शक्ति की आराधना: मंत्रों से अधिक भावना का महत्व
भारतवर्ष पर्वों और उत्सवों की पावन भूमि है। यहाँ मनाए जाने वाले सभी त्योहारों का अपना एक विशेष आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। इन सभी पर्वों में शारदीय नवरात्र का स्थान अत्यंत विशिष्ट और पवित्र माना गया है। नव का अर्थ है 9 और रात्रि का अर्थ है रातों का समूह। यह 9 रातों और 10 दिनों का एक ऐसा पावन समय है जब संपूर्ण ब्रह्मांड में आदि शक्ति माँ भगवती की विशेष कृपा बरसती है। नवरात्र केवल एक साधारण व्रत या उत्सव मात्र नहीं है, बल्कि यह मानव मन और आत्मा की शुद्धि तथा दैवीय शक्ति के संचय का एक अत्यंत दुर्लभ अवसर है। यह समय हमें हमारी आंतरिक ऊर्जा को जागृत करने और जीवन में व्याप्त अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है।
शारदीय नवरात्र का आगमन वर्षा ऋतु के समापन और शीत ऋतु के आरंभ के समय होता है। प्रकृति भी इस समय एक नए रूप में सजती है और संपूर्ण वातावरण में एक नई ताजगी तथा पवित्रता का वास होता है। इन 9 रातों में माँ दुर्गा के 9 अलग अलग स्वरूपों की उपासना की जाती है। प्रत्येक स्वरूप का अपना एक विशेष संदेश और महत्व है। माता के यह रूप हमें जीवन के विभिन्न चरणों और संघर्षों में साहस, धैर्य, करुणा और विजय की प्रेरणा देते हैं। शक्ति की उपासना का यह पर्व हमें यह सिखाता है कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए शक्ति का होना अत्यंत आवश्यक है। बिना शक्ति के शांति और प्रगति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। यह शक्ति केवल शारीरिक नहीं है, बल्कि मानसिक और आत्मिक भी है।
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अखबार हिन्दी मिलाप में प्रकाशित आराम से नामक स्तंभ में दी गई पूजन विधि के अनुसार, नवरात्र की उपासना अत्यंत सरल, क्रमबद्ध और भावपूर्ण है। किसी भी शुभ और मांगलिक कार्य का आरंभ सदैव विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश के पूजन से ही होता है। नवरात्र की उपासना में भी सबसे पहले भगवान गजानन का स्मरण और पूजन करना अनिवार्य माना गया है। साधक अपने हाथ में पवित्र जल, अक्षत अर्थात बिना टूटे हुए चावल, और पुष्प लेकर संकल्प करता है। संकल्प एक प्रकार की दृढ़ प्रतिज्ञा है। साधक माता से प्रार्थना करता है कि हे जगदम्बे, मैं इस पवित्र पूजन और व्रत के माध्यम से अपने संकल्प को पूर्ण करने के लिए आपका हृदय से आह्वान करता हूँ। संकल्प के पश्चात जल, अक्षत और कुमकुम से विधि विधान के साथ पूजन की शुरुआत होती है।
पूजन के मुख्य क्रम में सबसे पहला चरण माता का आह्वान और ध्यान है। साधक अपनी आँखें बंद करके माँ भगवती के उस दिव्य और भव्य स्वरूप का ध्यान करता है, जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में लीन थे और माता ने प्रकट होकर सृष्टि की रक्षा के लिए मधु और कैटभ नामक भयंकर राक्षसों का वध किया था। ध्यान का यह चरण मन को सांसारिक चिंताओं से मुक्त करके पूरी तरह से माता के चरणों में केंद्रित करने का एक माध्यम है। जब मन पूरी तरह से एकाग्र हो जाता है, तब माता की उपस्थिति का अनुभव हृदय में होने लगता है।
