पेरेंटिंग- बेटा अपने खिलौने किसी को नहीं देता:क्या 5 साल की उम्र में ये नॉर्मल है या हमारी गलती है, उसे शेयरिंग कैसे सिखाएं?
सवाल- मैं 33 साल की हूं। मेरा 5 साल का बेटा दोस्तों के साथ खेलते समय अपने खिलौने शेयर नहीं करता। अगर कोई बच्चा उसका खिलौना लेने की कोशिश करे तो वह तुरंत गुस्सा हो जाता है और कहता है, “ये मेरा है।” हम उसे समझाते हैं कि दोस्तों के साथ खिलौने शेयर करने चाहिए, लेकिन वह मानता नहीं है। परिवार के लोग इसे उसकी जिद और स्वार्थी व्यवहार मानते हैं। क्या 5 साल की उम्र में बच्चों का चीजें शेयर न करना सामान्य है? हम उसे बिना डांटे शेयर करना कैसे सिखाएं? एक्सपर्ट- रिद्धि दोषी पटेल, चाइल्ड एंड पेरेंटिंग साइकोलॉजिस्ट, मुंबई जवाब- सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। सबसे पहले समझना जरूरी है कि यह अपने आप में स्वार्थी व्यवहार नहीं है। दरअसल, इस उम्र में बच्चा अपनी पसंद, अपनी चीजों और अपनी सीमाओं को लेकर काफी स्पष्ट होता है। वह यह समझने लगता है कि ‘यह मेरा है,’ लेकिन वह अभी कई चीजें सीख रहा होता है, जैसेकि- ऐसे में जब बच्चा किसी दूसरे बच्चे को अपना खिलौना देने से मना करे तो पेरेंट्स को तुरंत येे बातें नहीं कहनी चाहिए, जैसेकि- इससे बच्चे को यह मैसेज मिलता है कि अपनी चीजों या भावनाओं को व्यक्त करना गलत है। असल वजह समझना जरूरी कई बार बच्चे को खिलौना शेयर करने से ज्यादा परेशानी इस बात से होती है कि दूसरा बच्चा उसकी चीज बिना पूछे ले रहा है। दोनों परिस्थितियों में अंतर है। ऐसे में बच्चे से पूछें- “तुम अभी यह खिलौना किसी को नहीं देना चाहते?” या “तुम्हें डर है कि दूसरा बच्चा इसे खराब कर देगा?” उसका जवाब ध्यान से सुनें। अगर वह खिलौना उस समय खुद इस्तेमाल कर रहा है तो उसे तुरंत छीनकर दूसरे बच्चे को न दें। आप कह सकते हैं- “अभी तुम खेल रहे हो। जब तुम्हारा खेल पूरा हो जाए तो हम दूसरे बच्चे की बारी रखेंगे।” इससे बच्चे को लगता है कि उसकी भावनाएं सुनी व समझी जा रही हैं। शेयर करने और अपनी चीज बचाने में फर्क पेरेंट्स अक्सर मान लेते हैं कि बच्चे को अपनी हर चीज दूसरों के साथ शेयर करनी चाहिए। लेकिन हेल्दी सोशल बिहेवियर का मतलब यह नहीं है कि बच्चे को हर बार अपनी चीज छोड़ देनी चाहिए। उसे यह भी सीखना है कि किसी की चीज लेने से पहले अनुमति मांगनी चाहिए। इसलिए अगर दूसरा बच्चा उसके हाथ से खिलौना छीन रहा है तो पेरेंट्स केवल अपने बच्चे को ‘’शेयर करो’’ न कहें। दूसरे बच्चे को भी समझाएं- ‘’पहले पूछो, फिर खिलौना लो।’’ इससे बच्चा सीखता है कि दूसरों की सीमाओं का सम्मान करना भी उतना ही जरूरी है, जितना अपनी चीज शेयर करना। बच्चे को शेयरिंग सिखाने का सही तरीका शेयर करने की आदत आदेश देने से नहीं, अभ्यास से विकसित होती है। इसके लिए घर में छोटे-छोटे मौके बनाएं। उदाहरण के लिए- बच्चे को शेयरिंग सिखाने के लिए कुछ आसान तरीके अपना सकते हैं- बच्चे को गुस्सा आए तो क्या करें? अगर कोई सामान या खिलौना छीनने पर बच्चा गुस्सा हो तो कुछ बातों का ख्याल रखें- तुलना से आती नफरत तुलना बच्चे में नफरत और प्रतिस्पर्धा बढ़ा सकती है, जैसेकि- इसके बजाय बच्चे के अच्छे व्यवहार की तारीफ करें। अगर बच्चे ने पांच मिनट बाद खिलौना दूसरे बच्चे को दिया तो कहें- “तुमने अपनी बारी पूरी होने के बाद खिलौना दिया। तुमने इंतजार करना सीखा।” यानी बच्चे को अच्छा या बुरा कहने की बजाय उसके खास व्यवहार को पहचानें। घर के माहौल का भी पड़ता असर अगर घर में बच्चे की हर डिमांड तुरंत पूरी होती है या उसे कभी इंतजार करना नहीं पड़ता तो उसे अपनी इच्छा रोकना कठिन लग सकता है। दूसरी तरफ, अगर घर में उसकी चीजें बार-बार बिना पूछे इस्तेमाल की जाती हैं तो वह उन्हें लेकर ज्यादा पजेसिव हो सकता है। बच्चे इस उम्र में उपदेश से ज्यादा देखकर सीखते हैं। इसलिए पहले पेरेंट्स खुद रोल मॉडल बनें। इसके लिए कुछ बाताें का ध्यान रखें- अंतिम बात अभी आपका बेटा 5 साल का है। आपका लक्ष्य बच्चे को हर चीज शेयर करवाना नहीं, बल्कि उसे साझा करना, बारी का इंतजार करना, अपनी सीमा बताना, दूसरे की सीमा समझना और गुस्से को संभालना सिखाना है। पांच साल की उम्र में ये स्किल्स अभी विकसित हो रही होती हैं। इसलिए धैर्य, नियमित अभ्यास और माता-पिता का सही उदाहरण डांट से ज्यादा प्रभावी रहेगा। ****************** ग्राफिक्स- महेंद्र वर्मा …………………… पेरेंटिंग की ये खबर भी पढ़िए पेरेंटिंग- बेटा किताबें नहीं छूता: हर वक्त मोबाइल, लैपटॉप या टीवी, उसे सिर्फ स्क्रीन चाहिए, उसमें रीडिंग हैबिट कैसे डेवलप करें आज के समय में बच्चों की पढ़ाई के लिए डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल होता है। इस वजह से कई बच्चों का अटेंशन स्पैन (एकाग्रता) प्रभावित होता है। दरअसल, लगातार बदलने वाला कंटेंट उनके ब्रेन को तुरंत स्टिमुलेट करता है। पूरी खबर पढ़ें…
बुक रिव्यू- रिश्ते हमें तोड़ते हैं तो बनाते भी हैं:अरुंधति रॉय ने इस संस्मरण में खोली हैं अपनी जिंदगी की सबसे निजी परतें
किताब का नाम- मेरी मां मेरी गैंगस्टर ('मदर मैरी कम्स टू मी' का हिंदी अनुवाद) लेखक- अरुंधति रॉय अनुवाद- प्रभात सिंह प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन मूल्य- 550 रुपए कभी-कभी किसी इंसान को समझने के लिए उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धियों को जानना काफी नहीं होता। यह भी जानना पड़ता है कि उसने बचपन में क्या सहा, किन रिश्तों से लड़कर अपनी जगह बनाई और किन लोगों से दूर होने के बाद भी वह उनसे पूरी तरह दूर नहीं हो पाया। अरुंधति रॉय की किताब 'मेरी मां मेरी गैंगस्टर' ऐसी ही एक कहानी है। ‘बुकर