गुरुवार के कारोबार में इंफोसिस और विप्रो के शेयरों में 2 से 3 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई। बता दें कि इससे पहले अमेरिकी बाजार में इन कंपनियों के ADRs में तेज कमजोरी देखने को मिली थी, जिसने घरेलू निवेशकों की चिंता बढ़ा दी।
मौजूद जानकारी के अनुसार इंफोसिस का शेयर 3.15 प्रतिशत टूटकर 1,425.60 रुपये पर आ गया, जबकि विप्रो 2.5 प्रतिशत गिरकर 224.14 रुपये पर कारोबार करता दिखा। टीसीएस के शेयरों में भी 3.27 प्रतिशत की गिरावट आई और भाव 2,814.70 रुपये तक फिसल गया।
इस कमजोरी का असर पूरे आईटी सेक्टर पर पड़ता नजर आ रहा है। कोफ़ोर्ज, परसिस्टेंट सिस्टम्स, एलटीआईमाइंडट्री और एचसीएलटेक जैसे शेयरों में भी गतिविधि बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। गौरतलब है कि पिछले कारोबारी सत्र में ही निफ्टी आईटी इंडेक्स करीब 2 प्रतिशत टूट चुका था, जो निवेशकों के सतर्क रुख को दर्शाता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, हालिया दबाव की बड़ी वजह अमेरिका की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस स्टार्टअप एंथ्रोपिक है, जिसने हाल ही में कॉरपोरेट लीगल टीमों के लिए एक नया एआई टूल पेश किया है। Claude चैटबॉट बनाने वाली इस कंपनी का दावा है कि उसका टूल कॉन्ट्रैक्ट रिव्यू, एनडीए जांच , कंप्लायंस वर्कफ्लो, लीगल ब्रीफ तैयार करने और स्टैंडर्ड जवाबों जैसे कई काम खुद कर सकता है।
इस घटनाक्रम ने पहले से ही दबाव में चल रहे सॉफ्टवेयर और आईटी शेयरों की चिंता और बढ़ा दी है। निवेशकों को डर है कि एआई के व्यापक इस्तेमाल से प्रतिस्पर्धा तेज होगी और कंपनियों के मार्जिन पर असर पड़ेगा। इसी आशंका के चलते विप्रो के ADRs 4 प्रतिशत से ज्यादा गिरकर 2.39 डॉलर पर बंद हुए, जबकि इंफोसिस के ADRs में 5.12 प्रतिशत की गिरावट आई और भाव 15.76 डॉलर पर आ गया।
बाजार जानकारों का कहना है कि एआई को लेकर सबसे बड़ा डर यह है कि इससे आईटी कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त कमजोर हो सकती है। LPL Financial के इक्विटी रिसर्च प्रमुख थॉमस शिप के अनुसार, एआई के चलते कीमतों पर दबाव बढ़ेगा और कंपनियों को बदलना पहले से आसान हो सकता है, जिससे उनके भविष्य के ग्रोथ अनुमान और वैल्यूएशन तय करना कठिन होता जा रहा है।
गौरतलब है कि जिन क्षेत्रों को अब तक एआई से अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता था, जैसे लीगल सर्विसेज, डेटा एनालिटिक्स और कस्टमर सपोर्ट, वे भी अब इसके दायरे में आ रहे हैं। अगर इन कामों का ऑटोमेशन तेज हुआ, तो आईटी सर्विसेज इंडस्ट्री के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है।
पिछले सप्ताह अंतरराष्ट्रीय ब्रोकरेज फर्म जेफ़रीज़ ने इस बदले माहौल को “SaaSpocalypse” करार दिया था। ब्रोकरेज के अनुसार निवेशकों की सोच तेजी से इस धारणा की ओर बढ़ रही है कि एआई सिर्फ मददगार नहीं, बल्कि कई मामलों में कंपनियों की जगह लेने वाला साबित हो सकता है।
