मां कूष्मांडा और कपर्दीश चतुर्थी व्रत से होगा कल्याण
आज गणेश चतुर्थी व्रत एवं नवरात्र का चौथा दिन है, परंपरा से लगभग हर पूजा में सबसे पहले गणेश जी का आवाहन किया जाता है, इसलिए आज की नवरात्रि पूजा गणेश जी से शुरू करके फिर मां कूष्मांडा की आराधना करना लाभदायी होता है तो आइए हम आपको कपर्दीश चतुर्थी व्रत एवं मां कूष्मांडा को प्रसन्न करने की विधि एवं महत्व के बारे में बताते हैं।
जानें गणेश चतुर्थी और नवरात्रि के चौथे दिन का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बुधवार गणेश जी का दिन माना जाता है यह बुधवार उनकी चतुर्थी भी है। देवी की नौ रातों के बीच यह एक कोमल स्मरण है कि हर पूजा विघ्नहर्ता से ही आरंभ होती है। सुबह की शुरुआत गणपति से करें, फिर कूष्मांडा की आराधना करें। गणेश चतुर्थी और नवरात्र ऐसे ही प्रमुख पर्व हैं, जो भारतीय जनजीवन में विशेष स्थान रखते हैं। गणेश चतुर्थी भगवान गणेश की उपासना का पर्व है, जबकि नवरात्र मां दुर्गा की शक्ति, साधना और आराधना का महापर्व है। इन दोनों पर्वों का मूल संदेश विघ्नों पर विजय, धर्म की स्थापना, आत्मशुद्धि और सकारात्मक जीवन-दृष्टि का विकास है।
हर चांद्र मास में दो चतुर्थियां होती हैं: कृष्ण पक्ष में संकष्टी चतुर्थी और शुक्ल पक्ष में विनायक चतुर्थी। द्रिक पंचांग आश्विन की आज की शुक्ल चतुर्थी को कपर्दीश चतुर्थी नाम देता है। क्षेत्रीय पंचांगों में मासिक चतुर्थियों के कई नाम हैं; नाम चाहे जो हो, पूजा गणेश जी की ही होती है, दूर्वा घास, मोदक या कोई अन्य मिठाई और दीपक के साथ। इस साल 14 अक्टूबर को नवरात्र के चौथे दिन के संदर्भ में मां कुष्मांडा की उपासना और गणेश चतुर्थी पड़ रही है।
मां कुष्मांडा की उपासना और गणेश पूजा का है खास महत्व
पंडितों के अनुसार नवरात्र का चौथा दिन मां दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप मां कुष्मांडा को समर्पित है। वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्र का चौथा दिन 14 अक्टूबर को है। इस दिन मां कुष्मांडा की पूजा की जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कुष्मांडा ने अपनी दिव्य मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसी कारण उन्हें सृष्टि की आदिशक्ति तथा ब्रह्मांड को ऊर्जा प्रदान करने वाली देवी माना जाता है। उनके नाम में निहित आध्यात्मिक अर्थ सृजन, ऊर्जा और जीवन के विस्तार से जोड़ा जाता है। मां कुष्मांडा को सामान्यतः आठ भुजाओं वाली देवी के रूप में चित्रित किया जाता है। उनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृतकलश, चक्र और गदा जैसे आयुध एवं प्रतीक दर्शाए जाते हैं। उनका स्वरूप शक्ति, साहस, स्वास्थ्य, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संदेश देता है।
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नवरात्र के चौथे दिन भक्तजन प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। इसके बाद मां दुर्गा और मां कुष्मांडा की पूजा-अर्चना की जाती है। पुष्प, धूप, दीप, फल और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती तथा देवी स्तुतियों का पाठ भी श्रद्धापूर्वक किया जाता है। पूजा की विधि परिवार और क्षेत्र की परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। इस दिन का आध्यात्मिक संदेश है कि मनुष्य को अपने भीतर की सकारात्मक ऊर्जा को पहचानना चाहिए। जैसे सृष्टि की कल्पना सृजन और ऊर्जा से जुड़ी है, वैसे ही मानव जीवन में विचार, संकल्प और कर्म नई संभावनाओं का निर्माण करते हैं। निराशा के स्थान पर आशा, भय के स्थान पर साहस और नकारात्मकता के स्थान पर सकारात्मक सोच अपनाना मां कुष्मांडा की आराधना से मिलने वाली प्रमुख प्रेरणाओं में शामिल है।