पुरस्कार’ जीत चुकी लेखिका अरुंधति रॉय की यह पहली ऐसी किताब है, जिसमें उन्होंने अपनी जिंदगी के अनुभवों और मां मैरी रॉय के साथ अपने रिश्ते को बयां किया है। मां ने उन्हें दुनिया का सामना करना और मुश्किलों से लड़ना सिखाया। हालांकि, मां-बेटी का रिश्ता हमेशा सहज नहीं रहा। इसमें प्यार और अपनापन था तो ऐसे अनुभव भी थे, जिन्होंने अरुंधति के व्यक्तित्व और सोच को गहराई से प्रभावित किया। जैसेकि एक जगह वह लिखती हैं- साल 2022 में मां की मृत्यु के बाद अरुंधति ने इस किताब में उनके साथ अपने रिश्ते को समझने की कोशिश की है। 18 साल की उम्र में वह मां से दूर चली गई थीं। लेकिन यह किताब सिर्फ मां की यादों तक सीमित नहीं है। इसमें उस रिश्ते की परतें खुलती हैं, जहां प्यार के साथ गुस्सा, कृतज्ञता के साथ शिकायत और आजादी के साथ बंधन भी मौजूद थे। किताब में क्या है? वह मां, जिसने अकेले अपनी दुनिया बनाई अरुंधति का बचपन आसान नहीं था। जब अरुंधति बहुत छोटी थीं, तभी उनके माता-पिता अलग हो गए थे। उनकी मां मैरी अपने दोनों बच्चों को लेकर केरल लौट आईं। उस समय समाज में अकेले बच्चों को पालने वाली महिला के लिए जीवन आसान नहीं था। परिवार और समाज की परंपराओं के बीच अपनी शर्तों पर जीने का फैसला अपने आप में एक संघर्ष था। मैरी ने इस संघर्ष को सिर्फ अपने निजी जीवन तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने शिक्षा को अपना रास्ता बनाया और केरल के कोट्टायम में एक स्कूल की स्थापना की। आगे चलकर यह संस्थान ‘पल्लिकूडम’ के नाम से जाना गया। उन्होंने अपनी मेहनत और जिद के दम पर एक ऐसी जगह बनाई, जिसे वह अपनी पहचान कह सकती थीं। किताब की क्या खूबी है? मां से दूर जाने की जरूरत अरुंधति 18 साल की उम्र में दिल्ली चली गईं। यह सिर्फ पढ़ाई या करियर के लिए घर छोड़ने का फैसला नहीं था। इसके पीछे एक ऐसे रिश्ते से दूरी बनाने की जरूरत भी थी, जो उनके लिए भावनात्मक रूप से कठिन हो गया था। यहां ये समझना जरूरी है कि मां से दूर जाना और मां से मुक्त हो जाना दो अलग बातें हैं। इंसान घर छोड़ सकता है, अपना जीवन बना सकता है, अपनी पहचान हासिल कर सकता है, लेकिन बचपन के रिश्ते उसके भीतर बने रहते हैं। कभी वे उसकी ताकत बनते हैं, कभी उसकी कमजोरियां और कभी ऐसे सवाल, जिनका जवाब उसे बरसों बाद भी नहीं मिलता। अरुंधति की जिंदगी में भी यही उलझन दिखाई देती है। उन्होंने अपनी अलग दुनिया बनाई। वास्तुकला की पढ़ाई की, लेखन की तरफ आईं और 1997 में अपने उपन्यास ‘द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ के लिए ‘बुकर पुरस्कार’ हासिल किया। लेकिन इन तमाम उपलब्धियों के बावजूद मां के साथ उनका रिश्ता जीवन का एक ऐसा अध्याय बना रहा, जिससे वह पूरी तरह बाहर नहीं निकल सकीं। क्या हर मां ‘अच्छी मां’ होती है? हमारे समाज में मां को लेकर