ध्यान के उपरांत माता को स्नान कराने की प्रक्रिया होती है। सर्वप्रथम शुद्ध और पवित्र जल से माता की प्रतिमा या यंत्र को स्नान कराया जाता है। इसके पश्चात पंचामृत से स्नान कराया जाता है। पंचामृत 5 अत्यंत पवित्र वस्तुओं का मिश्रण होता है जिसमें गाय का दूध, दही, घी, शहद और शर्करा मिलाई जाती है। स्नान कराते समय साधक यह भाव रखता है कि हे महादेवी, दूध, दही, घी, शहद और शर्करा के मिश्रण से तैयार यह उत्तम पंचामृत आपकी सेवा में प्रस्तुत है, कृपया इसे स्वीकार करें। पंचामृत स्नान के पश्चात एक बार फिर से शुद्ध जल से स्नान कराया जाता है ताकि माता का श्री विग्रह पूरी तरह से स्वच्छ हो जाए।
स्नान के बाद माता के श्रृंगार का चरण आता है। माँ भगवती को अत्यंत सुंदर और पवित्र वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। मुख्य वस्त्र के साथ साथ उपवस्त्र भी चढ़ाया जाता है। इसके बाद मस्तक पर चंदन और सिंदूर का तिलक लगाया जाता है जो सौभाग्य और सुहाग का प्रतीक है। माता को ताजे और सुगंधित पुष्पों की माला पहनाई जाती है। वस्त्र अर्पित करते समय साधक कहता है कि हे देवी, नाना प्रकार के सुंदर बेल बूटों और जरी गोटों से सुसज्जित यह अत्यंत उत्तम और मनमोहक वस्त्र मैं आपको समर्पित कर रहा हूँ। श्रृंगार का यह भाव हमें यह सिखाता है कि हम अपने जीवन में भी सुंदरता, पवित्रता और सदगुणों को धारण करें।
श्रृंगार के पश्चात माता को भोग अर्पित किया जाता है और दीप दर्शन कराया जाता है। माता के समक्ष अत्यंत श्रद्धा के साथ विविध प्रकार के उत्तम नैवेद्य, ऋतु फल, और स्वादिष्ट मिष्ठान्न रखे जाते हैं। इसके बाद सुगंधित धूप और दीप जलाकर माता को दिखाया जाता है। दीप का प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है और धूप की सुगंध हमारी प्रार्थनाओं की पवित्रता को दर्शाती है। यह प्रकाश अज्ञानता और बुराई के अंधकार को समाप्त करने का संदेश देता है।
पूजन के अंतिम चरण में माता की आरती, प्रदक्षिणा और क्षमा प्रार्थना की जाती है। आरती के लिए विशेष रूप से कर्पूर का उपयोग किया जाता है। कर्पूर के साथ भीगे हुए ईंधन को जलाकर उसमें 1, 3, 5, 7 या इससे अधिक संख्या में बत्तियां बनाकर माता की मंगल आरती उतारी जाती है। कर्पूर जलकर पूरी तरह से समाप्त हो जाता है और कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो यह दर्शाता है कि हमारा अहंकार भी माता के समक्ष पूरी तरह से भस्म हो जाना चाहिए। आरती के बाद साधक अपने स्थान पर गोल घूमकर प्रदक्षिणा करता है। अंत में सबसे महत्वपूर्ण भाग होता है क्षमा प्रार्थना। साधक हाथ जोड़कर कहता है कि हे माता, न तो मुझे आपकी भक्ति का कोई गहरा ज्ञान है और न ही मैं पूजा के कठिन मंत्रों को जानता हूँ। मैंने अपनी अल्प बुद्धि और क्षमता के अनुसार जो भी पूजन किया है, आप अपनी उदारता से उसे परिपूर्ण मानकर स्वीकार करें और मेरी सभी भूलों को क्षमा करें।
नवरात्र पूजन का सबसे मूल और महत्वपूर्ण भाव यही है कि यदि पूजा के दौरान कोई मंत्र भूल भी जाए, या कोई सामग्री छूट भी जाए, तो साधक की भावना और श्रद्धा में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। अज्ञानवश या अधिकता में किए गए पूजन से जगदम्बा सर्वकल्याणी महादेवी संतुष्ट ही होती हैं, क्योंकि वे केवल अपने भक्तों का सच्चा भाव देखती हैं। कर्मकांड से अधिक महत्व हृदय की पवित्रता का है।
यह पावन पर्व हमें एक बहुत ही गहरा सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश भी देता है। यह हमें सिखाता है कि संसार की हर एक स्त्री में देवी का ही वास है। स्त्री का सम्मान करना, उसकी गरिमा की रक्षा करना और उसे समाज में उचित स्थान देना ही देवी की सच्ची आराधना है। जब तक समाज में नारी का सम्मान नहीं होगा, तब तक कोई भी पूजा या व्रत सफल नहीं हो सकता। शक्ति की इस आराधना से ही हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में फैला हुआ अज्ञानता और बुराइयों का अंधकार दूर होता है।
