West Bengal: बंद चाय बागानों के मजदूरों को मिलेंगे 5000 रुपये और अतिरिक्त राशन
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने चाय बागानों के बंद होने के कारण बेरोजगार हुए चाय बागान मजदूरों के प्रत्येक पात्र परिवार को त्योहारों के सीजन में 5,000 रुपये और 50 किलो चावल देने की बुधवार को घोषणा की। यह चावल उन्हें पहले से मिल रहे 35 किलो चावल के अतिरिक्त दिए जाएंगे। अधिकारी ने राज्य सचिवालय में मंत्रिमंडल की विशेष बैठक के बाद कहा कि यह लाभ दुर्गा पूजा से छठ पूजा तक दिया जाएगा।
उन्होंने कहा, “यह लोगों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध सरकार की ओर से एक छोटा-सा कदम है। हम 60 वर्ष से कम उम्र के 19,524 मजदूरों के बैंक खातों में 5,000 रुपये भेजेंगे। प्रत्येक परिवार को 50 किलो अतिरिक्त चावल भी दिए जाएंगे।” उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने यह कदम इसलिए उठाया है, क्योंकि इन मजदूरों को वेतन नहीं मिल रहा है और इस कारण वे बोनस पाने के पात्र नहीं हैं।
अधिकारी ने बताया कि चालू चाय बागानों में काम करने वाले मजदूरों को इस साल पूजा बोनस के रूप में 20 प्रतिशत राशि दी गई है, जबकि पिछली सरकार के दौरान यह बोनस 16 प्रतिशत था। मुख्यमंत्री ने कहा कि बंद पड़े 21 चाय बागानों को दोबारा खोलने और रोजगार खो चुके मजदूरों को राहत देने के प्रयास किए जा रहे हैं। मंत्रिमंडल की बैठक में राज्य सरकार ने विभिन्न विभागों में 45,185 पदों पर भर्ती को भी मंजूरी दी।
अधिकारी ने कहा, “वित्त विभाग ने 45,185 पदों पर भर्ती को मंजूरी दे दी है। भर्ती प्रक्रिया जल्द ही शुरू होगी।” उन्होंने बताया कि कुल रिक्त पदों में से 33,199 पद स्कूल शिक्षा विभाग में भरे जाएंगे, जबकि पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में 7,119 नियुक्तियां की जाएंगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि तकनीकी शिक्षा विभाग में 1,886 अधिकारियों और लिपिकों की भर्ती की जाएगी।
वहीं, पुलिस विभाग में विभिन्न पदों पर 946 रिक्तियां भरी जाएंगी। इनमें उपायुक्त, उपनिरीक्षक और महिला कांस्टेबल सहित विभिन्न पद शामिल हैं।
फिल्ममेकर ने बिना बड़े सितारों-गानों के बनाई फिल्म, मगर खरीदारों ने नहीं दिखाई दिलचस्पी, ऑस्कर तक पहुंची मूवी
साल 1988 में एक फिल्म रिलीज हुई, जिसमें न कोई गाना था और न ही कोई बड़ा स्टार, मगर कहानी बड़ी दमदार थी. फिल्म दर्शकों को सच के इतना करीब ले जाती है, जहां सिनेमा और जिंदगी का फासला कम हो जाता है. मगर फिल्म में खरीदारों की कोई दिलचस्पी नहीं थी. हालांकि, जब फिल्म रिलीज हुई, तो इसे दुनिया भर में सराहा गया. यह ऑस्कर तक गई. हम मीरा नायर की फिल्म 'सलाम बॉम्बे' की बात कर रहे हैं, जो सड़क पर रहने वाले बच्चों की जिंदगी को बयां करती है.
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