पहले बच्चा और फिर शादी करना चाहती हैं आम्रपाली दुबे, सुनकर दंग रह गए निरहुआ, एक्ट्रेस को दी ये सलाह
Amrapali Dubey wants Kids: इन दिनों कई रियलिटी शोज धमाल मचा रहे हैं और इसमें अब भोजपुरी सिनेमा की भी एंट्री हो गई है. भोजपुरी इंडस्ट्री का नया रियलिटी शो भोजपुरी बवाल (Bhojpuri Bawaal) इन दिनों काफी चर्चा में है. खास बात ये है कि ये कोई गेम शो नहीं, बल्कि इसमें भोजपुरी सिनेमा के बड़े सितारे अपनी निजी और प्रोफेशनल जिंदगी से जुड़े अनसुने किस्से, विवाद और स्ट्रग्ल के बारे में बताते हैं. हाल ही में आम्रपाली दुबे ने खुलासा किया कि वो बिना शादी के मां बनना चाहती हैं.
मां बनना चाहती हैं आम्रपाली दुबे
रियलिटी शो भोजपुरी बवाल के दूसरे एपिसोड में आम्रपाली दुबे ने मां बनने का खुलासा किया. एक्ट्रेस दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ से अपने दिल की बात करते हुए कहती हैं- 'मैंने बहुत सोचने के बाद फैसला किया है कि मैं एक बेटी गोद लेना चाहती हूं.' आम्रपाली की बात सुन निरहुआ उनसे पूछते हैं- 'ये विचार आया कहां से?' इसपर आम्रपाली बोलीं- 'ये एक दिन की बात नहीं है. मैं बहुत पहले से चाहती हूं. मेरी फैमिली में कजिन्स के जितने भी बच्चे हैं उन्हें देखकर मुझे मां बनने की फीलिंग आती है. मैं डायपर चेंज कर सकती हूं. मैं सबकुछ कर सकती हूं.'
आम्रपाली को सलाह देते हैं निरहुआ
बातचीत में आगे आम्रपाली की बात सुनकर निरहुआ उन्हें सलाह देते हुए कहते हैं- 'एक बात सोच लेना ये आसान नहीं होगा. हम लोगों के भी बच्चे हैं. हम लोग काम पर इसलिए फोकस कर पाते हैं, क्योंकि हमारे बच्चों को संभालने के लिए घर में कोई है. आप भोजपुरी की नंबर वन हीरोइन हो. अपने करियर के पीक पर हो. इस समय लगातार आप काम कर रही हो. ऐसे में बच्चे की जिम्मेदारी कैसे मैनेज करोगी.'
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परिवार को बताने से डर रहीं आम्रपाली
आम्रपाली बोलीं- बच्चा लाइफ में आएगा, बहुत चीजें होंगी. मैं सोच रही हूं कि मैं सिलेक्टिव काम करूंगी. बच्चे को समय दूंगी. मुझे इसके लिए परिवार की ममद भी चाहिए होगी.वहीं, आम्रपाली ये भी कहती है कि उन्होंने इस बारे में अभी तक परिवार वालों को नहीं बताया है, क्योंकि उन्हें जर लगता है. एक्ट्रेस ने कहा- 'सभी की सहमति से मैं चीजें करूंगी, क्योंकि बच्चे के लिए मां के साथ दूसरे रिश्ते भी जरूरी होते हैं.'
शादी से पहले चाहती हैं बच्चा
वहीं, आम्रपाली ने ये भी कहा कि उनका परिवार चाहता है कि वो शादी कर लें. लेकिन वो ऐसा नहीं चाहती हैं. एक्ट्रेस ने कहा- 'उन्हें यही रहता है कि शादी कर लो, शादी कर लो.' फिर निरहुआ जब एक्ट्रेस से शादी करने को कहते हैं तो वो जवाब में कहती हैं कि उनके पास कोई अच्छा लड़का शादी के लिए नहीं है. इतना ही नहीं आम्रपाली ये भी कहती है कि वे अरैंज मैरीज नहीं करना चाहती हैं. एक्ट्रेस ने कहा- 'पहली प्रायोरिटी बच्चा है. शादी बाद में होती रहेगी.' एक्ट्रेस ने कहा उन्हें किसी भी कीमत पर बच्चा चाहिए.
आम्रपाली और निरहुआ का अफेयर
मालूम हो कि आम्रपाली और निरहुआ के अफेयर की चर्चा भी भोजपुरी इंडस्ट्री में होती रहती हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह दोनों की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री और साथ में की गई कई हिट भोजपुरी फिल्में हैं. हालांकि, दोनों कई बार साफ कर चुके हैं कि वो सिर्ऱ अच्छे दोस्त हैं. आम्रपाली ने कहा था वो और निरहुआ सिर्फ अच्छे दोस्त और प्रोफेशनल को-स्टार हैं, जबकि निरहुआ ने भी अफेयर और गुपचुप शादी जैसी खबरों को अफवाह बताया था. बता दें कि निरहुआ पहले से शादीशुदा हैं.