यही कारण है कि दीपावली के महापर्व से ठीक पहले आने वाली यह शारदीय नवरात्र, केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि यह दीपावली के प्रकाश पर्व की तैयारी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक आरंभ है। नवरात्र में हम अपने भीतर शक्ति और पवित्रता का संचय करते हैं, ताकि दीपावली के दिन हम अपने अंतर्मन के दीयों को सत्य और ज्ञान के प्रकाश से पूरी तरह से प्रज्वलित कर सकें। यह संपूर्ण कालखंड हमें अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर और मृत्यु से अमरता की ओर ले जाने का एक दिव्य मार्ग प्रशस्त करता है। माता की यह आराधना हमारे जीवन को सुख, शांति, समृद्धि और अपार सफलता से भर दे, यही इस पर्व की सच्ची सार्थकता है।
- महेन्द्र तिवारी
216 बी, द्वितीय तल, राधिका ज्वेलर्स के पास, गली नंबर-10,
साध नगर, पालम कॉलोनी, नई दिल्ली - 110045
गांधी का पुनर्जन्म ही नहीं, गांधी-दृष्टि का पुनर्जागरण हो
महात्मा गांधी को याद करना केवल अतीत के एक महान व्यक्तित्व को श्रद्धांजलि देना नहीं है, बल्कि अपने वर्तमान की दिशा और भविष्य की दशा पर विचार करना भी है। गांधी किसी एक कालखंड, राजनीतिक दल या विचारधारा की संपत्ति नहीं हैं। वे एक ऐसे जीवन-दर्शन का नाम हैं, जिसकी धुरी सत्य, अहिंसा, आत्मानुशासन, स्वावलंबन, सेवा, स्वदेशी, ग्रामोदय, सामाजिक समरसता और मानव-मर्यादा है। इसलिए आज आवश्यकता गांधी के पुनर्जन्म की ही नहीं, गांधी-दृष्टि के पुनर्जागरण की है। गांधी को जितना इतिहास में खोजेंगे, उतना ही वे अतीत के लगेंगे; उन्हें वर्तमान के प्रश्नों से जोड़ेंगे तो वे भविष्य के मार्गदर्शक बन जाएंगे। क्योंकि महात्मा गांधी बीसवीं शताब्दी में दुनिया के सबसे सशक्त, बड़े एवं प्रभावी नेता के रूप में उभरे, वे बापू एवं राष्ट्रपिता के रूप में लोकप्रिय हुए, वे एक रचनात्मक व्यक्तित्व थे जिन्होंने अपने ही मूल्यों के बल पर देश को आजादी दिलाई, नैतिक एवं स्वस्थ मूल्यों को स्थापित किया। उनके द्वारा निरुपित सिद्धान्त आज की दुनिया की चुनौतियों एवं समस्याओं के समाधान के सबसे सशक्त माध्यम है। लेकिन वक्त की विडम्बना देखिये कि गांधी को हम बार-बार कटघरे में खड़ा करते हैं और उनकी छवि को धुंधलाने की कोशिश में कोई कमी नहीं छोड़ते। जो मानसिकता गोली मार सकती है, वह गाली दे तो क्या आश्चर्य? पर महात्मा गांधी भारत के अकेले ऐसे महापुरुष हैं जिन्हें कोई गोली या गाली नहीं मार सकती।
आज भारत ‘नए भारत’ और ‘विकसित भारत’ के निर्माण के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। इस यात्रा में गांधी को नए संदर्भ में देखने की जरूरत है। गांधी का स्वदेशी केवल चरखे तक सीमित नहीं था; उसका मूल भाव आत्मनिर्भरता था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 30 जनवरी 2026 को गांधीजी की पुण्यतिथि पर भी स्वदेशी को विकसित और आत्मनिर्भर भारत के संकल्प का आधारस्तंभ बताते हुए उनके कर्तव्य-बोध को स्मरण किया। आज जब भारत स्थानीय उत्पादन, आत्मनिर्भरता, नवाचार, डिजिटल क्षमता और उद्यमिता को आगे बढ़ाने की बात करता है, तब गांधी का स्वावलंबन एक नए आर्थिक और सामाजिक संदर्भ में दिखाई देता है। गांधी के लिए विकास का अर्थ केवल उत्पादन और संपन्नता बढ़ाना नहीं था। विकास का अंतिम लक्ष्य मनुष्य था। उनकी दृष्टि में सबसे कमजोर व्यक्ति की चिंता विकास की कसौटी थी। आज ‘सबका साथ, सबका विकास’ और अंतिम व्यक्ति तक सुविधाओं तथा अवसरों की पहुंच की चर्चा इसी व्यापक मानवीय विकास के संदर्भ में की जा सकती है। गांधी का ‘अंत्योदय’ किसी सरकारी योजना का नाम नहीं, बल्कि विकास की नैतिक कसौटी है-जिसके केंद्र में वह व्यक्ति हो जो सबसे पीछे है।
