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जानिए क्यों खास है चीन का घोड़ा नववर्ष

बीजिंग, 15 फरवरी (आईएएनएस)। चीनी राशि चक्र की कहानी बड़ी दिलचस्प है। इसमें बारह जानवर होते हैं और हर जानवर का अपना एक साल होता है, जो बारह साल बाद फिर लौटकर आता है। इस चक्र में घोड़ा सातवें स्थान पर है। लेकिन घोड़ा सिर्फ एक गिनती नहीं है। चीनी संस्कृति में उसे बहुत सम्मान और महत्व दिया जाता है।

इतिहास पर नजर डालें तो साफ दिखता है कि इंसानी सभ्यता के विकास में घोड़े की भूमिका बहुत बड़ी रही है। युद्ध हो या संदेश पहुंचाना, खेती हो या शाही सवारी—हर जगह घोड़ा इंसान का भरोसेमंद साथी रहा है। यही वजह है कि चीनी नववर्ष में घोड़े का साल शुभ, शक्तिशाली और तरक्की का प्रतीक माना जाता है।

अब थोड़ा चीनी नववर्ष को समझते हैं। यह हमारे सामान्य कैलेंडर से अलग होता है। चीनी कैलेंडर लूनर पंचांग पर आधारित होता है। यह हर साल जनवरी के आखिर या फरवरी की शुरुआत में आता है और लगभग 15 दिनों तक मनाया जाता है। इस साल यह 17 फरवरी को आ रहा है। इसे ‘स्प्रिंग फ़ेस्टिवल’ भी कहते हैं, क्योंकि यह सर्दी के खत्म होने और वसंत के आने का संकेत देता है। दुनिया भर में जहां-जहां चीनी समुदाय है, वहां यह त्योहार पूरे जोश से मनाया जाता है। चीन में तो हर तरफ रौनक होती है। आसमान लालटेन, झंडियों और रोशनी से भर जाता है।

दरअसल, घोड़े की खासियत होती है उसकी तेजी, ताकत, और एक अलग ही शान। यही खूबियां घोड़े के साल से भी जुड़ी मानी जाती हैं। कहा जाता है कि यह साल जीवन में तेज बदलाव और नई ऊर्जा लेकर आता है। जो लोग अपने करियर में आगे बढ़ना चाहते हैं या कुछ नया करने का साहस जुटा रहे हैं, उनके लिए यह साल खास माना जाता है। चीनी मान्यताओं में घोड़े में ‘यांग’ ऊर्जा होती है, जो जोश, गर्माहट, और सक्रियता का प्रतीक है। मतलब साफ है कि यह साल सिर्फ सोचते रहने का नहीं, बल्कि उठकर काम करने का है। घोड़ा हमें सिखाता है कि अगर दिशा सही हो और हिम्मत बनी रहे, तो मंज़िल दूर नहीं रहती।

घोड़े से जुड़ी एक रोचक पौराणिक कथा भी है। कहा जाता है कि चीन के ‘जेड सम्राट’ ने जानवरों के बीच एक दौड़ रखी थी ताकि तय हो सके कि राशि चक्र में कौन-सा जानवर किस स्थान पर आएगा। घोड़ा तेज दौड़ रहा था और उसे पूरा भरोसा था कि वह आगे रहेगा। लेकिन फिनिश लाइन के पास पहुंचते ही एक सांप, जो उसके पास छिपा था, अचानक बाहर आ गया। घोड़ा पल भर को चौंक गया और उसी दौरान सांप आगे निकल गया। नतीजा यह हुआ कि सांप छठे स्थान पर और घोड़ा सातवें स्थान पर पहुंचा। यह कहानी हमें यह सिखाती है कि जीवन में काबिलियत के बावजूद कभी-कभी छोटी रुकावटें रास्ता रोक सकती हैं। फर्क इस बात से पड़ता है कि आप रुकते हैं या आगे बढ़ते रहते हैं। घोड़ा रुका नहीं, उसने अपनी जगह बनाई।

चीन में घोड़े के नववर्ष का जश्न सचमुच देखने लायक होता है। यह सिर्फ तारीख बदलने का दिन नहीं, बल्कि नई शुरुआत का संदेश होता है। हर तरफ लाल रंग छा जाता है। लाल लालटेनें, लाल कपड़े, और लाल लिफ़ाफ़े यानी ‘होंगपाओ’ दिखाई देते हैं। लाल रंग को सौभाग्य और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। सड़कों पर ड्रैगन डांस होता है, घोड़ों की बड़ी-बड़ी सजावट लगती है, और लोग एक-दूसरे को खुशहाली की शुभकामनाएं देते हैं। आतिशबाजी से आसमान गूंज उठता है, मानो पुराने साल की परेशानियों को विदा किया जा रहा हो।

