मेंटल-हेल्थ- शादी के 1 साल बाद बेटी विधवा हो गई:उसके दुख में अब मैं करवा चौथ की खुशी कैसे मनाऊं, उसका दिल टूटेगा
सवाल- मेरी उम्र 55 साल है और मेरी 28 साल की एक बेटी है। पिछले साल हमने बड़े धूमधाम से उसकी शादी की थी। लेकिन शादी के एक साल बाद ही सड़क हादसे में उसके पति की मौत हो गई। तब से वह हमारे साथ ही रह रही है। इस घटना को 8 महीने हो गए। करवा चौथ आने वाला है। मैं हर साल यह व्रत रखती हूं। मेरे पति भी इस दिन मेरे लिए कुछ खास करते हैं। लेकिन इस बार त्योहार के खयाल से ही मन भारी हो रहा है। बेटी के दुख के सामने अपनी खुशी कैसे मनाऊं? क्या मेरी खुशी उसे अपने दुख की याद दिलाएगी? मैं क्या करूं कि उसका पहाड़ जैसा दुख थोड़ा कम हो सके? एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर। सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। मैं आपकी पीड़ा समझ सकता हूं। बेटी के पति की अचानक मौत ने पूरे परिवार को गहरे दुख में डाल दिया है। ये एक बहुत बड़ा साइकोलॉजिकल शॉक है। एक मां होने के नाते आपका मन अपनी बेटी के दुख से जुड़ा हुआ है। ऐसे में अपनी खुशी मनाने के बारे में सोचकर भी मन में अपराधबोध होना स्वाभाविक है। आप चाहती हैं कि बेटी को कोई ऐसी बात न चुभे, जिससे उसका दुख और बढ़ जाए। लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है। बेटी के दुख में उसके साथ खड़े रहने का मतलब यह नहीं है कि आप अपनी हर खुशी छोड़ दें। आप अपनी बेटी से प्यार भी कर सकती हैं और अपने वैवाहिक रिश्ते की खुशियों को संजो भी सकती हैं। इस मुश्किल समय में सबसे जरूरी है कि बेटी को यह महसूस हो कि परिवार उसके दुख को समझता है और उसे इस दुख से उबरने की कोई जल्दी नहीं है। दुख से उबरना सीधी रेखा में नहीं होता हीलिंग का कोई एक सीधा तरीका नहीं है। शोक का कोई एक रंग भी नहीं। कभी उदासी है तो कभी हंसी भी होगी। कभी जीने का मन करेगा, कभी मर जाने का। कभी उम्मीद जागेगी, कभी लगेगा कि अब सब खत्म है। किसी दिन थोड़ा अच्छा महसूस करने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति अपने प्रिय को भूल रहा है। इसी तरह, किसी दिन फिर से बहुत दुखी हो जाने का मतलब यह भी नहीं कि वह अब तक संभल नहीं पाया है। केयरगिवर्स के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि वे इन सारी भावनाओं को सहज भाव से स्वीकार करें। दुख और जिंदगी के बीच संतुलन जरूरी ग्रीफ या दुख का अर्थ लगातार दुखी रहना नहीं है। आधुनिक बिरीवमेंट रिसर्च में एक कॉन्सेप्ट है– डुएल प्रोसेस मॉडल। यह बताता है कि किसी अपने को खोने के बाद इंसान दो तरह की स्थितियों के बीच आता-जाता रहता है। 