनोद | जनता दल (JD) |
| 1993 | रणधीर सिंह | भाजपा (BJP) |
| 1996 | रणधीर सिंह | भाजपा (BJP) |
| 2002 | उमा (उमा किरण) | बसपा (BSP) |
| 2007 | अनिल कुमार | बसपा (BSP) |
| 2012 | नूर सलीम राणा | बसपा (BSP) |
| 2017 | विजय कुमार कश्यप | भाजपा (BJP) |
| 2022 | पंकज कुमार मलिक | समाजवादी पार्टी (SP) |
बुढ़ाना: 28 हजार से ज्यादा वोटों से जीती थी रालोद
बुढ़ाना विधानसभा सीट पर 2017 में भाजपा के उमेश मलिक ने समाजवादी पार्टी के प्रमोद त्यागी को 13,201 वोटों से हराया था. उस समय इस सीट पर भाजपा का प्रदर्शन मजबूत रहा था. 2022 के विधानसभा चुनाव में यहां बड़ा उलटफेर देखने को मिला. रालोद के राजपाल बालियान को 1,31,093 वोट मिले, जबकि भाजपा के उमेश मलिक को 1,02,783 वोट प्राप्त हुए। राजपाल बालियान ने 28,310 वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की. बुढ़ाना में भाजपा की पिछली जीत के बाद रालोद की इतनी बड़ी जीत जिले के चुनावी बदलाव का प्रमुख उदाहरण बनी. अब 2027 में रालोद के एनडीए के साथ आने पर इस सीट का राजनीतिक समीकरण खासा दिलचस्प हो सकता है. हालांकि, पिछले चुनाव का अंतर अपने आप आगामी चुनाव के परिणाम की गारंटी नहीं देता.
| वर्ष | विजेता | पार्टी |
|---|---|---|
| 1957 | कुंवर असगर अली | निर्दलीय (IND) |
| 1958 (उपचुनाव) | कमरू | कांग्रेस (INC) |
| 1962 | विजयपाल सिंह | भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) |
| 1967–2011 | सीट अस्तित्व में नहीं थी | — |
| 2012 | नवाजिश आलम खान | समाजवादी पार्टी (SP) |
| 2017 | उमेश मलिक | भाजपा (BJP) |
| 2022 | राजपाल सिंह बालियान | राष्ट्रीय लोक दल (RLD) |
खतौली: 2022 में भी भाजपा ने बचाई अपनी सीट
खतौली विधानसभा सीट उन क्षेत्रों में शामिल रही, जहां भाजपा ने 2017 और 2022, दोनों चुनावों में जीत दर्ज की. 2017 में भाजपा के विक्रम सैनी ने सपा के चंदन चौहान को 31,374 वोटों से हराया था. यह जिले में भाजपा की बड़ी जीतों में से एक थी. 2022 के चुनाव में रालोद ने इस सीट पर भाजपा को चुनौती दी. हालांकि, भाजपा के विक्रम सैनी अपनी जीत बरकरार रखने में सफल रहे. उन्हें 1,00,651 वोट मिले, जबकि रालोद के राजपाल सैनी को 84,306 वोट प्राप्त हुए. भाजपा ने 16,345 वोटों के अंतर से जीत हासिल की. खतौली का पिछला रिकॉर्ड बताता है कि 2022 में सपा-रालोद गठबंधन की लहर के बावजूद भाजपा यहां अपनी सीट बचाने में कामयाब रही. 2027 में बदले हुए गठबंधन के बीच इस सीट पर मुकाबला किस दिशा में जाता है, यह देखना अहम होगा.
| वर्ष | विजेता | पार्टी |
|---|---|---|
| 1967 | सरदार सिंह | भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) |
| 1969 | वीरेंद्र वर्मा | भारतीय क्रांति दल (BKD) |
| 1974 | लक्ष्मण सिंह | भारतीय क्रांति दल (BKD) |
| 1977 | लक्ष्मण सिंह | जनता पार्टी (JNP) |
| 1980 | धर्मवीर सिंह | कांग्रेस (I) |
| 1985 | हरेंद्र सिंह | लोक दल (LKD) |
| 1989 | धर्मवीर सिंह | जनता दल (JD) |
| 1991 | सुधीर कुमार बालियान | भाजपा (BJP) |
| 1993 | सुधीर कुमार बालियान | भाजपा (BJP) |
| 1996 | राजपाल सिंह बालियान | भारतीय किसान कामगार पार्टी (BKKGP) |
| 2002 | राजपाल सिंह बालियान | राष्ट्रीय लोक दल (RLD) |
| 2007 | योगराज सिंह | बसपा (BSP) |
| 2012 | करतार सिंह भड़ाना | राष्ट्रीय लोक दल (RLD) |
| 2017 | विक्रम सिंह (सैनी) | भाजपा (BJP) |
| 2022 | विक्रम सिंह (सैनी) | भाजपा (BJP) |
| 2022 (उपचुनाव) | मदन भैया | राष्ट्रीय लोक दल (RLD) |
मीरापुर: मामूली जीत से बड़े अंतर तक बदला चुनावी परिणाम
मीरापुर विधानसभा सीट पर पिछले दो चुनावों में बड़ा बदलाव देखने को मिला. 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के अवतार सिंह भड़ाना ने सपा के लियाकत अली को केवल 193 वोटों से हराया था. बेहद कम अंतर से मिली इस जीत ने मुकाबले की करीबी को दिखाया था. 2022 में यहां तस्वीर पूरी तरह बदल गई। रालोद के चंदन चौहान को 1,07,421 वोट मिले, जबकि भाजपा के प्रशांत चौधरी को 80,041 वोट प्राप्त हुए. चंदन चौहान ने 27,380 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की. इस तरह मीरापुर में पांच साल के भीतर भाजपा की मामूली जीत के बाद रालोद ने बड़े अंतर से सफलता हासिल की. 2027 के चुनाव में यहां का समीकरण भी महत्वपूर्ण रहेगा. रालोद अब एनडीए के साथ है, ऐसे में पिछले चुनाव में उसके पक्ष में रहे मतदाताओं का रुझान और विभिन्न दलों की रणनीति चर्चा के केंद्र में रह सकती है.
