एक्टर इमरान खान पर मुंबई में FIR दर्ज:CJP प्रदर्शन में पुलिस ने डिटेन किया था; रिहाई के बाद गर्लफ्रेंड बोलीं- पुलिस ने कैब नहीं करने दी
मुंबई पुलिस ने अभिनेता इमरान खान के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। शनिवार को वे मुंबई के अगस्त क्रांति मैदान में 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए थे। दिल्ली में चल रहे आंदोलन के समर्थन में हुए इस प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने इमरान को हिरासत में लिया था और देर रात रिहा कर दिया था। रविवार को मुंबई पुलिस ने उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 223 और 189 के तहत मामला दर्ज किया है। प्रदर्शन के दौरान उनके साथ उनकी पार्टनर लेखा वाशिंगटन और कजिन जैन भी मौजूद थे। बीएनएस की 5 धाराओं में दर्ज हुआ मामला मुंबई पुलिस ने रविवार को बताया कि इमरान खान के खिलाफ दर्ज एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता की धारा 223 (आदेश न मानना), 126(2) (गलत तरीके से रोकना), 189(2) (गैर-कानूनी जमावड़ा), 189(3) और 189(5) लगाई गई हैं। इस मामले में पुलिसकर्मी खुद ही शिकायतकर्ता बने हैं। पुलिस के अनुसार, शनिवार को प्रदर्शन के दौरान पूरी मुंबई में 400 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया था। प्रोटेस्ट के दौरान एक्टर को डिटेन किया था प्रदर्शन के दौरान शनिवार को हिरासत में लिए जाने के बाद इमरान खान ने पुलिस वैन के अंदर से अपनी एक तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर की थी। उन्होंने लिखा था, 'लगता है मैं ड्राइव पर जा रहा हूं'। वैन के अंदर से सामने आए एक वीडियो में जब उनकी कजिन जैन ने उनसे पूछा कि क्या वे कभी जेल गए हैं, तो इमरान ने कहा कि अभी जो हालात हैं, उसे देखकर इसके चांस लग रहे हैं। मीडिया से बातचीत में इमरान ने कहा कि उन्हें बिना वजह सड़क से उठाकर वैन में बैठा दिया गया था। रिहाई के बाद पैदल घर लौटने का दावा हिरासत से छूटने के बाद लेखा वाशिंगटन ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर कर दावा किया कि पुलिस ने उन्हें रिहाई के बाद कोई कार या कैब नहीं करने दी। लेखा ने बताया कि उनका मोबाइल भी जमा करा लिया गया था, जिसके बाद वे इमरान और जैन के साथ पैदल ही घर की तरफ निकले। वहीं, इमरान खान ने बताया कि रिहाई से पहले उन्हें और अन्य लोगों को करीब दो घंटे तक पुलिस वैन में घुमाया गया था। 'मैं किसी संगठन का हिस्सा नहीं, आम नागरिक की तरह पहुंचा' अगस्त क्रांति मैदान में प्रदर्शन के दौरान इमरान खान ने मीडिया से कहा कि उनकी कोई व्यक्तिगत मांग नहीं है और न ही वे किसी संगठन का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे किसी प्रतिनिधि के तौर पर बात करने नहीं आए हैं, बल्कि एक आम नागरिक होने के नाते लोगों का साथ देने पहुंचे हैं। ये खबर भी पढ़ें CJP प्रोटेस्ट से एक्टर इमरान खान हुए डिटेन:प्रकाश राज बोले- डेमोक्रेसी की हत्या नहीं करने देंगे, वो नंगे होते रहेंगे; ऋचा चड्ढा भी भड़कीं जंतर मंतर में चल रहे कॉकरोच जनता पार्टी के प्रोटेस्ट को कई बॉलीवुड सेलेब्स का समर्थन मिला है। अनुराग कश्यप, सिंगर विशाल ददलानी और प्रकाश राज ने प्रदर्शनकारियों को डिटेन किए जाने पर सरकार पर नाराजगी जाहिर की है। पूरी खबर पढ़ें
लहर-लहर:परिवार संस्कारों की विरासत देता है, लेकिन पहचान तो खुद बनाई जाती है
