बांग्लादेश: विवादित इतिहास और कट्टर छवि के कारण जमात-ए-इस्लामी सत्ता से रही दूर
ढाका, 14 फरवरी (आईएएनएस)। हाल ही में संपन्न 13वें संसदीय चुनाव में दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरने के बावजूद जमात-ए-इस्लामी अपनी संख्यात्मक ताकत को सार्थक राजनीतिक सफलता में नहीं बदल सकी।
‘इंटरनेशनल बिजनेस टाइम्स’ (आईबीटी) की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह विरोधाभास केवल मौजूदा चुनावी समीकरणों तक सीमित नहीं है, बल्कि पार्टी के ऐतिहासिक फैसलों, वैचारिक कठोरता और दक्षिण एशियाई मुस्लिम इतिहास के कुछ सबसे दर्दनाक अध्यायों में उसकी विवादित भूमिका से भी जुड़ा है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जमात-ए-इस्लामी की वैधता के संकट को समझने के लिए उसके गठन और राजनीतिक आचरण पर नजर डालना जरूरी है।
पार्टी के संस्थापक मौलाना मौदूदी विभाजन के बाद अपनी राजनीतिक संरचना के साथ पाकिस्तान चले गए थे, जहां उन्होंने अपना वैचारिक एजेंडा लागू करने की कोशिश की। रिपोर्ट के अनुसार, समय के साथ पार्टी ने अपने इस्लामी दृष्टिकोण को लागू करने के लिए सशस्त्र संघर्ष का रास्ता भी अपनाया।
रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि पाकिस्तान में जमात-ए-इस्लामी और उसकी छात्र शाखा इस्लामी जमीअत-ए-तलाबा का इतिहास हिंसा और उग्रवाद से जुड़ा रहा है। विभिन्न विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति के दौरान बूथ कैप्चरिंग, विरोधियों का अपहरण, हत्या और हिंसक धमकी जैसी घटनाओं का उल्लेख किया गया है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जब पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के बंगाली मुसलमानों ने पश्चिमी पाकिस्तान की नीतियों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया, तब जमात-ए-इस्लामी ने उनके साथ खड़े होने के बजाय पाकिस्तानी सेना का साथ दिया।
रिपोर्ट के मुताबिक, उस दौर में पार्टी पर बंगाली मुसलमानों के खिलाफ हिंसा में शामिल होने के आरोप लगे, जिससे उसकी छवि पर गहरा असर पड़ा।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जमात-ए-इस्लामी जिस राजनीतिक विचारधारा और इस्लाम की व्याख्या को बढ़ावा देती है, वह दक्षिण एशिया की सामाजिक संरचना में व्यापक स्वीकृति नहीं पा सकी है।
इसके अनुसार, पार्टी के लिए जमीनी स्तर पर बुनियादी बदलाव किए बिना दीर्घकालिक राजनीतिक सफलता हासिल करना कठिन है।
रिपोर्ट में निष्कर्ष दिया गया है कि वैश्विक समुदाय और बंगाली मुसलमान दोनों ही जमात-ए-इस्लामी के अतीत और उसकी भूमिका से भली-भांति परिचित हैं, जो आज भी उसकी राजनीतिक स्वीकार्यता पर असर डालता है।
--आईएएनएस
डीएससी
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Noida Engineer Death: बर्खास्त होने के बाद भी JE Naveen Kumar कर रहा ड्यूटी
Noida Engineer Death: नोएडा प्राधिकरण की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है. इंजीनियर युवराज की मौत के मामले में लापरवाही के आरोप में जेई नवीन कुमार की सेवा समाप्त कर दी गई थी. इस मामले में प्रदेश सरकार ने सख्ती दिखाई थी. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दोषियों पर कार्रवाई के आदेश दिए थे और जांच के लिए एसआईटी का गठन किया गया था. उस समय प्राधिकरण के तत्कालीन सीईओ को भी लखनऊ अटैच कर दिया गया था. लेकिन अब एक नया वीडियो सामने आया है, जिसने पूरे मामले को फिर से गरमा दिया है.
13 फरवरी का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें बर्खास्त किए गए जेई नवीन कुमार सेक्टर-71 में अवैध निर्माण के खिलाफ बुलडोजर कार्रवाई का नेतृत्व करते दिखाई दे रहे हैं. बताया जा रहा है कि यह कार्रवाई वर्क सर्किल-5 में की गई थी.
आखिर कैसे पावर में दिख रहे नवीन कुमार
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब नवीन कुमार की सेवा 18 जनवरी को समाप्त कर दी गई थी, तो वे दोबारा किस अधिकार से कार्रवाई करते दिख रहे हैं? सूत्रों के अनुसार, वह ट्रैफिक सेल में जीएम एसपी सिंह और सीनियर मैनेजर विश्वास त्यागी को रिपोर्ट करते थे. आरोप है कि इनकी सरपरस्ती में ही वह अब भी काम कर रहे हैं.
नहीं मिला कोई स्पष्ट जवाब
नोएडा प्राधिकरण की ओर से अभी तक इस पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया है. कुछ अधिकारियों का कहना है कि वे घूमते हुए मौके पर पहुंच गए होंगे, लेकिन जिस तरह से वे बुलडोजर कार्रवाई को लीड करते दिख रहे हैं, उससे यह दलील कमजोर लगती है.
प्राधिकरण की कार्यशैली पर उठ रहे सवाल
युवराज की मौत को अभी एक महीना भी पूरा नहीं हुआ है और एसआईटी की जांच भी पूरी नहीं हुई है. ऐसे में बर्खास्त अधिकारी का फिर से ड्यूटी करते दिखना प्राधिकरण की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है. अब सभी की नजर इस बात पर है कि शासन और प्राधिकरण के नए सीईओ इस मामले में क्या कदम उठाते हैं और क्या वास्तव में दोषियों पर सख्त कार्रवाई होती है या नहीं.
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