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ख्वाजा आसिफ के 9/11 बयान पर अफगानिस्तान में तीखी प्रतिक्रिया

काबुल, 14 फरवरी (आईएएनएस)। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ द्वारा संसद में दिए गए उस बयान, जिसमें उन्होंने 9/11 के बाद पाकिस्तान के अमेरिका के लिए “खुद को किराये पर देने” की बात स्वीकार की, पर अफगानिस्तान में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।

‘अफगान डायस्पोरा नेटवर्क’ की रिपोर्ट के अनुसार, आसिफ के इस बयान ने अफगानों की उस लंबे समय से चली आ रही धारणा को मजबूत किया है कि इस्लामाबाद ने एक ओर उग्रवादी समूहों को समर्थन दिया, तो दूसरी ओर क्षेत्रीय नैरेटिव को प्रभावित करते हुए इसकी कीमत अफगान समाज को चुकानी पड़ी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कई प्रमुख अफगान नेताओं ने आसिफ के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य प्रतिष्ठान पर अफगानिस्तान में “दोहरी नीति” अपनाने का आरोप लगाया है।

पूर्व अफगान खुफिया प्रमुख रहमतुल्लाह नबील ने इसे “ईमानदार स्वीकारोक्ति नहीं, बल्कि दशकों पुरानी नीतियों को साफ-सुथरा दिखाने की कोशिश” बताया।

रिपोर्ट के मुताबिक, नबील ने आसिफ के बयान में विरोधाभासों की ओर इशारा करते हुए कहा कि वही नेता, जो अब अफगान नीति को राजनीतिक भूल बता रहे हैं, तालिबान की सत्ता में वापसी के समय धार्मिक वैधता का हवाला दे रहे थे।

नबील के अनुसार, पाकिस्तान की अफगान नीति हमेशा विचारधारा, भू-राजनीति और अवसरवाद का मिश्रण रही है, और इसे केवल “राजनीतिक गलती” बताना अफगानों द्वारा झेली गई मानवीय कीमत से बचने की कोशिश है।

रिपोर्ट में बताया गया कि अफगानिस्तान में अमेरिका के पूर्व राजदूत ज़ल्मय खलीलजाद ने भी आसिफ के बयान को अलग दृष्टिकोण से देखा।

खलीलजाद ने कहा कि आतंक के खिलाफ अमेरिकी नेतृत्व वाले युद्ध के दौरान पाकिस्तान को सैन्य और वित्तीय सहायता के रूप में अरबों डॉलर मिले, लेकिन उसी समय उसकी सुरक्षा संस्थाएं तालिबान को शरण देती रहीं।

पूर्व अफगान सांसद मरियम सोलैमंखिल ने कहा कि आसिफ की टिप्पणी “सिर्फ विरोधाभासी ही नहीं, बल्कि अफगान जनता की पीड़ा को नजरअंदाज करने वाली” है।

उनके अनुसार, अफगानिस्तान में पाकिस्तान की दशकों पुरानी भूमिका वैश्विक राजनीति का आकस्मिक परिणाम नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति थी, जिसमें मदरसों के पाठ्यक्रम और जिहादी नैरेटिव शामिल थे।

रिपोर्ट में कहा गया कि आलोचकों का मानना है कि पाकिस्तान भू-राजनीतिक दबावों का केवल शिकार नहीं था, बल्कि अफगानिस्तान को अस्थिर करने वाली ताकतों का सक्रिय निर्माता भी रहा।

--आईएएनएस

डीएससी

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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बांग्लादेश: विवादित इतिहास और कट्टर छवि के कारण जमात-ए-इस्लामी सत्ता से रही दूर

ढाका, 14 फरवरी (आईएएनएस)। हाल ही में संपन्न 13वें संसदीय चुनाव में दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरने के बावजूद जमात-ए-इस्लामी अपनी संख्यात्मक ताकत को सार्थक राजनीतिक सफलता में नहीं बदल सकी।

‘इंटरनेशनल बिजनेस टाइम्स’ (आईबीटी) की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह विरोधाभास केवल मौजूदा चुनावी समीकरणों तक सीमित नहीं है, बल्कि पार्टी के ऐतिहासिक फैसलों, वैचारिक कठोरता और दक्षिण एशियाई मुस्लिम इतिहास के कुछ सबसे दर्दनाक अध्यायों में उसकी विवादित भूमिका से भी जुड़ा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जमात-ए-इस्लामी की वैधता के संकट को समझने के लिए उसके गठन और राजनीतिक आचरण पर नजर डालना जरूरी है।

पार्टी के संस्थापक मौलाना मौदूदी विभाजन के बाद अपनी राजनीतिक संरचना के साथ पाकिस्तान चले गए थे, जहां उन्होंने अपना वैचारिक एजेंडा लागू करने की कोशिश की। रिपोर्ट के अनुसार, समय के साथ पार्टी ने अपने इस्लामी दृष्टिकोण को लागू करने के लिए सशस्त्र संघर्ष का रास्ता भी अपनाया।

रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि पाकिस्तान में जमात-ए-इस्लामी और उसकी छात्र शाखा इस्लामी जमीअत-ए-तलाबा का इतिहास हिंसा और उग्रवाद से जुड़ा रहा है। विभिन्न विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति के दौरान बूथ कैप्चरिंग, विरोधियों का अपहरण, हत्या और हिंसक धमकी जैसी घटनाओं का उल्लेख किया गया है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जब पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के बंगाली मुसलमानों ने पश्चिमी पाकिस्तान की नीतियों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया, तब जमात-ए-इस्लामी ने उनके साथ खड़े होने के बजाय पाकिस्तानी सेना का साथ दिया।

रिपोर्ट के मुताबिक, उस दौर में पार्टी पर बंगाली मुसलमानों के खिलाफ हिंसा में शामिल होने के आरोप लगे, जिससे उसकी छवि पर गहरा असर पड़ा।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जमात-ए-इस्लामी जिस राजनीतिक विचारधारा और इस्लाम की व्याख्या को बढ़ावा देती है, वह दक्षिण एशिया की सामाजिक संरचना में व्यापक स्वीकृति नहीं पा सकी है।

इसके अनुसार, पार्टी के लिए जमीनी स्तर पर बुनियादी बदलाव किए बिना दीर्घकालिक राजनीतिक सफलता हासिल करना कठिन है।

रिपोर्ट में निष्कर्ष दिया गया है कि वैश्विक समुदाय और बंगाली मुसलमान दोनों ही जमात-ए-इस्लामी के अतीत और उसकी भूमिका से भली-भांति परिचित हैं, जो आज भी उसकी राजनीतिक स्वीकार्यता पर असर डालता है।

--आईएएनएस

डीएससी

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