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गांधी की सबसे बड़ी शक्ति यह थी कि उन्होंने राजनीति को केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं माना। उनके लिए राजनीति का नैतिक आधार सेवा था। आज लोकतंत्र को केवल चुनावों और संस्थाओं तक सीमित न रखकर संवाद, सहभागिता, उत्तरदायित्व और जनविश्वास से जोड़ने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री मोदी ने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की लोकतांत्रिक परंपरा, संवाद और सहभागिता की विरासत को रेखांकित किया है। 2023 के जी-20 सम्मेलन में उन्होंने भारत की प्राचीन सभा-परंपराओं और सामूहिक निर्णय की ऐतिहासिक परंपरा का उल्लेख किया था। यह दृष्टि गांधी की उस राजनीति से संवाद करती है जिसमें जनता केवल शासन की प्रजा नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की सहभागी थी। भारत की विदेश नीति और वैश्विक भूमिका में भी गांधी-दृष्टि के नए संकेत दिखाई देते हैं। 2023 में भारत की जी-20 अध्यक्षता का सूत्र था-‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य।’ प्रधानमंत्री ने इसे भारतीय सभ्यता के ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के भाव से जोड़ा और विश्व की समस्याओं के समाधान के लिए सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया। नई दिल्ली में जी-20 नेताओं का राजघाट जाकर गांधी को श्रद्धांजलि देना भी प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण था। उस अवसर पर गांधी के शांति, सेवा, करुणा और अहिंसा के आदर्शों को सामंजस्यपूर्ण और समावेशी वैश्विक भविष्य से जोड़ा गया।
सचमुच आज विश्व को गाँधीजी के जीवन-मूल्यों की ज्यादा आवश्यकता है । आज धार्मिक कट्टरता बढ़ रही है। कुछ लोग जेहाद के नाम पर घृणित कृत्यों को अंजाम दे रहे हैं। कहीं दंगे हो रहे हैं तो कहीं महिलाओं और बच्चों के साथ अत्याचार की घटनाएँ हो रही हैं। धर्म और संप्रदाय के नाम पर समाज में विष घोला जा रहा है। दुनिया में शस्त्रों की होड़ चल रही है। आतंकवाद जीवन का अनिवार्य सत्य बन गया है। ऐसे में गाँधी बहुत याद आते हैं। इनके विचारों को फैलाकर ही दुनिया में शांति लाई जा सकती है। यहां गांधी की प्रासंगिकता एक और बड़े आयाम में सामने आती है। दुनिया आज युद्ध, आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता, आर्थिक असमानता, जलवायु संकट और अविश्वास की चुनौतियों से गुजर रही है। तकनीक ने मानव की शक्ति बढ़ाई है, लेकिन क्या उसने मानवता बढ़ाई है-यह बड़ा प्रश्न है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लेकर परमाणु हथियारों तक, मनुष्य ने अभूतपूर्व शक्ति हासिल की है; लेकिन शक्ति के साथ संयम, करुणा और नैतिकता न हो तो वही शक्ति विनाश का कारण बन सकती है। गांधी का संदेश इसलिए आज और महत्वपूर्ण है कि उन्होंने साधन और साध्य की पवित्रता को एक-दूसरे से अलग नहीं किया। गांधी को किसी एक राजनीतिक खेमे में बांधना उनके विराट व्यक्तित्व को छोटा करना है। गांधी को केवल कांग्रेस, केवल स्वतंत्रता आंदोलन, केवल खादी या केवल किसी एक राजनीतिक व्याख्या तक सीमित करना उनके वैश्विक स्वरूप के साथ न्याय नहीं है। गांधी भारत की आत्मा से निकले और मानवता की चेतना का हिस्सा बने। वे सीमाओं से आबद्ध नहीं हैं। वे अतीत के हैं, लेकिन केवल अतीत के नहीं हैं। वे आज के हैं और आने वाले हर कल के लिए उपयोगी हैं।
