ऐसी रिपोर्ट्स हैं कि पाकिस्तान लगातार अपनी सैन्य तैयारियों को मजबूत करने में जुटा है। खुफिया सूत्रों के मुताबिक उसने चीन से मिले 250 अत्याधुनिक एसएच 15 सेल्फ प्रोपेल होवेसर भारत से लगी पूरी पश्चिमी सीमा पर तैनात करने शुरू कर दिए हैं। यानी जम्मू कश्मीर से लेकर पंजाब, राजस्थान और गुजरात सेक्टर तक पाकिस्तान अपनी लंबी दूरी की आर्टिलरी को नए सिरे से व्यवस्थित कर रहा है। यह हाल के सालों में उसकी सबसे बड़ी आर्टिलरी तैनाती मानी जा रही है। खुफिया सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान ने हाल ही में चीन से 250 एसएच 15 ट्रक माउंटेड सेल्फ प्रोपेल होत्सर हासिल किए। अब इन्हें चरणबंद तरीके से भारत से लगी पश्चिमी सीमा पर तैनात किया जा रहा है। यह तैनाती किसी एक जगह नहीं हो रही बल्कि पूरी सीमा पर अलग-अलग रणनीतिक इलाकों में की जा रही है। इसका सीधा मतलब है कि पाकिस्तान अपनी आर्टिलरी फायर पावर को पहले से कहीं ज्यादा मजबूत बनाने की कोशिश में है।
अचानक पाकिस्तान यह तैनाती क्यों कर रहा है?
इसका बहुत साफ और सीधा जवाब है ऑपरेशन सिंदूर। मई 2025 में भारत ने आतंकवाद के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर चलाया। भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना ने मिलकर पाकिस्तान के भीतर मौजूद आतंकी ढांचों पर सटीक हमले किए। उस अभियान ने पाकिस्तान को साफ संदेश दिया कि भारत जरूरत पड़ने पर सीमा पार भी कार्रवाई करने की क्षमता रखता है और अब माना जा रहा है कि उसी के बाद पाकिस्तान अपनी सैन्य तैयारियों में तेजी लाने में जुटा है और यही वजह है कि चीन से इतने बड़े स्तर पर उसने ये तोपें हासिल की और अब इनकी तैनाती शुरू की जा रही है।
अब अगर बात चीन के इस हथियार के बारे में करें यानी कि एसएच होवसर तोपो की तो आपको बता दें एसए 15 चीन की सरकारी रक्षा कंपनी नोरिंको ने बनाया है। यह चीन की सेना के पीसीएल 1881 का एक्सपोर्ट वर्जन है। यह कोई साधारण तोप नहीं इसे 6 * 6 यानी ट्रक पर लगाया गया है। यानी इसे किसी ट्रेलर से खींचने की जरूरत नहीं पड़ती। जहां जरूरत पड़ी वहां पहुंची। कुछ ही मिनटों में फायरिंग की और फिर तुरंत दूसरी जगह निकल गई। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। आधुनिक युद्ध में इसे शूटन स्कूट क्षमता कहा जाता है। यानी गोली चलाओ और जवाबी हमला आने से पहले अपनी जगह बदल दो। यही वजह है कि ऐसी तोपों को नष्ट करना पारंपरिक आर्टिलरी की तुलना में कहीं ज्यादा मुश्किल हो जाता है। और अगर इसकी मारक क्षमता की अगर हम बात करें तो यह 155 एमएम और 52 कैलिबर की होवेस्टर है। सामान्य गोले से करीब 30 से 40 कि.मी. तक हमला कर सकती है। लेकिन अगर रॉकेट असिस्टेड बी लैप गोले इस्तेमाल किए गए तो इसकी रेंज 53 से 72 किमी तक बताई जाती है। इसमें ऑटोमेटेड फायर कंट्रोल सिस्टम है और यह 1 मिनट में छह राउंड तक फायर कर सकती है। यानी कम समय में भारी गोलाबारी और फिर तुरंत दूसरी जगह।
यहां पर खबर ये नहीं है कि पाकिस्तान ने चीन से तोपे ली क्योंकि पाकिस्तान ने 250 की संख्या में ये तोपे ली हैं तो इसी वजह से ये अपने आप में एक बड़ी खबर बन जाती है क्योंकि 250 अमित सर किसी एक ब्रिगेड के लिए नहीं होते। इतनी संख्या कई आर्टिलरी रेजीमेंट को पूरी तरह लेस कर सकती है। यानी पाकिस्तान सिर्फ नई तोपे नहीं खरीद रहा बल्कि अपनी पूरी लंबी दूरी की गोलाबारी क्षमता को अपग्रेड कर रहा है। लेकिन इस पूरी कहानी में सबसे बड़ा किरदार चीन। पाकिस्तान भले ही यह हथियार सीमा पर तैनाती कर रहा हो लेकिन अगर बड़ी तस्वीर देखा जाए तो चीन की भूमिका यहां पर ज्यादा बड़ी है। आज पाकिस्तान की सेना का आधुनिकीकरण तेजी से चीन के भरोसे पर हो रहा है। लड़ाकू विमान चाहिए। चीन दे रहा है। ड्रोन चाहिए उसके लिए चीन है। यहां तक कि एयर डिफेंस चाहिए वो भी पाकिस्तान चीन से ले रहा है। अब आधुनिक सेल्फ प्रोपेल्ड ऑफिसर भी चीन ने दे दिए। यानी पाकिस्तान की सैन्य ताकत में जो भी नया जोड़ रहा है उसमें चीन की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है।