इस दुनिया में परिवार की सामाजिक आवश्यकता क्या है? परिवार बनते हैं, फैलते हैं और बिखर जाते हैं, मिट जाते हैं। परिवार हमेशा के लिए नहीं होते हैं। बच्चे को मां-बाप दोनों की जरूरत होती है। उनके बिना वो ठीक से पल नहीं सकता। इसलिए परिवार बना। भाई-बहन भी परिवार है। परिवारों को कॉमन बिजनेस भी जोड़ता है। लोग साथ जुड़कर काम करते हैं। लेकिन समय के साथ कुछ स्वाभाविक परिवर्तन होते हैं। जैसे- दो भाई एक ही घर में पले और दोनों का एक-दूसरे से लगाव है। फिर दोनों की शादी और बच्चे हो जाते हैं। बच्चे अलग-अलग शहरों में चले जाते हैं। बच्चे बड़े होते हैं। उनकी भी शादियां होती हैं और बच्चे होते हैं। तो ये बच्चे आपस में दूर के रिश्तेदार हो जाते हैं। वो जो परिवार कभी बहुत करीब था, वो ज्यादा से ज्यादा चार पीढ़ियों में खत्म हो जाता है, बिखर जाता है। किसी को किसी की खबर ही नहीं होती। और ऐसा नहीं है कि वो अकेले रह जाते हैं। वहां उनके भी फिर छोटे-छोटे परिवार बन रहे होते हैं। वो फिर वैसी ही इकाई से शुरू करते हैं। परिवार का किस्सा तीन-चार जेनरेशन से ज्यादा का नहीं है। फिर नए परिवार बनते हैं और वो तीन-चार जेनरेशन चलते हैं। फिर एक नया परिवार बनता है और नए बच्चे आते हैं। परिवार एक जरूरत है जो बहुत जल्दी खत्म हो जाती है। यह जरूरत वक्त के साथ खत्म जाती है। इसलिए कि धीरे-धीरे वो बच्चे एक-दूसरे से अजनबी हो जाते हैं। बदलते समय के साथ पारंपरिक संयुक्त परिवारों का दौर पीछे छूट गया है। आज के समय में अगर बच्चे माता-पिता से अलग और स्वतंत्र रहते हैं, तो यह पारिवारिक रिश्तों का टूटना नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन का एक स्वाभाविक यथार्थ है। आज की व्यस्त ज़िंदगी में परिवार के सदस्यों को एक-दूसरे से मिलने के लिए पहले से समय तय करना पड़ता है। जैसे मुझे फरहान से मिलने के लिए 3 से 5 दिन पहले समय तय करना पड़ता है। पहले अमेरिका या इंग्लैंड में रिश्तेदारों से मिलने से पहले फोन करने की प्रथा अजीब मानी जाती थी, लेकिन जो बात पहले लोगों को हैरान करती थी, वह अब ज़िंदगी का एक आम हिस्सा बन गई है। परिवार सिर्फ़ उन लोगों का नाम नहीं है, जिनसे हमारा खून का रिश्ता है। परिवार वह जगह है जहां इंसान को सिर्फ इसलिए नहीं पसंद किया जाना चाहिए कि वह अपना है, बल्कि इसलिए भी सम्मान दिया जाना चाहिए कि वह एक अलग इंसान है- अपनी सोच, इच्छा और आजादी के साथ। इसलिए परिवार में मोहब्बत के साथ संवाद होना चाहिए, असहमति की गुंजाइश होनी चाहिए और एक-दूसरे को सुनने का धैर्य होना चाहिए। एक अच्छे परिवार में बच्चों को ईमानदारी, आत्मनिर्भरता और तर्कशीलता सिखानी चाहिए। बच्चों का अपने फैसले लेना और आजाद होकर जीना स्वाभाविक है; अस्वाभाविक तो यह है कि उनकी हर सोच, हर कदम और हर फैसले पर बेवजह नियंत्रण रखा जाए। बच्चे हमारे हैं, लेकिन हमारी मिल्कियत नहीं हैं। एक उम्र के बाद उन्हें फैसले लेने, गलतियां करने और दुनिया बनाने का अधिकार है। माता-पिता का काम हर कदम पर उनके रास्ते को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि इतनी समझ देना है कि वे रास्ते पर सही और गलत में फर्क कर सकें। खानदान आपको एक विरासत दे सकता है- नाम, भाषा, संस्कार, कहानियां और कुछ वैल्यू, लेकिन वह आपकी पहचान तय नहीं कर सकता। अगर बेटा सिर्फ पिता की आवाज दोहराता रहे, तो वह विरासत नहीं, प्रतिध्वनि होती है। आखिरकार किसी परिवार की सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि उस परिवार के बच्चे कितने अच्छे इंसान बनते हैं। परिवार का मकसद सिर्फ अपने लोगों को अपना बनाए रखना नहीं है; परिवार का मकसद ऐसे इंसान बनाना है जो इंसानियत का भी सम्मान कर सकें। (संपादन और समन्वय- अरविंद मण्डलोई)
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