यादों में कविता : 'सर्फ की खरीदारी में ही समझदारी है...' वो ललिता जी, जिन्होंने आसमान में 'उड़ान' भरना भी सिखाया
मुंबई, 14 फरवरी (आईएएनएस)। 1980 के दशक में भारतीय टेलीविजन पर एक विज्ञापन आता था। साधारण सी साड़ी में एक महिला, सब्जी वाले से मोलभाव करते हुए बड़ी बेबाकी से कहती थी, "भाई साहब, सस्ती चीज और अच्छी चीज में फर्क होता है।" वह आवाज किसी फिल्मी स्टार की नहीं थी, बल्कि हर भारतीय घर की उस समझदार गृहिणी की थी, जो पाई-पाई का हिसाब रखना जानती थी। वह 'ललिता जी' यानी कविता चौधरी थीं। एक ऐसा नाम, जिन्होंने भारतीय टेलीविजन को सिर्फ एंटरटेनमेंट बॉक्स नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का हथियार बनाया।
यादों में कविता : 'सर्फ की खरीदारी में ही समझदारी है...' वो ललिता जी, जिन्होंने आसमान में 'उड़ान' भरना भी सिखाया
मुंबई, 14 फरवरी (आईएएनएस)। 1980 के दशक में भारतीय टेलीविजन पर एक विज्ञापन आता था। साधारण सी साड़ी में एक महिला, सब्जी वाले से मोलभाव करते हुए बड़ी बेबाकी से कहती थी, "भाई साहब, सस्ती चीज और अच्छी चीज में फर्क होता है।" वह आवाज किसी फिल्मी स्टार की नहीं थी, बल्कि हर भारतीय घर की उस समझदार गृहिणी की थी, जो पाई-पाई का हिसाब रखना जानती थी। वह 'ललिता जी' यानी कविता चौधरी थीं। एक ऐसा नाम, जिन्होंने भारतीय टेलीविजन को सिर्फ एंटरटेनमेंट बॉक्स नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का हथियार बनाया।
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