1. लॉस ओरिएंटेड: इस स्थिति में उसका ध्यान उस व्यक्ति की यादों, उसकी कमी और उससे जुड़ी भावनाओं पर रहता है, जैसेकि– 2. रीस्टोरेशन ओरिएंटेड: दूसरी स्थिति में वह धीरे-धीरे रोजमर्रा की जिंदगी की ओर लौटता है, जैसेकि– इन दोनों स्थितियों का अपना महत्व है। दुख को महसूस करना भी जरूरी है और धीरे-धीरे जिंदगी की ओर लौटना भी। क्या मां को इस बार करवा चौथ नहीं मनाना चाहिए? मेरे विचार से आप करवा चौथ मना सकती हैं, लेकिन इस बार पहले से ज्यादा संवेदनशीलता के साथ। करवा चौथ केवल एक त्योहार नहीं। यह आपके और आपके पति के रिश्ते की एक परंपरा भी है। बेटी की जिंदगी में हुई दुखद घटना के कारण यदि आप अपनी हर खुशी से दूरी बना लेंगी, तो जरूरी नहीं कि इससे उसका दुख कम हो जाए। हो सकता है कि बेटी को आपके साथ और आपके सामान्य जीवन के बीच रहकर ही धीरे-धीरे संभलने का सहारा मिले। हालांकि, यह भी जरूरी है कि त्योहार मनाने का तरीका उसकी भावनाओं को ध्यान में रखकर तय किया जाए। बेटी से पहले बात करें बेटी के मन में क्या चल रहा है, इसका अंदाजा लगाने की बजाय उससे सीधे, लेकिन प्यार से बात करना बेहतर होगा। हो सकता है कि वह आपको व्रत करते देखकर दुखी हो, लेकिन यह भी संभव है कि उसे आपके सामान्य जीवन में लौटने से सुकून मिले। आप उससे कुछ इस तरह कह सकती हैं: “बेटा, करवा चौथ आने वाला है। पापा और मैं हर साल यह त्योहार मनाते रहे हैं। इस बार तुम्हारे दुख से मेरा मन भी बहुत भारी है। मैं नहीं चाहती कि मेरी किसी बात से तुम्हें तकलीफ हो। मैं सोच रही हूं कि इस बार पूजा सादगी से कर लें। तुम हमारे साथ बैठना चाहो तो बैठना, मन न हो तो कोई बात नहीं। तुम्हें किसी भी चीज के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। अगर इस दिन तुम्हारा मन बहुत उदास हो, तो हम तुम्हारे साथ रहेंगे।” इस बातचीत में सबसे महत्वपूर्ण वाक्य है: “तुम्हें कैसा महसूस करना चाहिए, इसका फैसला हम नहीं करेंगे।” इस बातचीत का उद्देश्य बेटी से अनुमति लेना या उस पर कोई फैसला थोपना नहीं है। उद्देश्य है, उसे यह भरोसा दिलाना कि परिवार उसकी भावनाओं का सम्मान करता है। क्या दुख धीरे-धीरे कम हो रहा है? एक जरूरी सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट किसी अपने की अचानक मृत्यु के बाद कई महीनों तक दुखी रहना अपने आप में किसी मेंटल हेल्थ समस्या का संकेत नहीं है। खासकर तब, जब मृत्यु अप्रत्याशित हो और उसके साथ बहुत सारी अधूरी उम्मीदें जुड़ी हों। उसने जिस भविष्य की कल्पना की थी, वह अचानक ही बदल गया। इसलिए यह उम्मीद करना ठीक नहीं है कि कुछ ही महीनों में वह पूरी तरह सामान्य हो जाएगी। हालांकि, यह देखना भी जरूरी है कि दुख के साथ-साथ वह धीरे-धीरे रोजमर्रा की जिंदगी में लौट पा रही है या नहीं। इसके लिए मैं यहां आपको एक छोटा सा ग्रीफ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। हर दो–तीन हफ्ते में बेटी के साथ मिलकर एक बार ये टेस्ट लें और अपने स्कोर को समझें। ग्रीफ एसेसमेंट टेस्ट का रिजल्ट यह कोई डायग्नोस्टिक टेस्ट नहीं है। इसका कोई तय स्कोर भी नहीं है, जिससे बीमारी का पता लगाया जा सके। हर 2–4 सप्ताह में इन सवालों के जवाब देकर देखें कि आपकी स्थिति में कोई बदलाव आ रहा है या नहीं। अगर- तो ऐसी