| वर्ष | विजेता | पार्टी |
|---|---|---|
| 2012 | जमील अहमद कासमी | बसपा (BSP) |
| 2017 | अवतार सिंह भड़ाना | भाजपा (BJP) |
| 2022 | चंदन चौहान | राष्ट्रीय लोक दल (RLD) |
| 2024 (उपचुनाव) | मिथिलेश पाल | राष्ट्रीय लोक दल (RLD) |
पश्चिमी यूपी का ‘शुगर बाउल’ है मुजफ्फरनगर
मुजफ्फरनगर को पश्चिमी उत्तर प्रदेश का ‘शुगर बाउल’ कहा जाता है. गन्ने की खेती और गुड़ मंडियों के लिए पहचाने जाने वाले इस जिले में खेती-किसानी से जुड़े मुद्दे लंबे समय से राजनीतिक चर्चा का हिस्सा रहे हैं. गन्ने का भुगतान, किसानों की आर्थिक स्थिति और कृषि से संबंधित नीतियां यहां के चुनावी विमर्श को प्रभावित करने वाले मुद्दों में शामिल हैं. जिले की राजनीति को समझने के लिए 2013 के सांप्रदायिक दंगों का संदर्भ भी महत्वपूर्ण है. इन घटनाओं का क्षेत्र के सामाजिक और राजनीतिक माहौल पर गहरा प्रभाव पड़ा. इसके बाद धार्मिक पहचान, जातीय समीकरण और सामुदायिक संबंध चुनावी चर्चाओं में प्रमुखता से सामने आए.
2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने मुजफ्फरनगर सीट पर जीत दर्ज की, जबकि 2024 में समाजवादी पार्टी के हरेंद्र सिंह मलिक ने संजीव बालियान को हराकर यह सीट अपने नाम कर ली. विधानसभा चुनावों में भी 2017 के भाजपा के क्लीन स्वीप के बाद 2022 में सपा-रालोद गठबंधन ने चार सीटों पर जीत दर्ज की थी. इसी बीच तीन कृषि कानूनों के खिलाफ चले किसान आंदोलन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों से जुड़े मुद्दों को फिर से प्रमुखता दी. आंदोलन के दौरान जाट और मुस्लिम समुदायों के किसानों के बीच साझा मुद्दों पर एकजुटता भी देखने को मिली. हालांकि, जिले के चुनावी नतीजों को केवल एक घटना या किसी एक सामाजिक समीकरण के आधार पर नहीं समझा जा सकता. स्थानीय नेतृत्व, उम्मीदवार, किसान मुद्दे और राजनीतिक गठबंधन भी अहम भूमिका निभाते हैं.
ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान भी है मुजफ्फरनगर की खासियत
मुजफ्फरनगर का इतिहास भी इसकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है. जनपद का नाम नवाब मुजफ्फर अली से जुड़ा माना जाता है. जिले में स्थित शुक्रताल धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व का प्रमुख केंद्र है, जिसे सुखदेव तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है. यहां देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु पहुंचते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शुक्रताल में महर्षि शुकदेव ने राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत की कथा सुनाई थी. यहां स्थित प्राचीन वटवृक्ष को भी इसी परंपरा से जोड़कर देखा जाता है. यह स्थल जिले की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान में विशेष स्थान रखता है. मुजफ्फरनगर का संबंध कई चर्चित राजनीतिक हस्तियों से भी रहा है. पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान का संबंध क्षेत्र के एक प्रतिष्ठित नवाब परिवार से बताया जाता है. वहीं, जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने मुजफ्फरनगर से लोकसभा चुनाव जीतकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पहचान बनाई थी.
2027 में किसके पक्ष में बनेगा माहौल?
मुजफ्फरनगर की छह विधानसभा सीटों का पिछला चुनावी रिकॉर्ड बताता है कि जिले में राजनीतिक परिस्थितियां पांच साल के भीतर बदल सकती हैं. 2017 में भाजपा ने सभी छह सीटें जीती थीं, जबकि 2022 में सपा-रालोद गठबंधन चार सीटों पर विजयी रहा. इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने भाजपा को हराकर जिले की राजनीति में अपनी स्थिति मजबूत की. अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सबसे बड़ा बदलाव रालोद का एनडीए के साथ होना है. इससे भाजपा और रालोद के बीच संभावित चुनावी तालमेल, सीटों के बंटवारे और उम्मीदवारों के चयन पर नजर रहेगी. दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी के सामने अपनी पिछली सफलताओं को बनाए रखने की चुनौती होगी. हालांकि, पिछले चुनावों के आंकड़े आगामी चुनाव का परिणाम तय नहीं करते. किसानों से जुड़े मुद्दे, स्थानीय विकास, गन्ना भुगतान, उम्मीदवारों की लोकप्रियता और चुनाव के समय बनने वाले सामाजिक व राजनीतिक समीकरण ही तय करेंगे कि 2027 में मुजफ्फरनगर की छह सीटों पर किस दल को बढ़त मिलती है.
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