आतंकवाद के खिलाफ एक साथ आए BIMSTEC देश, भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह समझौता
BIMSTEC देशों के गृह मंत्रियों की बैठक में आतंकवाद, ड्रग्स तस्करी, साइबर क्राइम और मानव तस्करी पर एक साथ कार्रवाई पर सहमति बनी. इस बैठक में पांच अहम समझौते और एक्शन प्लान को भी मंजूरी मिली. समझिए भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह समझौता
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Jharkhand News: त्योहारी सीजन में रांची में सब्जियों के दाम बेकाबू, बिगाड़ा रसोई का बजट
Jharkhand News: राजधानी रांची में त्योहारों का मौसम शुरू होते ही महंगाई ने आम जनता की कमर तोड़ दी है. दुर्गा पूजा और नवरात्र के आगमन के साथ ही बाजार में सब्जियों की कीमतें आसमान छूने लगी हैं. आलू को छोड़ दिया जाए तो लगभग हर सब्जी के भाव में भारी उछाल आया है. जो हरी सब्जियां आम दिनों में रसोई की शान हुआ करती थीं, अब वे आम आदमी की पहुंच से दूर होती दिख रही हैं. मंडी में हालत यह है कि ज्यादातर सब्जियां 40 रुपये से लेकर 100 रुपये प्रति किलो के भाव पर बिक रही हैं. अचानक आई इस तेजी ने मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों के घरेलू बजट को पूरी तरह हिलाकर रख दिया है. लोग अब थैला भरकर सब्जी खरीदने के बजाय केवल जरूरत भर का सामान लेकर लौट रहे हैं.
मंडी में कीमतों का नया गणित
रांची की थोक और खुदरा सब्जी मंडियों का जायजा लेने पर साफ दिखता है कि दाम किस कदर बढ़ चुके हैं. खुदरा बाजार में प्याज की अलग-अलग किस्में 50 रुपये से लेकर 60 रुपये प्रति किलो तक बिक रही हैं. टमाटर के तेवर भी तीखे हैं और यह 40 से 50 रुपये किलो तक पहुंच चुका है. हरी सब्जियों की बात करें तो फूलगोभी 70 से 80 रुपये किलो बिक रही है. नेनुआ, झींगी और भिंडी जैसी आम सब्जियां भी 50 से 60 रुपये से नीचे मिलने का नाम नहीं ले रही हैं. कुछ दिन पहले तक 10 से 20 रुपये में मिलने वाली भिंडी अब सीधे 80 रुपये प्रति किलो तक जा पहुंची है. मंडी में 40 रुपये से कम भाव वाली कोई भी हरी सब्जी ढूंढना मुश्किल हो गया है.
बाहरी मंडियों में मांग बढ़ने से घटी आवक
सब्जी के खुदरा विक्रेताओं का कहना है कि यह तेजी पिछले तीन-चार दिनों में बहुत तेजी से आई है. नवरात्र शुरू होने के बाद बाहर की बड़ी मंडियों, खासतौर पर कोलकाता में सब्जियों की मांग अचानक बढ़ गई है. बाहर के बड़े व्यापारी यहां आकर माल ऊंचे दामों पर खरीद लेते हैं. बड़े पैमाने पर सब्जियों की खेप बाहर भेजे जाने से स्थानीय बाजार में आवक काफी कम हो गई है. जब मंडी में माल कम पहुंचता है और स्थानीय मांग बनी रहती है, तो कीमतें अपने आप बढ़ जाती हैं. दुकानदारों का भी यही मानना है कि थोक मंडी से ही महंगा माल मिलने के कारण वे इसे ऊंचे भाव पर बेचने के लिए मजबूर हैं.
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