इन सबके बीच इस त्योहार की सबसे बड़ी खासियत है परिवार का साथ। नववर्ष पर घर लौटने की परंपरा इतनी मज़बूत है कि इसे दुनिया का सबसे बड़ा मानव प्रवास कहा जाता है। लोग चाहे कितनी भी दूर हों, परिवार के साथ ‘रीयूनियन डिनर’ करने की कोशिश जरूर करते हैं। खाने की मेज पर कई तरह के पकवान होते हैं, खासकर डंपलिंग्स, जो समृद्धि का प्रतीक माने जाते हैं। यह सब हमें याद दिलाता है कि ज़िंदगी की दौड़ में हमारी असली ताकत हमारा परिवार और हमारी जड़ें ही हैं।

अगर सोचकर देखें, तो घोड़ा वर्ष हमारे लिए एक साफ संदेश लाता है कि अब आगे बढ़ने का समय है। घोड़ा आजादी और साहस का प्रतीक है। यह साल हमें प्रेरित करता है कि हम अपने डर और झिझक को पीछे छोड़ें। जो काम टलते जा रहे थे, जो फैसले लेने से डर लग रहा था, उनके लिए यही सही वक्त है।

घोड़ा नववर्ष हमें उम्मीद और हौसले का संदेश देता है। यह बताता है कि जिंदगी एक लंबी दौड़ है। रास्ते में उतार-चढ़ाव आएंगे, कभी गति धीमी भी होगी, लेकिन रुकना नहीं है। हां, एक बात याद रखना जरूरी है। घोड़ा कभी-कभी जिद्दी भी हो सकता है। बिना सोचे-समझे तेज भागना नुकसान भी पहुंचा सकता है, इसलिए संतुलन जरूरी है।

(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

--आईएएनएस

डीकेपी/

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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पाकिस्तान की सेना पर निर्भरता ने बलूचिस्तान संकट बढ़ाया, 77 साल बीत गए लेकिन असल वजह समझ नहीं पाया: रिपोर्ट

क्वेटा, 15 फरवरी (आईएएनएस)। पाकिस्तान क्यों बलूचिस्तान संकट हल नहीं कर पा रहा! इस पर एक रिपोर्ट रोशनी डालती है। ये बताती है कि इसकी असल वजह प्रांत की मूलभूत जरूरतों को न समझना और बल से राज करने की नीति जिम्मेदार है। मॉडर्न डिप्लोमेसी में छपी रिपोर्ट कहती है कि दशकों के सैन्य अभियान, सियासी दांव-पेंच के जरिए इस क्षेत्र का दोहन किया गया है।

पाकिस्तान के कुल जमीनी इलाके का लगभग 44 फीसदी हिस्सा बलूचिस्तान में पड़ता है, जबकि यहां देश के महज 6 फीसदी लोग रहते हैं। लेकिन विडंबना है कि यह पाकिस्तान का सबसे गरीब प्रांत होने के साथ-साथ सबसे ज्यादा संसाधन युक्त प्रांत भी है। यहां नैचुरल गैस, कॉपर, सोने के बड़े खान और स्ट्रेटेजिक रूप से अहम बंदरगाह भी मौजूद हैं।

आलोचक लंबे समय से आरोप लगाते रहे हैं कि इस्लामाबाद को बलूचिस्तान की नेचुरल दौलत से फायदा होता है, जबकि स्थानीय समुदाय अभी भी फटेहाल है। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रांत से निकाली गई नेचुरल गैस पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों को सप्लाई की जाती है, वहीं कई बलूच बस्तियों में बिजली गुल रहती है।

बलूचिस्तान और पाकिस्तानी सरकार के बीच तनाव आजादी के समय से है। 1947 में, जब ब्रिटिश इंडिया का बंटवारा हुआ, तो बलूचिस्तान कलात के खान की एक रियासत थी। उन्होंने 15 अगस्त, 1947 को आजादी का ऐलान किया, उसी दिन भारत और पाकिस्तान आजाद देश के तौर पर उभरे। पाकिस्तान ने इस दावे को नहीं माना और 1948 में बलूचिस्तान पर कब्जा जमा लिया।

तब से समय-समय पर हिंसक गतिविधियां होती रही हैं। इस साल 31 जनवरी को, बलूचिस्तान के लगभग एक दर्जन शहरों में हुए कोऑर्डिनेटेड हमलों में 30 से ज्यादा आम लोग और 18 पुलिस वाले मारे गए। बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने पाकिस्तान के सबसे बड़े प्रांत में ऐसा हमला किया गया जिसे दुनिया देखती रह गई और इसे आपसी तालमेल का जबरदस्त नतीजा बताया गया। इसके बाद पाक सुरक्षा बलों ने 150 से ज्यादा लड़ाकों को मारने का दावा किया।

