इंदौर में वर्ल्ड स्पाइन डे पर 80 डॉक्टरों ने निकाली साइक्लोथॉन, रीढ़ की सर्जरी का डर दूर करने की पहल
मध्य प्रदेश के इंदौर शहर से रीढ़ की हड्डी की सेहत और तंदुरुस्ती को लेकर एक बेहद सकारात्मक और अच्छी खबर सामने आई है। वर्ल्ड स्पाइन डे के मौके शुक्रवार डॉक्टरों ने शहर की सड़कों पर एक खास साइक्लोथॉन निकाली। इस रैली का मुख्य मकसद आम लोगों के बीच रीढ़ की हड्डी की बीमारियों और उसकी सर्जरी को लेकर फैले डर और भ्रांतियों को दूर करना था।
स्पाइन सर्जरी करा चुके मरीज भी डॉक्टरों संग चलाते दिखे साइकिल
इस साइक्लोथॉन की सबसे खास और ध्यान खींचने वाली बात यह रही कि हाल ही में रीढ़ की हड्डी का ऑपरेशन करा चुके एक-दो मरीज भी डॉक्टरों के साथ कदम से कदम मिलाकर साइकिल चलाते नजर आए। इन मरीजों की इस सक्रिय भागीदारी के जरिए समाज में यह बड़ा संदेश दिया गया कि अगर सही समय पर उचित इलाज और डॉक्टर की सलाह से रिकवरी की जाए, तो इंसान ऑपरेशन के बाद भी एक दम सामान्य और एक्टिव जिंदगी आराम से जी सकता है।
शहर के कई बड़े और वरिष्ठ स्पाइन सर्जनों ने किया नेतृत्व
इस रैली का सफल नेतृत्व ISSA के अध्यक्ष डॉ. एसके लूनावत, उपाध्यक्ष डॉ. प्रसाद पटगांवकर और सचिव डॉ. अविनाश जैन ने किया। इसके साथ ही एसोसिएशन ऑफ ऑर्थोपेडिक सर्जन्स ऑफ इंदौर (AOSI) के सचिव डॉ. प्रणव महाजन, वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉ. मसंद और डॉ. मनचंदा समेत कई अन्य नामचीन डॉक्टरों ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया। सभी ने एक सुर में कहा कि नियमित शारीरिक गतिविधि इंसान को हमेशा स्वस्थ बनाए रखती है।
साइक्लिंग ग्रुप्स और इंदौर ट्रैफिक पुलिस का मिला पूरा सहयोग
इस आयोजन को सफल और सुरक्षित बनाने में शहर के एक्टिव साइकिल राइडर्स और इंदौर पुलिस ने बहुत ही सराहनीय भूमिका निभाई। ट्रैफिक पुलिस ने पूरे रास्ते भर मुस्तैदी से मोर्चा संभाला ताकि रैली बिना किसी रुकावट के सुचारू रूप से निकल सके। आयोजन के अंत में एसोसिएशन की ओर से इस मुहिम में मदद करने वाले सभी डॉक्टरों, एनेस्थीसिया क्लब के सदस्यों, साइकिल राइडर्स और जिला प्रशासन का दिल से आभार व्यक्त किया गया।
बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर बैन की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब, 3 दिसंबर को अगली सुनवाई
नई दिल्ली, 16 अक्टूबर (आईएएनएस)। बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने और उन्हें ऑनलाइन खतरों से बचाने के लिए सख्त नियम बनाने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इस मामले की अगली सुनवाई 3 दिसंबर को होगी।
यह याचिका एमराल्ड हाइट्स इंटरनेशनल स्कूल और उसके निदेशक ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की है। याचिका में कहा गया है कि बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाना राज्य सरकार और केंद्र सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है। सोशल मीडिया के कारण बच्चे कई तरह की मानसिक और शारीरिक दिक्कतों से जूझ रहे हैं। ऐसी स्थिति में बच्चों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाना ही एकमात्र व्यावहारिक विकल्प है।
याचिकाकर्ताओं ने बच्चों द्वारा सोशल मीडिया के इस्तेमाल से उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर गहरी चिंता जताई है। याचिका में कहा गया है कि सोशल मीडिया का अनियंत्रित इस्तेमाल बच्चों में डिप्रेशन, घबराहट, चिंता, भावनात्मक परेशानी और कम आत्मसम्मान जैसी समस्याओं का कारण बन सकता है।
इसके अलावा, याचिका में बच्चों के व्यवहार से जुड़ा डेटा इकट्ठा करने और ऐसे प्लेटफॉर्म डिजाइन का इस्तेमाल करने का मुद्दा भी उठाया गया है, जिनका मकसद बच्चों को लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर उलझाए रखना होता है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इनमें से कुछ खतरे तुरंत सामने नहीं आते और अक्सर माता-पिता या शिक्षकों को इनका पता तब तक नहीं चलता, जब तक कि काफी नुकसान न हो चुका हो।
सोशल मीडिया और स्मार्टफोन का अत्यधिक इस्तेमाल बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है और इसी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट का यह नोटिस अहम माना जा रहा है। कई मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि करीब 37 प्रतिशत बच्चे डिप्रेशन, एंग्जायटी (चिंता) और साइबर बुलिंग (ऑनलाइन उत्पीड़न) से पीड़ित हैं। करीब 12 से 13 वर्ष की उम्र के बच्चों में सोशल मीडिया के कारण चिंता और अवसाद का खतरा दोगुना हो जाता है।
--आईएएनएस
वीकेयू/एएस
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