स्थिति में साइकेट्रिस्ट या क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट से 'ग्रीफ एसेसमेंट' कराना चाहिए। अगर 10वें सवाल का जवाब हां है, यानी जीने की इच्छा खत्म हो या खुद को नुकसान पहुंचाने के विचार आएं, तो तुरंत विशेषज्ञ की मदद लें। डिप्रेशन के लक्षणों पर ध्यान देना भी जरूरी शोक और डिप्रेशन एक जैसी स्थितियां नहीं हैं। शोक में दुख अक्सर अपने प्रिय व्यक्ति की याद से जुड़ा होता है। ऐसे में व्यक्ति कभी-कभी हंस भी सकता है या कुछ समय के लिए अच्छा महसूस कर सकता है। वहीं, डिप्रेशन में उदासी, निराशा और किसी भी चीज में खुशी न मिलने का एहसास जिंदगी के लगभग हर हिस्से पर असर डाल सकता है। बेटी की मदद करने के पांच तरीके 1. उसकी बात सुनें। वह पति के बारे में बात करना चाहे तो उसे रोकें नहीं। उसे लगे कि उसकी यादों के लिए घर में जगह है। 2. उसकी छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान रखें। कभी साथ बैठकर चाय पीना, टहलने जाना या उसकी पसंद का खाना बनाना भी सहारा दे सकता है। 3. उसे फैसले लेने दें। वह त्योहार मनाना चाहती है या नहीं, लोगों से मिलना चाहती है या नहीं, इन बातों का फैसला उसी पर छोड़ें। 4. उसे केवल दुख से न पहचानें। वह किसी की पत्नी थी, लेकिन वह आपकी बेटी भी है। उसकी अपनी पसंद, सपने, रुचियां और भविष्य भी हैं। 5. उसे भविष्य के लिए तैयार करने की जल्दी न करें। नई नौकरी, घूमने जाना, दोस्तों से मिलना या कोई नई शुरुआत करना– इन सबके लिए उसे समय दें। प्रोफेशनल हेल्प कब जरूरी? अगर नीचे ग्राफिक में दी स्थितियां या संकेत दिखें तो प्रोफेशनल हेल्प लें– सबसे जरूरी बात बेटी को दुख मनाने दें, लेकिन जिंदगी से दूर न होने दें भारतीय समाज में पति की मृत्यु के बाद महिलाओं से जुड़ी कई धारणाएं आज भी मौजूद हैं। कई बार परिवार अनजाने में ही तय करने लगता है कि उन्हें कैसे रहना चाहिए, क्या पहनना चाहिए, किस त्योहार में शामिल होना चाहिए और कब तक दुखी रहना चाहिए। आप अपनी बेटी के साथ ऐसा न होने दें। उसे अपने पति को याद करने का पूरा अधिकार है। साथ ही, उसे हंसने, सजने-संवरने, घूमने, काम करने और भविष्य के सपने देखने का भी उतना ही अधिकार है। इस करवा चौथ पर शायद उसके लिए सबसे जरूरी संदेश यही होगा: “हम तुम्हारे पति और तुम्हारे दुख का सम्मान करते हैं। लेकिन इस घर में दुख के साथ-साथ जीवन भी चलता रहेगा। जब तुम तैयार हो, तुम्हें भी फिर से पूरी जिंदगी जीने का अधिकार है।” ***************** ग्राफिक्स- महेंद्र वर्मा ……………….. मेंटल हेल्थ- मम्मी-पापा बहन को ज्यादा प्यार करते थे: स्कूल में भी सब उसी को पूछते, मुझे कोई प्यार नहीं करता, क्या मैं ही बुरी हूं? सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि बचपन में हमें जैसा महत्व मिलता है, उसका असर आगे के रिश्तों पर भी पड़ता है। अगर बचपन में लगातार दूसरों से तुलना हुई हो और कम अहमियत मिली हो तो कई बार बड़े होने के बाद भी हम खुद को उसी नजर से देखते हैं। पूरी खबर पढ़िए…