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इन दिनों जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनियां नई तकनीकों को मुनाफे वाले मॉडल में बदलने की होड़ में हैं, उसी बीच ओपनएआई की एक पूर्व शोधकर्ता ने एक अहम चेतावनी दी है। बता दें कि हाल ही में ओपनएआई से अलग हुईं जोई हिटज़िग ने चैटजीपीटी में विज्ञापन शामिल करने के विचार पर गंभीर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह चैटबॉट अब लोगों की जिंदगी से जुड़ी बेहद निजी जानकारी का एक अनोखा संग्रह बन चुका है।
हिटज़िग की चिंता सिर्फ बैनर ऐड या स्पॉन्सर्ड जवाबों तक सीमित नहीं है। उनका फोकस इस बात पर है कि बीते कुछ वर्षों में यूजर्स ने चैटजीपीटी के साथ किस तरह की बातें साझा की हैं। सोशल मीडिया पोस्ट के उलट, एआई से बातचीत अक्सर निजी, सीधी और बिना किसी दिखावे के होती है। लोग इसे एक तटस्थ और सुरक्षित माध्यम मानकर अपने स्वास्थ्य, रिश्तों, आस्था, पहचान और निजी उलझनों पर खुलकर सवाल करते रहे हैं।
गौरतलब है कि जोई हिटज़िग ने लिखा कि चैटजीपीटी यूजर्स ने इंसानी ईमानदारी और खुलापन ऐसा साझा किया है, जिसकी मिसाल पहले नहीं मिलती। लोगों को लगता रहा कि वे ऐसे सिस्टम से बात कर रहे हैं जिसका कोई छिपा एजेंडा नहीं है। ऐसे में अगर इसी निजी डेटा के आधार पर विज्ञापन बनाए जाते हैं, तो यह यूजर्स को प्रभावित या नियंत्रित करने की नई संभावनाएं पैदा कर सकता है, जिनसे निपटने के लिए फिलहाल पर्याप्त साधन मौजूद नहीं हैं।
मौजूद जानकारी के अनुसार ओपनएआई पहले ही संकेत दे चुका है कि वह चैटजीपीटी में विज्ञापन का परीक्षण कर सकता है। कंपनी का कहना रहा है कि वह यूजर्स की बातचीत विज्ञापनदाताओं के साथ साझा नहीं करेगी और न ही डेटा बेचेगी। हालांकि, हिटज़िग का तर्क है कि समस्या आज की नहीं, बल्कि भविष्य की है। उनके मुताबिक जैसे ही विज्ञापन कमाई का हिस्सा बनते हैं, वैसे ही संस्थागत प्राथमिकताएं धीरे-धीरे बदल सकती हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि भले ही मौजूदा प्रबंधन साफ सीमाएं तय करने की मंशा रखता हो, लेकिन व्यावसायिक दबाव समय के साथ उन नियमों को कमजोर कर सकता है। इस संदर्भ में उन्होंने स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था या कानूनी ढांचे की जरूरत पर जोर दिया, ताकि यूजर डेटा को मुनाफे से ऊपर सार्वजनिक हित के तहत सुरक्षित रखा जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बहस सिर्फ ओपनएआई तक सीमित नहीं है। कई सर्वे बताते हैं कि बड़ी संख्या में यूजर्स विज्ञापन आने के बावजूद मुफ्त एआई टूल्स का इस्तेमाल जारी रखेंगे। यह एक तरह की ‘प्राइवेसी थकान’ को दिखाता है, जहां असहजता के बावजूद लोग सुविधा छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
कुल मिलाकर, चैटजीपीटी अब सिर्फ एक तकनीकी टूल नहीं रहा। यह शिक्षक, सहायक, सलाहकार और विचार-मंथन का साथी बनता जा रहा है। ऐसे में इस प्लेटफॉर्म पर विज्ञापन की एंट्री सिर्फ कारोबारी फैसला नहीं, बल्कि भरोसे और प्रभाव से जुड़ा बड़ा सवाल बनकर सामने आई है।
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