Vijaya Ekadashi Vrat Katha : विजया एकादशी व्रत में पढ़ी जाती है यह कथा, भगवान राम ने कलश के साथ ऐसे किया एकादशी व्रत
Vijaya Ekadashi Vrat Katha kahani in hindi: विजया एकादशी व्रत महाशिवरात्रि से पहले किया जाता है। इस व्रत का संबंध भगवान श्री राम से है। इस व्रत में भगवान राम ने सीता जी को वापस लाने के लिए और समुद्र पार करने के लिए एकादशी व्रत विधि पूर्वक किया था।
बांग्लादेश महासंग्राम: तख्तापलट और 'जुलाई क्रांति' के बाद लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा; क्या आज बदलेगी 54 साल की खूनी सियासी तकदीर?
नई दिल्ली : दक्षिण एशिया का महत्वपूर्ण देश बांग्लादेश अपने अस्तित्व के सबसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना के अचानक देश छोड़कर भागने और उसके बाद हुई भीषण हिंसा के बाद, यह पहला मौका है जब देश में आम चुनाव हो रहे हैं। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के साये में हो रहा यह मतदान केवल सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि एक नए 'सिस्टम' को जन्म देने की कोशिश है।
करीब 12.77 करोड़ मतदाता आज तय करेंगे कि 'सपनों का बांग्लादेश' कैसा होगा। एक तरफ लोकतंत्र की बहाली की उम्मीद है, तो दूसरी तरफ इतिहास के उन जख्मों का बोझ, जो दशकों से तख्तापलट और राजनीतिक हत्याओं से भरे रहे हैं।
आज़ादी से तख्तापलट तक का संघर्षमय सफर
बांग्लादेश का जन्म 1971 में पाकिस्तान के दमनकारी शासन के खिलाफ एक लंबी क्रांति के बाद हुआ था। 'बंगबंधु' शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व और भारत के ऐतिहासिक सहयोग से 16 दिसंबर 1971 को यह राष्ट्र स्वतंत्र हुआ। हालांकि, आज़ादी की खुशी ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी। 1975 में एक सैन्य तख्तापलट के दौरान मुजीबुर्रहमान और उनके लगभग पूरे परिवार की नृशंस हत्या कर दी गई, जिसके बाद देश लंबे समय तक अस्थिरता और सैन्य शासन की बेड़ियों में जकड़ा रहा।
अवामी लीग का उदय और 15 साल का एकछत्र राज
1949 में स्थापित अवामी लीग बांग्लादेश की सबसे पुरानी और प्रभावी पार्टी रही है। मुजीबुर्रहमान की जीवित बची बेटी शेख हसीना ने 1981 में पार्टी की कमान संभाली और सैन्य शासन के खिलाफ मोर्चा खोला। 1996 में पहली बार सत्ता पाने के बाद, 2009 से 2024 तक उन्होंने लगातार 15 साल राज किया। उनके शासन में देश ने आर्थिक प्रगति तो की, लेकिन विपक्ष के दमन और चुनावी धांधली के आरोपों ने उनकी लोकतांत्रिक साख पर गहरे सवाल खड़े कर दिए।
'कोटा आंदोलन' और शेख हसीना के पतन की कहानी
जुलाई 2024 में सरकारी नौकरियों में आरक्षण के खिलाफ शुरू हुआ 'कोटा विरोधी आंदोलन' देखते ही देखते एक विशाल जन-क्रांति में बदल गया। छात्रों के इस विद्रोह ने शेख हसीना के इस्तीफे की मांग की।
5 अगस्त 2024 को स्थिति इतनी भयावह हो गई कि लाखों की भीड़ उनके निवास 'गणभवन' में घुस गई। सेना के अल्टीमेटम के बाद हसीना को इस्तीफा देकर भारत में शरण लेनी पड़ी। इसी के साथ अवामी लीग के युग का फिलहाल अंत हो गया।
पहली बार चुनावी मैदान से 'आज़ादी की पार्टी' गायब
इस चुनाव की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली बात यह है कि देश की सबसे बड़ी पार्टी अवामी लीग मैदान में नहीं है। अंतरिम सरकार और अदालती फैसलों के तहत पार्टी को 'फासीवादी' करार देकर चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया गया है। बांग्लादेश के 54 साल के इतिहास में यह पहली बार है जब आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाली पार्टी के बिना आम चुनाव संपन्न हो रहे हैं, जिससे एक बड़ा राजनीतिक शून्य पैदा हो गया है।
