उत्तराखंड High Court ने परिवार के 3 लोगों की हत्या के दोषी की फांसी की सजा पलटी
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने अधीनस्थ अदालत द्वारा एक तिहरे हत्याकांड में अपनी मां, बड़े भाई और गर्भवती भाभी की तलवार से बेरहमी से हत्या करने के दोषी ठहराए गए व्यक्ति की मौत की सजा को बृहस्पतिवार को रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के बाद यह आदेश दिया। इससे पहले, अदालत ने मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि दोषी की मानसिक बीमारी का उचित इलाज कराया जाए और उसके ठीक होने पर उसे रिहा कर दिया जाए। सुनवाई के दौरान, उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार से दोषी से जुड़े रिकॉर्ड की जांच करने और यह पता लगाने को कहा कि क्या घटना के समय वह किसी गंभीर मानसिक बीमारी से पीड़ित था। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि क्या मौत की सजा सुनाते समय उसकी मानसिक स्थिति से जुड़े किसी अहम तथ्य को नजरअंदाज कर दिया गया था।
टिहरी जिले के गुमल गांव के रहने वाले संजय सिंह ने 13 दिसंबर 2014 को एक मामूली विवाद के बाद, तलवार से अपनी मां, बड़े भाई और गर्भवती भाभी की हत्या कर दी थी। उसके पिता राम सिंह पंवार ने इस घटना के संबंध में पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। अगस्त 2021 में, अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश रमा पांडे की अदालत ने संजय सिंह को दोषी ठहराते हुए उसे मौत की सजा सुनाई।
इसके बाद सिंह ने इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने दोषी का पक्ष रखने के लिए वरिष्ठ वकील अरविंद वशिष्ठ को न्याय मित्र नियुक्त किया। वशिष्ठ ने अदालत को बताया कि मौत की सजा पाए दोषी को एक मानसिक बीमारी है।
एक मेडिकल बोर्ड ने भी उसे मानसिक रूप से बीमार पाया और कहा कि वह अपने कार्यों के परिणामों को समझने में असमर्थ है। हांलांकि, बोर्ड ने यह भी कहा कि उसकी बीमारी का इलाज संभव है और सही इलाज मिलने पर वह ठीक हो सकता है। सिंह की ओर से दलील दी गयी कि अधीनस्थ अदालत ने मौत की सजा सुनाते समय इस महत्वपूर्ण पहलू को नजरअंदाज कर दिया था।
इससे पहले, उच्च न्यायालय ने मामले को पुनर्विचार के लिए अधीनस्थ अदालत के पास वापस भेजा था, ताकि मौत की सजा की पुष्टि करने से पहले दोषी की शारीरिक और मानसिक स्थिति की जांच की जा सके। पुनर्विचार के बाद, अधीनस्थ अदालत ने कहा कि यह साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है कि घटना के समय दोषी किसी ऐसी बीमारी से पीड़ित था, जिसके प्रभाव में आकर उसने यह अपराध किया हो। अधीनस्थ अदालत ने यह भी कहा था कि उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार मामले पर फिर से सुनवाई की गई है और सभी संबंधित तथ्यों पर विचार करने के बाद अपने पिछले आदेश में बदलाव करने का कोई आधार नहीं बनता है।
Election Commission 17 राज्यों में कराएगा SSR, राजनीतिक दलों को मिलेगी पढ़ने योग्य मतदाता सूची
निर्वाचन आयोग पहली बार उन 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के राजनीतिक दलों को मतदाता सूची पढ़ने योग्य प्रारूप में उपलब्ध कराएगा, जहां उसने बृहस्पतिवार को मतदाता सूचियों के वार्षिक विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (एसएसआर) कराने का आदेश दिया है। जिन राज्यों में एसएसआर कराया जाएगा, उनमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब और मणिपुर शामिल हैं। इन राज्यों में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं।
इन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अंतिम मतदाता सूची चार जनवरी को प्रकाशित की जाएगी। मशीन द्वारा पढ़े जाने योग्य मतदाता सूची की उपलब्धता विपक्षी दलों की एक प्रमुख मांग रही है। हालांकि, आंकड़ों में हेरफेर की आशंकाओं और अदालती आदेशों का हवाला देते हुए निर्वाचन आयोग (ईसी) ने फिलहाल के लिए इस मांग को खारिज कर दिया है।
एक अहम बदलाव के तहत, ईसी राजनीतिक दलों को मतदाता सूचियों की सॉफ्ट कॉपी उपलब्ध कराएगा। अब मसौदा और अंतिम मतदाता सूचियां (बिना फोटो के) इमेज पीडीएफ के बजाय पढ़ने योग्य पीडीएफ प्रारूप में दी जाएंगी। मसौदा चरण में नाम जोड़ने, हटाने और संशोधन से संबंधित पूरक दस्तावेज मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के साथ साझा किए जाएंगे।
इन 17 राज्यों में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पूरा हो चुका है। वहीं, असम में कानूनी कारणों से एसआईआर के बजाय विशेष पुनरीक्षण कराया गया। मतदाता सूची के पुनरीक्षण का उद्देश्य पात्र मतदाताओं, खासकर युवाओं और पहली बार मतदान करने वालों के नाम मतदाता सूची में शामिल करना, इसकी प्रविष्टियों में सुधार करना और इसमें संशोधन को और बेहतर बनाना है।
जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एसएसआर कराया जाएगा, उनमें अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, लक्षद्वीप, मध्य प्रदेश, मणिपुर, पुडुचेरी, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल शामिल हैं। वहीं, इस फैसले को लेकर कांग्रेस ने बृहस्पतिवार को निर्वाचन आयोग पर निशाना साधा। कांग्रेस के संगठन महासचिव के. सी. वेणुगोपाल ने कहा, ‘‘ज्ञानू, (मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार) भाई, इतना काफी नहीं है।
आपको इस्तीफा दे देना चाहिए और सरकारी गवाह बन जाना चाहिए। मोदी-शाह के निर्देशों पर आपने जो नुकसान किया है, उसकी भरपाई अब अधिसूचना के जरिये यू-टर्न लेने से नहीं होगी।’’ उन्होंने ‘एक्स’ पर कहा, ‘‘हम 2025 से ही मशीन से पढ़ी जा सकने वाली मतदाता सूचियों की मांग कर रहे हैं। पारदर्शिता एक न्यूनतम आवश्यकता है, यह कोई ऐसी चीज नहीं है जो आपको पिछले अपराधों से मुक्त कर दे।’’ वेणुगोपाल ने कहा, आपको पद से हट जाना चाहिए और चुनावी प्रक्रिया में व्यापक सुधार होना चाहिए, जिसकी शुरुआत संदेहास्पद एसआईआर को वापस लेने और ईसी की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव के साथ होनी चाहिए।
उन्होंने कहा, यह बहुत कम और बहुत देर से उठाया गया कदम है।
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