भारत जब विश्व में अपनी भूमिका का विस्तार कर रहा है, तब गांधी-दर्शन उसके लिए नैतिक पूंजी बन सकता है। आर्थिक शक्ति भारत को प्रभावशाली बना सकती है, तकनीकी शक्ति उसे सक्षम बना सकती है और सामरिक शक्ति उसे सुरक्षित कर सकती है; लेकिन नैतिक शक्ति ही भारत को विश्वसनीय बना सकती है। विश्वगुरु होने का अर्थ दुनिया पर प्रभुत्व स्थापित करना नहीं, बल्कि दुनिया के सामने ऐसा जीवन-मूल्य प्रस्तुत करना है जिससे मानवता लाभान्वित हो। गांधी इसी नैतिक नेतृत्व की सबसे बड़ी भारतीय संभावनाओं में से एक हैं। प्रधानमंत्री द्वारा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं, लोकतांत्रिक मूल्यों और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को प्रस्तुत करना इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा सकता है। नए भारत की वास्तविक उपलब्धि केवल यह नहीं होगी कि भारत कितना बड़ा आर्थिक राष्ट्र बनता है; बड़ी उपलब्धि यह होगी कि उसकी विकास यात्रा कितनी मानवीय, समावेशी, संवेदनशील और टिकाऊ होती है। सड़कें, उद्योग, डिजिटल क्रांति, अंतरिक्ष अभियान, स्टार्टअप और आर्थिक विकास आवश्यक हैं, लेकिन इनके साथ सत्य, नैतिकता, सामाजिक समरसता, स्वच्छता, पर्यावरण-संरक्षण और कमजोर के प्रति संवेदना भी आवश्यक है। यही वह स्थान है जहां गांधी आधुनिक भारत की विकास-यात्रा के साथ खड़े दिखाई देते हैं।
गांधी की प्रासंगिकता का सबसे बड़ा प्रमाण शायद यही है कि उन्हें समाप्त करने की जितनी कोशिश हुई, वे उतने ही व्यापक होते गए। आज गांधी केवल भारत के नहीं, विश्व के नैतिक विमर्श का हिस्सा हैं। हिंसा से भरी दुनिया में अहिंसा, विभाजन के बीच संवाद, उपभोगवाद के बीच संयम, केंद्रीकरण के बीच विकेंद्रीकरण, निराशा के बीच सत्य और सत्ता-केंद्रित राजनीति के बीच सेवा-ये गांधी के वे सूत्र हैं जिनकी जरूरत भविष्य की सभ्यता को भी रहेगी। इसलिए इस गांधी जयंती पर हमें केवल गांधी की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित नहीं करने हैं; हमें यह देखना है कि हमारे जीवन, समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था और विश्व-दृष्टि में गांधी के कितने मूल्य जीवित हैं। गांधी का पुनर्जन्म किसी व्यक्ति के रूप में नहीं हो सकता; गांधी का पुनर्जन्म तभी होगा जब सत्य फिर से साहस बने, अहिंसा फिर से शक्ति बने, स्वदेशी फिर से आत्मविश्वास बने, सेवा फिर से राजनीति का संस्कार बने और मानवता फिर से विकास का केंद्र बने। नया भारत यदि विकसित भारत बनना चाहता है और भारत यदि विश्व में नैतिक नेतृत्व की भूमिका निभाना चाहता है, तो उसे आधुनिकता और आध्यात्मिकता, विज्ञान और विवेक, शक्ति और शांति, विकास और करुणा का संतुलन साधना होगा। गांधी इस संतुलन के सबसे प्रखर भारतीय प्रतीकों में हैं। गांधी को अतीत की तस्वीर से निकालकर भविष्य की दृष्टि बनाना होगा। यही गांधी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही उस भारत की पहचान होगी जो केवल विकसित नहीं, बल्कि संवेदनशील, शांतिप्रिय, नैतिक और मानवता के कल्याण का मार्गदर्शक भारत बनना चाहता है।
- ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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