चुनाव का पूरा गणित: सीटें, दल और उम्मीदवार
बांग्लादेश निर्वाचन आयोग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, इस बार का चुनाव पिछले तीन दशकों में सबसे अलग है:-
संसदीय सीटें: कुल 300 सीटों पर मतदान होगा। बहुमत के लिए 151 सीटों का आंकड़ा जादुई है।
कुल उम्मीदवार: मैदान में 1,981 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। इसमें 1732 विभिन्न राजनीतिक दलों से हैं और 249 स्वतंत्र (निर्दलीय) प्रत्याशी हैं।
अवामी लीग की अनुपस्थिति: देश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी 'अवामी लीग' (शेख हसीना की पार्टी) को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया गया है। ऐसे में मैदान अब BNP (खालिदा जिया की पार्टी) और जमात-ए-इस्लामी के लिए खुला है।
प्रवासी मतदान: पहली बार करीब 1.5 करोड़ प्रवासियों को डाक मतपत्र (Postal Ballot) की सुविधा दी गई है, जो विदेश से ही नई सरकार चुन सकेंगे।
जुलाई चार्टर': प्रधानमंत्री को तानाशाह बनने से रोकने का दांव
इस चुनाव का एक विशेष आकर्षण 'जुलाई चार्टर' है। यह एक प्रकार का जनमत संग्रह है, जिसमें जनता से संविधान संशोधन पर राय मांगी जा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य सत्ता का विकेंद्रीकरण करना और प्रधानमंत्री की शक्तियों को सीमित करना है, ताकि भविष्य में फिर कोई नेता शेख हसीना की तरह 'असीमित शक्तियों' का उपयोग कर तानाशाह न बन सके।
अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और सुरक्षा का कड़ा पहरा
शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं के खिलाफ हिंसा की 2,000 से अधिक घटनाएं सामने आई हैं। इसे देखते हुए सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम किए गए हैं। पूरे देश में 7.5 लाख सुरक्षाकर्मी जिसमे सेना, RAB और बगब तैनात हैं। सेना को 'शूट ऑन साइट' के अधिकार दिए गए हैं ताकि धार्मिक स्थलों और कमजोर वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
1.5 करोड़ प्रवासी मतदाताओं को पहली बार बड़ी सुविधा
लोकतंत्र को समावेशी बनाने के लिए इस बार एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया है। दुनिया के विभिन्न देशों में रह रहे करीब 1.5 करोड़ प्रवासी बांग्लादेशियों को 'पोस्टल बैलट' के जरिए विदेश से ही वोट डालने की सुविधा दी गई है। यह पहली बार है जब इतनी बड़ी संख्या में प्रवासी नागरिक देश की नई सरकार चुनने में सीधे तौर पर अपनी भूमिका निभा रहे हैं।
मुख्य दावेदार: BNP और जमात-ए-इस्लामी के बीच वर्चस्व की जंग
अवामी लीग के बाहर होने के बाद मुकाबला अब मुख्य रूप से तारिक रहमान के नेतृत्व वाले BNP और जमात-ए-इस्लामी के बीच है। इसके अलावा, 'जुलाई क्रांति' से निकले छात्र नेताओं और नए दल जैसे NTCPPL भी अपनी जमीन तलाश रहे हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता कट्टरपंथ को चुनती है या उदारवाद को।
अंतरराष्ट्रीय साख और भविष्य की धुंधली राह
इस चुनाव पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं। अवामी लीग की अनुपस्थिति ने चुनाव की 'अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता' पर सवाल तो खड़े किए हैं, लेकिन अंतरिम सरकार इसे निष्पक्ष साबित करने में जुटी है। वोटों की गिनती आज शाम 5:00 बजे से ही शुरू हो जाएगी और 13 फरवरी की सुबह तक यह साफ हो जाएगा कि क्या बांग्लादेश वास्तव में अपने 'सपनों के राष्ट्र' की ओर बढ़ेगा या फिर हिंसा का एक नया दौर शुरू होगा।
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