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दुनिया भर में इस वक्त तनाव चरम पर है। कहीं युद्ध का खतरा है तो कहीं ऊर्जा संकट की चिंता बनी हुई है और ऐसे ही माहौल में भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सबसे ऊपर रखते हुए रूस से कच्चे तेल की खरीद को और बढ़ा दिया है। जुलाई महीने में भारत ने रूस से रिकॉर्ड मात्रा में तेल खरीदा जो देश के कुल कच्चे तेल आयात का आधे से भी ज्यादा हिस्सा रहा। जुलाई महीने में भारत ने रूस से अब तक का सबसे ज्यादा कच्चा तेल खरीदा। आंकड़ों के मुताबिक रूस से भारत को करीब 28 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल मिला। यानी भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी पहली बार 55% से ज्यादा हुई। सीधे शब्दों में कहें तो जुलाई में भारत ने जितना भी कच्चा तेल विदेशों से खरीदा उसमें से आधे से ज्यादा हिस्सा रूस का था।
दरअसल साल 2022 में जब रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू हुआ था तब अमेरिका और यूरोप समेत कई पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए थे। इसके बाद रूस ने अपना तेल कम कीमत पर बेचना शुरू किया और भारत ने भी अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए रूस से तेल खरीद बढ़ा दी। अब हालात यह हैं कि रूस भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन चुका है। हालांकि ऐसा नहीं है कि भारत सिर्फ रूस पर निर्भर है। जुलाई के आंकड़े बताते हैं कि भारत ने पश्चिम एशिया के देशों से भी तेल खरीद बढ़ाई। सऊदी अरब से भारत का तेल आयात बढ़कर करीब 4.2 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया। वहीं इराक से भी तेल खरीद में तेजी आई और जुलाई में यह करीब 1.3 लाख बैरल प्रतिदिन रहा। कुवैत ने भी दोबारा भारत को तेल सप्लाई शुरू की। वहीं संयुक्त अरब अमीरात से आयात थोड़ा कम हुआ लेकिन वह अभी भी भारत के बड़े तेल सप्लायर देशों में शामिल हैं। इसके पीछे वजह यह है कि कुछ समय पहले पश्चिम एशिया में तनाव के कारण तेल सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई थी। लेकिन अब हालात सामान्य होने के बाद भारत ने वहां से भी खरीद बढ़ानी शुरू कर दी है।
आपको बता दें भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयात करने वाला देश है। देश की अर्थव्यवस्था, उद्योग और आम लोगों की जरूरतों के लिए लगातार ऊर्जा की जरूरत होती है। ऐसे में भारत की नीति साफ है कि जहां से बेहतर कीमत और भरोसेमंद सप्लाई मिले वहां से तेल खरीदा जाए। भारत, रूस के अलावा अमेरिका, खाड़ी देशों और दूसरे देशों से भी तेल आयात करता है। हालांकि अब एक नई चुनौती सामने जरूर आ रही है। अमेरिकी सीनेट ने हाल ही में रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले एक बिल को मंजूरी दी। इस बिल में उन देशों पर 100% तक अतिरिक्त टेरिफ लगाने का प्रावधान है जो रूस से बड़ी मात्रा में तेल या गैस खरीदते हैं। इस बिल के निशाने पर सीधे तौर पर रूस के बड़े तेल खरीददार देशों में भारत और चीन भी आ सकते हैं। हालांकि अभी तक यह बिल कानून नहीं बना। इसे आगे अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में मंजूरी मिलनी बाकी है।
भारत ने इस पूरे मामले पर कहा है कि वह घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। विदेश मंत्रालय ने भी साफ किया कि भारत की ऊर्जा नीति किसी दबाव में नहीं बल्कि देश के हित और 140 करोड़ लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। यानी एक तरफ भारत रूस से सस्ता और भरोसेमंद तेल लेकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत कर रहा है। वहीं दूसरी तरफ अमेरिका जैसे देशों के साथ अपने रिश्तों का संतुलन भी बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। फिलहाल दुनिया की नजर भारत की इस रणनीति पर है क्योंकि तेल सिर्फ व्यापार का मुद्दा नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति का बड़ा हथियार बन चुका है। लेकिन जिस तरह से पिछले महीने भारत ने रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीदा यह जरूर दिखाता है कि भारत किसी भी दबाव में नहीं आने वाला है।
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