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बिहार में कानून व्यवस्था पर बवाल, 4 महीने में 2 अधिकारियों की हत्या से बैकफुट पर सरकार; उठ रहे गंभीर सवाल
Bihar News: बिहार में कानून व्यवस्था की स्थिति को लेकर एक बार फिर प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में भारी खलबली मच गई है. राज्य में बेखौफ घूम रहे अपराधियों और आपराधिक घटनाओं ने सरकारी दावों पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं. चार महीने के भीतर दो-दो नगर परिषद अधिकारियों की हत्या ने पूरे प्रशासनिक अमले को दहशत में डाल दिया है. हाल ही में डेहरी नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी विमल कुमार की हत्या का मामला सामने आया. हालांकि पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन इस घटना ने सुशासन के तमाम दावों की परतें उघाड़कर रख दी हैं.
इससे पहले अप्रैल महीने में भागलपुर जिले के सुल्तानगंज नगर परिषद में कार्यरत कार्यपालक पदाधिकारी कृष्ण भूषण कुमार की भी निर्मम हत्या कर दी गई थी. 28 अप्रैल, 2026 को अपराधियों ने बेखौफ होकर उनके ही कार्यालय में घुसकर उन्हें गोली मार दी थी. चार महीने के भीतर दो बड़े प्रशासनिक अधिकारियों का इस तरह मारा जाना कोई आम घटना नहीं है. इस स्थिति ने यह साबित कर दिया है कि स्थानीय स्तर पर अधिकारियों की सुरक्षा करने में मौजूदा तंत्र पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है.
ठेकेदारी की रंजिश और राजनीतिक रसूख का खेल
इन दोनों हत्याओं ने राज्य की अंदरूनी राजनीति और नगर निकायों में जारी आर्थिक खेल को उजागर कर दिया है. वरिष्ठ पत्रकार पुष्य मित्र का मानना है कि पिछले चार महीनों के दौरान हुई इन दोनों अधिकारियों की हत्याओं के तार गहरे आर्थिक और राजनीतिक विवादों से जुड़े हैं. नगर निकायों के बड़े ठेकों में स्थानीय राजनेताओं और रसूखदार लोगों की गहरी दिलचस्पी रहती है. जब अधिकारी नियमों के तहत काम करने का प्रयास करते हैं या गलत दबाव में नहीं आते, तो उन्हें रास्ते से हटाने की साजिशें रची जाने लगती हैं.
स्थानीय स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों को सुरक्षा दे पाने में राज्य सरकार का रवैया बेहद निराशाजनक रहा है. जमीनी हकीकत यह है कि आज ये दोनों अधिकारी हमारे बीच नहीं हैं और पूरे प्रदेश के प्रशासनिक अधिकारी असुरक्षा के साये में काम करने को मजबूर हैं. बड़ी-बड़ी बातें करने वाली और एनकाउंटर का ढिंढोरा पीटने वाली सरकार बिहार में जमीनी स्तर पर कानून का राज कायम रखने में पूरी तरह विफल नजर आ रही है.
एनकाउंटर नीति और दोहरा रवैया
सरकार की एनकाउंटर नीति और पुलिसिया कार्रवाई पर भी अब सीधे तौर पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं. पत्रकार पुष्य मित्र का कहना है कि शुरुआत से ही कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जो राज्य सरकार के काम करने की शैली पर सवाल उठाती हैं. सुल्तानगंज में जब कार्यपालक पदाधिकारी की हत्या हुई थी, तब पुलिस प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी का एनकाउंटर कर दिया था. लेकिन डेहरी मामले में एक नया मोड़ सामने आ गया है.
डेहरी में मृत अधिकारी की पत्नी ने सार्वजनिक रूप से स्थानीय विधायक पर गंभीर आरोप लगाए हैं, जो सत्ताधारी गठबंधन में शामिल लोजपा दल से आते हैं. इस आरोप के बाद यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या सरकार इस मामले में भी वही रुख दिखाएगी? क्या एनकाउंटर और सख्त कार्रवाई की बात करने वाली सरकार अपने सहयोगी दल के विधायक के खिलाफ निष्पक्ष जांच और सख्त कदम उठाने का साहस दिखा पाएगी? यह स्थिति सरकार के दोहरे रवैये को उजागर करती है.
सुशासन की पुरानी राह पर लौटने की जरूरत
कानून और प्रशासनिक मामलों के जानकारों का स्पष्ट कहना है कि 'फैसला ऑन द स्पॉट' या एनकाउंटर कभी भी स्थाई समाधान नहीं हो सकता. जो सरकार केवल एनकाउंटर को ही अपनी सबसे बड़ी सफलता मानकर चलती है, उसे देर-सबेर ऐसी प्रशासनिक और राजनीतिक दुविधा का सामना करना ही पड़ता है. जब आरोप अपनों पर या किसी प्रभावशाली व्यक्ति पर लगते हैं, तो एनकाउंटर वाली नीति खुद सरकार के गले की फांस बन जाती है.
जानकारों का सुझाव है कि सरकार को अपनी प्रशासनिक विफलताओं से सबक लेने की जरूरत है. अब वक्त आ गया है कि सरकार नीतीश कुमार के पुराने प्रशासनिक मॉडल का अध्ययन करे और उनसे समझे कि उन्होंने अपने शुरुआती शासनकाल में किस तरह पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए बिहार में अपराध पर प्रभावी नियंत्रण पाया था. नीतीश कुमार के पास आज भी वह अनुभव और समझ मौजूद है, जिससे राज्य में कानून व्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाया जा सके. दो अधिकारियों की हत्या ने साफ कर दिया है कि बिहार को कागजी दावों की नहीं, बल्कि सख्त और निष्पक्ष प्रशासनिक इच्छाशक्ति की जरूरत है.
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