हमलों के एक दिन बाद, मुख्यमंत्री सरफराज बुगती ने कहा, इसका जवाब सियासी बातचीत के बजाय सेना के पास है। बलूचिस्तान में 1948 से रुक-रुक कर बगावत होती रही है और इस तरह प्रांत में बगावत के 77 साल हो गए हैं।

पहले बगावत 1950, 1960 और 1970 के दशक में हुई थीं। रिपोर्ट के मुताबिक, ये प्रक्रिया लगभग एक सी रहती है: शिकायतें बढ़ती हैं, विरोध तेज होते हैं, सरकार ताकत से जवाब देती है, हिंसा बढ़ती है, मिलिट्री ऑपरेशन कुछ हद तक शांति बहाल करते हैं, और मुख्य मुद्दे अनसुलझे रह जाते हैं। इसमें कहा गया, पैटर्न साफ है। लेकिन सबक, जाहिर नहीं है।

वर्तमान बगावत का ढांचा अलग हो गया है। अब युवा, मध्यम वर्ग और महिलाओं को तेजी से इसमें शामिल किया जा रहा है। हथियारबंद ग्रुप अब अपने कैंपेन को कॉलोनियल स्टाइल के शोषण के खिलाफ नेशनल लिबरेशन संघर्ष के तौर पर देखते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान रेवेन्यू-शेयरिंग या स्थानीय हिस्सेदारी के मुद्दों को सुलझाने के बजाय सेना की तैनाती बढ़ा रहा है। सेना की खूब तैनाती हो रही है, फिर भी बड़े हमले जारी हैं।

वहीं, सिंगापुर के एस. राजारत्नम स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के अब्दुल बासित ने ज्योग्राफिकल चुनौती पर जोर दिया, यह देखते हुए कि बलूचिस्तान का ऊबड़-खाबड़ इलाका जर्मनी से भी बड़े एरिया में फैला हुआ है, जहां आबादी कम है और पहाड़ी इलाके हथियारबंद गुटों को पनाह देते हैं।

उन्होंने पूछा, क्या आप इतने बड़े प्रांत में, ऐसे इलाके में, हिंसा को पूरी तरह खत्म करने के लिए सिक्योरिटी तैनात कर सकते हैं? खासकर तब जब सरकार लोकल फॉल्टलाइन को देखने से मना कर दे? उन्होंने सुझाव दिया कि भूगोल दमन को मुश्किल बनाता है, लेकिन असली वजहों को न सुलझाने से हल और भी मुश्किल हो जाता है।

बर्लिन की एक स्कॉलर, साहेर बलूच ने तर्क दिया कि इलाके की जानकारी विद्रोहियों को फायदा पहुंचाती है। उन्होंने कहा, लड़ाके सिक्योरिटी फोर्स से बेहतर इलाके को जानते हैं। उन्हें कमजोरियों को सामने लाने के लिए कभी-कभी हमला करने की जरूरत होती है। जहां सरकार भरोसे के बजाय खौफ से राज करती है, वहां इंटेलिजेंस खत्म हो जाती है। लोग सहयोग नहीं करते, और इसीलिए हाई सिक्योरिटी जोन में भी सेंधमारी हो जाती है।

जबरन गायब किए जाने का मुद्दा खास तौर पर विवादित बना हुआ है। एक्टिविस्ट का आरोप है कि हजारों लोगों को अगवा किया गया है, जिनमें से कुछ बाद में टॉर्चर के निशान के साथ मरे हुए पाए गए।

सरकार इसमें शामिल होने से इनकार करती है। जिम्मेदारी चाहे जिसकी भी हो, रिपोर्ट बताती है कि इसका असर समुदायों को कट्टरपंथी बना रहा है। गायब हुए लोगों के परिवार, साथ ही बड़े सोशल नेटवर्क, सरकार को अपना दुश्मन मानने लगे हैं।

बलूचिस्तान में स्पेशलाइजेशन करने वाले कैम्ब्रिज के डॉक्टरेट कैंडिडेट रफीउल्लाह काकर ने कहा कि पाकिस्तान को जबरदस्ती और सेना के जरिए राज करने की नीति से बचना होगा।

काकर ने भरोसेमंद राजनीतिक प्रतिनिधित्व पक्का करने, एक ट्रुथ एंड रिकंसिलिएशन कमीशन बनाने और लंबे समय से चली आ रही पॉलिटिकल, इकोनॉमिक और गवर्नेंस से जुड़ी शिकायतों से निपटने के लिए सिस्टम बनाने जैसे कदम सुझाए हैं।

--आईएएनएस

केआर/

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