एक तयशुदा छवि है। मां त्याग करती है, मां माफ करती है, मां अपने बच्चों के लिए सब कुछ सहती है। इस छवि में मां के गुस्से, उसकी महत्वाकांक्षा, उसकी क्रूरता या उसकी भावनात्मक कमजोरियों के लिए बहुत कम जगह है। लेकिन असल जिंदगी के रिश्ते कभी इतने सीधे नहीं होते। अरुंधति की मां अपने समय की ‘पितृसत्तात्मक व्यवस्था’ से लड़ने वाली महिला थीं। उन्होंने अपनी आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक पहचान के लिए संघर्ष किया। इसके बावजूद वह अपने बच्चों के साथ हमेशा सहज और संवेदनशील व्यवहार नहीं कर सकीं। किताब इस विरोधाभास को किसी आसान निष्कर्ष में बदलने की कोशिश नहीं करती। मां को इंसान की तरह समझने की कोशिश यही इसकी सबसे महत्वपूर्ण बात है। किसी महिला का संघर्ष उसे अपने आप एक आदर्श मां नहीं बना देता। उसी तरह किसी मां के व्यवहार से मिली तकलीफ यह जरूरी नहीं कि उसके सारे संघर्ष और उपलब्धियां बेकार हो जाएं। यह किताब मां को पूजने या खारिज करने के बजाय उसे एक इंसान की तरह देखने की जगह बनाती है। एक ऐसा इंसान, जिसमें अच्छाइयां भी हैं और कमजोरियां भी। जो प्यार कर सकता है और चोट भी पहुंचा सकता है। शोक के बाद लिखी गई किताब यादों के सहारे खुद तक पहुंचना यह किताब किसे पढ़नी चाहिए? अगर आप अरुंधति रॉय के लेखन को पसंद करते हैं, तो यह किताब उनके व्यक्तित्व के एक दूसरे पहलू को समझने का मौका देती है। लेकिन इस किताब का महत्व सिर्फ अरुंधति के पाठकों तक सीमित नहीं है। हर उस व्यक्ति को इसमें अपने जीवन से जुड़ा कोई सवाल मिल सकता है, जिसने अपने परिवार के भीतर प्रेम और तकलीफ को एक साथ महसूस किया है। खासकर उन लोगों को, जिनके लिए माता-पिता से रिश्ता हमेशा आसान नहीं रहा। किताब के बारे में मेरी राय पढ़ते हुए बार-बार महसूस होता है कि किसी इंसान से प्रेम करने का मतलब उसकी हर बात को सही मान लेना नहीं है। उसी तरह किसी रिश्ते में मिली तकलीफ का मतलब यह भी नहीं कि उस रिश्ते में प्रेम कभी था ही नहीं। अरुंधति रॉय अपनी मां को याद करते हुए न तो उन्हें निर्दोष साबित करने की कोशिश करती हैं, न खुद को हर परिस्थिति में सही ठहराती हैं। वह अपने रिश्ते की मुश्किल सच्चाइयों के साथ बैठती हैं। यही इस किताब की सबसे बड़ी खूबी है। ……………………….. ग्राफिक्स- विपुल शर्मा ………………………. ये खबर भी पढ़ें… बुक रिव्यू- जिंदगी का साथ निभाता चला गया:साहिर लुधियानवी का जिंदगीनामा, जहां मोहब्बत, बगावत, तन्हाई और शायरी, सब साथ चलते हैं बहुत सादगी से लेखक साहिर की जिंदगी के एक-एक किरदार से हमारा परिचय कराते हैं। कहीं भी अनावश्यक सनसनी नहीं है। न प्रेम प्रसंगों में, न विवादों में और न ही उनके संघर्षों में। यही संयम किताब को विश्वसनीय बनाता है। पूरी खबर पढ़ें…
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