गणेश चतुर्थी और नवरात्र के बीच है विशेष आध्यात्मिक संबंध
गणेश चतुर्थी और नवरात्र की धार्मिक परंपराएं अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों में शक्ति, शुभता, विवेक और आत्मविकास की भावना समान रूप से दिखाई देती है। भगवान गणेश बुद्धि और विघ्नों को दूर करने के प्रतीक हैं, जबकि माँ दुर्गा शक्ति और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का प्रतिनिधित्व करती हैं। गणेश जी की उपासना हमें किसी भी कार्य को आरंभ करने से पहले विचार करने, योजना बनाने और विवेकपूर्ण निर्णय लेने की शिक्षा देती है। वहीं माँ दुर्गा की आराधना हमें कठिन परिस्थितियों में दृढ़ता, साहस और आत्मविश्वास बनाए रखने की प्रेरणा देती है। सफलता के लिए ज्ञान, शक्ति, अनुशासन और सही उद्देश्य का समन्वय आवश्यक है। जब व्यक्ति बुद्धि के साथ शक्ति और संकल्प के साथ सदाचार को अपनाता है, तब वह जीवन की चुनौतियों का बेहतर ढंग से सामना कर सकता है। यह संबंध भारतीय संस्कृति की उस व्यापक दृष्टि को भी स्पष्ट करता है, जिसमें आध्यात्मिक साधना का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत कल्याण नहीं, बल्कि परिवार, समाज और समस्त जीव-जगत के प्रति उत्तरदायित्व का विकास भी है।
नवरात्र के चौथे दिन ऐसे करें पूजा, होगा लाभ
पंडितों के अनुसार यह पूजा गणेश जी से आरंभ करें, उनकी प्रतिमा के सामने दीपक जलाएं, दूर्वा घास (हो सके तो 21 तिनके, नहीं तो कुछ ही), एक लाल फूल और मिठाई अर्पित करें। नीचे दिए गए गणेश मंत्र का 11 या 108 बार जाप करें। फिर नवरात्रि कलश की ओर मुड़ें: माँ कूष्मांडा को फूल अर्पित करें, उनका नाम मंत्र जपें और भोग में मालपुआ या कोई भी मिठाई चढ़ाएं। बोए गए अनाज (जवारे) को जल दें और आरती के साथ पूजा संपन्न करें। 14 अक्टूबर 2026 को पड़ने वाला शारदीय नवरात्र का चौथा दिन मां कुष्मांडा की आराधना के लिए विशेष महत्त्व रखता है। उनकी उपासना के माध्यम से सृजन, ऊर्जा और सकारात्मकता का संदेश ग्रहण किया जा सकता है।
इन पर्वों की वास्तविक का खास महत्व है यह पूजा तभी सार्थक है, जब हम पूजा-पाठ के साथ अपने आचरण में भी उनके मूल्यों को अपनाएं। दूसरों के प्रति करुणा, समाज के प्रति उत्तरदायित्व, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और जीवन में सत्य एवं सदाचार का पालन ही हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाता है। यही गणेश चतुर्थी और माँ दुर्गा की आराधना का व्यापक संदेश है।
- प्रज्ञा पाण्डेय
Shardiya Navratri 2026: शारदीय नवरात्रि प्रारम्भ और घटस्थापना: शक्ति आराधना का पावन पर्व
हिंदू धर्म में शारदीय नवरात्रि को शक्ति की उपासना का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारम्भ होने वाले इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्रि केवल उपवास और पूजा का पर्व नहीं, बल्कि शक्ति, साधना, आत्मसंयम और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक भी है।
नवरात्रि के प्रथम दिन घटस्थापना या कलश स्थापना की जाती है। इसी के साथ नौ दिनों तक चलने वाली देवी आराधना का विधिवत शुभारंभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार कलश में देवी शक्ति का आह्वान कर उसे पूजा स्थल पर स्थापित किया जाता है।
2026 में कब शुरू होगी शारदीय नवरात्रि?
वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि का प्रारम्भ रविवार, 11 अक्टूबर को होगा। इस दिन आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा रहेगी और इसी दिन घटस्थापना तथा मां शैलपुत्री की पूजा की जाएगी। नवरात्रि का समापन 19 अक्टूबर को नवमी के साथ होगा और 20 अक्टूबर 2026 को विजयादशमी मनाई जाएगी।
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दिल्ली के लिए 2026 में घटस्थापना का प्रमुख मुहूर्त:?
11 अक्टूबर, प्रातः 6 बजकर 19 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक।
अभिजित मुहूर्त 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगा।
मुहूर्त स्थान के अनुसार कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है। उदाहरण के लिए वाराणसी में घटस्थापना का प्रातःकालीन मुहूर्त 5:54 से 9:48 तक बताया गया है। इसलिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार समय देखना उचित है।
घटस्थापना का क्या है महत्व?
घटस्थापना को नवरात्रि की सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक विधियों में माना जाता है। कलश को समृद्धि, पूर्णता, जीवन और देवी शक्ति का प्रतीक माना जाता है। कलश के ऊपर स्थापित नारियल और उसके चारों ओर रखी जाने वाली आम की पत्तियां तथा कलश के नीचे बोए जाने वाले जौ प्रकृति, उर्वरता और जीवन के विकास का प्रतीक माने जाते हैं।
धार्मिक परंपरा में कलश स्थापना के माध्यम से देवी शक्ति का आवाहन किया जाता है। इसके बाद नौ दिनों तक अखंड ज्योति, दुर्गा सप्तशती का पाठ, मंत्र जाप, आरती और देवी के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है।
घटस्थापना की पूजन विधि
घटस्थापना के लिए सबसे पहले पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ करके शुद्ध किया जाता है। इसके बाद निम्न प्रकार से पूजा की जा सकती है—
स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा का संकल्प लें।
पूजा स्थल पर स्वच्छ मिट्टी या चौकी तैयार करें।
उसमें जौ के बीज बोएं। नवरात्रि के दौरान उगने वाले इन जौ को धार्मिक रूप से शुभ माना जाता है।
तांबे, पीतल या मिट्टी के कलश में स्वच्छ जल भरें।
कलश में अक्षत, सुपारी, सिक्का और आवश्यकता अनुसार गंगाजल डालें।
कलश के मुख पर आम या अशोक के पत्ते लगाएं।
इसके ऊपर लाल वस्त्र में लिपटा हुआ नारियल रखें।
कलश को जौ बोई गई मिट्टी के ऊपर स्थापित करें।
मां दुर्गा का ध्यान करते हुए देवी का आवाहन करें।
रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, फल और नैवेद्य अर्पित करें।
मां दुर्गा के मंत्रों का जाप करें और दुर्गा सप्तशती अथवा देवी कवच का पाठ करें।
अंत में देवी की आरती करके प्रसाद वितरित करें।
नवरात्रि के नौ दिनों में मां के नौ स्वरूप
नवरात्रि के प्रत्येक दिन देवी के एक स्वरूप की पूजा की जाती है—
पहला दिन — मां शैलपुत्री
दूसरा दिन — मां ब्रह्मचारिणी
तीसरा दिन — मां चंद्रघंटा
चौथा दिन — मां कूष्मांडा
पांचवां दिन — मां स्कंदमाता
छठा दिन — मां कात्यायनी
सातवां दिन — मां कालरात्रि
आठवां दिन — मां महागौरी
नौवां दिन — मां सिद्धिदात्री
इस प्रकार नौ दिनों में देवी के नौ रूपों की आराधना की जाती है।