जरूरत की खबर- व्रत का स्टेपल फूड ‘मखाना’:जानें इसके 10 हेल्थ बेनिफिट्स, प्रोटीन-फाइबर से भरपूर, खरीदते हुए 9 बातें ध्यान रखें
मखाने को हेल्दी स्नैक के तौर पर काफी पसंद किया जाता है। न्यूट्रिशन साइंस भी इसे ‘पोषक तत्वों का खजाना’ मानता है। यह प्रोटीन, फाइबर, कैल्शियम, मैग्नीशियम और फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्वों से भरपूर होता है। यह कोई नया सुपरफूड नहीं है। इसका इतिहास मानव सभ्यता के शुरुआती दौर से जुड़ा है। इजराइल के ‘गेशर बेनोत याकोव’ पुरातात्विक स्थल पर करीब 7.8 लाख साल पुराने मखाने के बीजों के अवशेष मिल चुके हैं। इन्हें इंसानों द्वारा इस्तेमाल किए गए सबसे पुराने प्लांट-बेस्ड फूड्स में से एक माना जाता है। समय के साथ मखाना भारत, चीन, कोरिया और जापान के खानपान का हिस्सा बना। इसका जिक्र ‘चरक संहिता’ जैसे प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में भी मिलता है। आज भारत दुनिया के सबसे बड़े मखाना उत्पादक देशों में शामिल है। वहीं मखाने के हेल्थ बेनिफिट्स पर अब तक अनेकों रिसर्च हो चुकी हैं। साल 2022 में ‘जर्नल ऑफ फूड बायोकेमेस्ट्री’ में पब्लिश एक रिव्यू के मुताबिक, इसमें मौजूद डाइटरी फाइबर पाचन तंत्र को सपोर्ट करता है। साल 2018 में ‘नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन’ में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, मखाने में पॉलीफेनॉल, फ्लेवोनॉइड और अन्य बायोएक्टिव कंपाउंड्स होते हैं, जो शरीर को ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस से बचाते हैं। इसलिए आज ‘जरूरत की खबर’ में मखाने के हेल्थ बेनिफिट्स पर बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि- एक्सपर्ट– डॉ. पूनम तिवारी, सीनियर डाइटीशियन, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ सवाल- 100 ग्राम मखाने में कौन-से पोषक तत्व होते हैं? जवाब- मखाना प्रोटीन, फाइबर और कैल्शियम का बेहतरीन सोर्स है। ग्राफिक में 100 ग्राम मखाने की न्यूट्रिशनल वैल्यू देखिए- सवाल- मखाने के हेल्थ बेनिफिट्स क्या हैं? जवाब- इसे पाइंटर्स से समझिए- सभी हेल्थ बेनिफिट्स ग्राफिक में देखिए- सवाल- मखाना बोन हेल्थ के लिए कैसे फायदेमंद है? जवाब- मखाने में मौजूद मैग्नीशियम, कैल्शियम और फॉस्फोरस जैसे मिनरल्स बोन हेल्थ को सपोर्ट करते हैं। इसे ऐसे समझिए- ध्यान रखें: सिर्फ मखाना खाने से हड्डियां मजबूत नहीं होतीं। इसके लिए पर्याप्त विटामिन D, प्रोटीन और रेगुलर एक्सरसाइज भी जरूरी है। सवाल- मखाना हार्ट हेल्थ को कैसे सपोर्ट करता है? जवाब- इसमें मौजूद पोटेशियम, मैग्नीशियम, फाइबर और एंटीऑक्सिडेंट्स हार्ट हेल्थ को सपोर्ट करते हैं। इसे ऐसे समझिए- सवाल- मखाना वेट लॉस के लिए कैसे फायदेमंद है? जवाब- इसे पॉइंटर्स में समझिए– सवाल- मखाने को अपनी डाइट में कैसे शामिल कर सकते हैं? जवाब- मखाने को कई तरह से डाइट