शारदीय नवरात्रि की धार्मिक महत्ता
शारदीय नवरात्रि का सबसे प्रमुख संदेश शक्ति और धर्म की विजय है। पौराणिक मान्यता के अनुसार महिषासुर नामक असुर ने देवताओं और पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ा दिया था। तब देवताओं की शक्तियों से देवी दुर्गा का प्राकट्य हुआ। देवी ने महिषासुर से युद्ध किया और उसका वध किया।
इसी कारण मां दुर्गा को महिषासुरमर्दिनी भी कहा जाता है। यह कथा प्रतीकात्मक रूप से यह संदेश देती है कि जब अधर्म, अहंकार और अत्याचार बढ़ता है, तब शक्ति का प्राकट्य होकर उसका प्रतिकार होता है। नवरात्रि की साधना में बाहरी शक्ति के साथ-साथ मनुष्य की आंतरिक शक्ति, संयम और आत्मशुद्धि पर भी जोर दिया जाता है।
नवरात्रि की व्रत कथा
नवरात्रि से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाएं अलग-अलग पुराणों और क्षेत्रीय परंपराओं में मिलती हैं। इनमें देवी और महिषासुर का युद्ध सबसे प्रसिद्ध कथाओं में से एक है। कहा जाता है कि महिषासुर ने कठोर तपस्या करके वरदान प्राप्त किया और उसके बाद अपनी शक्ति के अहंकार में देवताओं तथा मनुष्यों को परेशान करने लगा। देवताओं के लिए उसका सामना करना कठिन हो गया। तब ब्रह्मा, विष्णु, महेश सहित सभी देवताओं की शक्तियां एकत्र हुईं और उनसे एक दिव्य स्त्री शक्ति का प्राकट्य हुआ। देवताओं ने देवी को विभिन्न अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। देवी सिंह पर सवार होकर महिषासुर से युद्ध करने पहुंचीं। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंततः देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया। इसी विजय को अधर्म पर धर्म, असत्य पर सत्य और अहंकार पर शक्ति की विजय के रूप में देखा जाता है।
एक अन्य प्रसिद्ध परंपरा में भगवान श्रीराम द्वारा रावण से युद्ध से पहले देवी की आराधना का वर्णन मिलता है। इसी कारण शारदीय नवरात्रि को विजयादशमी से भी जोड़ा जाता है।
व्रत में किन बातों का ध्यान रखें?
नवरात्रि में श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य और परंपरा के अनुसार व्रत रखते हैं। कुछ लोग पूरे नौ दिन फलाहार करते हैं, जबकि कुछ लोग एक समय भोजन या सात्त्विक भोजन ग्रहण करते हैं। व्रत के दौरान सामान्यतः अनाज, मांसाहार, मदिरा और तामसिक भोजन से परहेज किया जाता है। फल, दूध, दही, साबूदाना, कुट्टू, सिंघाड़े का आटा, सेंधा नमक आदि का सेवन अनेक व्रत परंपराओं में किया जाता है।
घटस्थापना से विजयादशमी तक
घटस्थापना के साथ शुरू होने वाली नवरात्रि धीरे-धीरे अष्टमी और नवमी की विशेष पूजा तक पहुंचती है। कई घरों में अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन किया जाता है। नौ कन्याओं को देवी के नौ स्वरूपों का प्रतीक मानकर उनका पूजन और भोजन कराया जाता है।
इसके बाद दसवें दिन विजयादशमी आती है। इस प्रकार नवरात्रि का पूरा पर्व केवल देवी पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को अपने भीतर की नकारात्मक शक्तियों यानि अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह और अन्य विकारों पर विजय पाने का संदेश भी देता है।
- शुभा दुबे
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