में शामिल किया जा सकता है, जैसेकि- सवाल- किस रूप में मखाने के न्यूट्रिएंट्स सबसे ज्यादा इंटैक्ट रहते हैं? जवाब- मखाने को हल्का भूनकर खाना बेहतर है। बहुत ज्यादा तेल, घी या तेज तापमान पर लंबे समय तक पकाने से कुछ पोषक तत्वों की मात्रा कम हो सकती है। सवाल- क्या मखाने के कोई साइड इफेक्ट्स भी हैं? जवाब- ज्यादा खाने से कुछ लोगों को ये समस्याएं हो सकती हैं- सवाल- किन लोगों को मखाना खाने में सावधानी बरतनी चाहिए? जवाब- सामान्य मात्रा में मखाना ज्यादातर लोगों के लिए सुरक्षित है। लेकिन कुछ लोगों को इसे कम मात्रा में या डॉक्टर की सलाह से ही लेना चाहिए- सवाल- मखाना खरीदते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? जवाब- मखाना खरीदते समय कुछ बातों का खास ख्याल रखें। इसे ग्राफिक में देखिए- सवाल- क्या मखाने के नम होने पर उसके पोषक तत्व कम हो जाते हैं? जवाब- हां, इससे मखाने की क्वालिटी, शेल्फ लाइफ और न्यूट्रिशन प्रभावित हो सकते हैं। लंबे समय तक नम रहने पर मखाने में फफूंद लगने का रिस्क बढ़ जाता है। इसे खाने से पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। सवाल- मखाना स्टोर करने का सही तरीका क्या है? जवाब- मखाने को नमी और हवा से बचाकर रखना जरूरी है, ताकि वे लंबे समय तक कुरकुरे और खाने लायक बने रहें। इसके लिए- मखाने से जुड़े कॉमन सवाल-जवाब सवाल- मखाना खाने का सही समय क्या है? जवाब- इसे अपनी डाइट और जरूरत के अनुसार नाश्ते, शाम के स्नैक के तौर पर लिया जा सकता है। सवाल- रोज कितनी मात्रा में मखाना खाना सही है? जवाब- आमतौर पर एक छोटी मुट्ठी यानी करीब 20–30 ग्राम मखाना स्नैक के तौर पर लिया जा सकता है। सवाल- क्या डायबिटिक लोग मखाना खा सकते हैं? जवाब- हां, डायबिटिक लोग भी मखाना खा सकते हैं, लेकिन मात्रा का ध्यान रखना जरूरी है। सवाल- क्या प्रेग्नेंसी में मखाना खाना सुरक्षित है? जवाब- हां, सामान्य मात्रा में सादा या रोस्टेड मखाना खाना सुरक्षित है। सवाल- क्या पैकेट वाले फ्लेवर्ड मखाने भी हेल्दी होते हैं? जवाब- नहीं, स्वाद बढ़ाने के लिए इनमें अतिरिक्त नमक, चीनी, तेल या फैट मिलाया जा सकता है। कुछ प्रोडक्ट्स में फ्लेवरिंग एजेंट्स और प्रिजर्वेटिव्स भी होते हैं। सवाल- मखाना खाने के बाद पानी पीना चाहिए या नहीं? जवाब- हां, मखाना खाने के बाद पानी पी सकते हैं। इससे कोई नुकसान नहीं होता। *************** ग्राफिक्स- विपुल शर्मा ………………… जरूरत की ये खबर भी पढ़िए जरूरत की खबर- व्रत का ‘पसंदीदा फलाहार’ साबूदाना कितना हेल्दी: डॉक्टर से जानें न्यूट्रिशन, फायदे-नुकसान और खाने का हेल्दी तरीका आज से नवरात्रि शुरू हो रही है। कई लोग 9 दिनों का व्रत रखते हैं। इस दौरान रसोई में एक चीज की एंट्री लगभग तय होती है, वह है साबूदाना। व्रत रखने वाले लोग कभी खिचड़ी, कभी वड़ा तो कभी खीर के रूप में इसे बड़े चाव से खाते हैं। पूरी खबर पढ़ें…
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