बांग्लादेश में चुनाव से ठीक पहले एक हिंदू व्यापारी की निर्मम हत्या और चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में उसी दल और गठबंधन की बढ़त की खबरों ने वहां के हिंदुओं को भीतर तक झकझोर दिया है, जिनके पिछले शासनकाल के दौरान हिंदुओं पर अत्याचार, पलायन और भय का काला दौर देखा गया था। यादों के जख्म अभी भरे भी नहीं थे कि वर्तमान घटनाओं और राजनीतिक संकेतों ने फिर वही डर जगा दिया है कि कहीं इतिहास खुद को दोहरा न दे।
हम आपको बता दें कि 9 फरवरी की रात मयमनसिंह जनपद के दक्षिणकांदा गांव में 62 वर्ष के चावल व्यापारी सुषेन चंद्र सरकार की निर्मम हत्या कर दी गयी। हमलावरों ने धारदार हथियार से वार कर उन्हें दुकान के भीतर लहूलुहान छोड़ा, शटर गिराया और लाखों टका लेकर फरार हो गये। जब परिवार ने खोजबीन की तो वह खून से सने मिले। अस्पताल ले जाने पर चिकित्सकों ने उन्हें मृत बताया। उनके पुत्र सुजन सरकार का कहना है कि पिता की किसी से दुश्मनी नहीं थी, फिर भी हत्या की गयी और धन लूटा गया। सुजन सरकार ने हत्यारों की शीघ्र पहचान कर उन्हें दंडित करने की मांग की है।
हम आपको याद दिला दें कि इसी क्षेत्र में एक अन्य हिंदू युवक दिपु चंद्र दास की भी भीड़ ने पीटकर हत्या कर उसे जला दिया था। इन घटनाओं ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि क्या बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समाज सुरक्षित है? देखा जाये तो पिछले एक वर्ष में हत्या, आगजनी, मंदिरों में तोड़फोड़, जमीन कब्जाने और झूठे आरोपों के सहारे भीड़ को उकसाने की घटनाएं बढ़ी हैं। कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूह लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि राजनीतिक बदलाव के बाद अल्पसंख्यकों पर दबाव तेज हुआ है। भारत ने भी चिंता जताते हुए कहा है कि बार बार हो रहे हमलों को निजी झगड़ा या साधारण विवाद बताकर टालना दोषियों का हौसला बढ़ाता है। भारत का कहना है कि ऐसे माहौल से भय और असुरक्षा फैलती है।
हम आपको बता दें कि 12 फरवरी को बांग्लादेश में होने वाले चुनाव में 300 में से 299 सीटों पर मतदान होगा और साथ में जनमत संग्रह भी होगा। प्रचार अवधि समाप्त हो चुकी है। इस बार अवामी लीग को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी गयी, जिसका शेख हसीना ने विरोध किया है। वह इस समय भारत में निर्वासन में हैं और उनके विरुद्ध मृत्यु दंड का आदेश भी सुनाया जा चुका है। उनके करीबी और पूर्व वित्त मंत्री हसन महमूद ने चुनाव को पूर्व नियोजित बताते हुए कहा है कि पूरी प्रक्रिया एक खास सोच को सत्ता में बनाये रखने के लिए गढ़ी गयी है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समाज से बहिष्कार की अपील करते हुए यह भी दावा किया है कि वर्तमान अंतरिम सरकार बाहरी असर में काम कर रही है। साथ ही उन्होंने कहा कि शेख हसीना सुरक्षित हैं और जल्द ही लौटेंगी।
दूसरी ओर, चुनावी मैदान में मुख्य टक्कर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात ए इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 दलों के गठबंधन के बीच मानी जा रही है। एक विस्तृत जनमत सर्वेक्षण में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के गठजोड़ को बढ़त दिखायी गयी है। सर्वेक्षण में कहा गया है कि 200 से अधिक स्थान उस गठजोड़ को मिल सकते हैं, जबकि जमात वाले मोर्चे को चार दर्जन के आसपास स्थान मिलेंगे। 41 हजार से अधिक लोगों की राय पर आधारित इस आकलन में महिलाओं और कुछ क्षेत्रों में राष्ट्रवादी दल को विशेष समर्थन बताया गया है। कई स्थानों पर कड़ी टक्कर का अनुमान है। परिणाम 13 फरवरी को आयेंगे।
इस बीच, मत गणित से परे एक गहरी बेचैनी भी देखने को मिल रही है। बांग्लादेश के हिंदू और उदार सोच वाले वर्ग में यह भावना बढ़ रही है कि वे दो पाटों के बीच पिस रहे हैं। एक ओर जमीनी स्तर पर हमले, जबरन वसूली और जमीन कब्जे की शिकायतें हैं, दूसरी ओर उन्हें लगता है कि भारत अपनी नीति बदल रहा है। बहुत से लोगों को याद है कि 2001 से 2006 के दौर में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात के शासन के समय हजारों हिंदू देश छोड़ने पर मजबूर हुए थे, सैंकड़ों महिलाओं पर अत्याचार हुए थे। उस काले दौर की स्मृति आज भी जिंदा है। उस समय खालिदा जिया बांग्लादेश की प्रधानमंत्री थीं और उनके निधन के बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की कमान उनके बेटे संभाल रहे हैं।
यहां यह भी काबिलेगौर है कि जब भारत ने हाल में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेताओं से संवाद बढ़ाया और जमात से भी संपर्क के संकेत दिये, तो उदार और हिंदू वर्ग के बीच असमंजस गहरा गया। उन्हें लगता है कि जिन मूल्यों के कारण वे भारत की ओर भरोसे से देखते थे, वही आधार कमजोर पड़ रहा है। जनसंख्या में हिंदुओं का हिस्सा दशक दर दशक घटा है, जिससे उनकी राजनीतिक ताकत भी घटी है। ऐसे में हर हमला उनके भविष्य को लेकर डर बढ़ाता है।
उधर, बांग्लादेश के भीतर एक नई पीढ़ी भी है जो लोकतंत्र, स्वाभिमान और बाहरी दखल से मुक्ति की बात कर रही है। विश्वविद्यालयों की दीवारों पर लिखे नारे बताते हैं कि युवा पीढ़ी भारत के असर को संदेह की नजर से देखती है। सीमा पर तनाव, पानी बंटवारा, व्यापार बाधाएं और कठोर बयानबाजी ने इस सोच को हवा दी है। कुल मिलाकर बांग्लादेश इस समय एक कठिन मोड़ पर खड़ा है। चुनावी अनिश्चितता, अल्पसंख्यक सुरक्षा का सवाल और पड़ोसी देशों की सामरिक खींचतान, सब एक साथ चल रहे हैं। देश का भूगोल ऐसा है कि यहां कई शक्तियों के हित टकराते हैं। जो भी सरकार बनेगी, उसे भीतर की दरारें भरनी होंगी और बाहर के रिश्ते संभालने होंगे।
बांग्लादेश की आज की तस्वीर चेतावनी देती है कि लोकतंत्र केवल मतपेटी से नहीं चलता, बल्कि नागरिक सुरक्षा और भरोसे से चलता है। जब अल्पसंख्यक अपने घर और दुकान में सुरक्षित न हों, तब चुनाव का उत्सव खोखला लगता है। सुषेन चंद्र सरकार की हत्या केवल एक अपराध नहीं, बल्कि राज्य की विश्वसनीयता पर चोट है।
बहरहाल, भारत और बांग्लादेश का रिश्ता केवल कूटनीति नहीं, इतिहास और संस्कृति से जुड़ा है। पर रिश्ते बराबरी, सम्मान और संवेदनशीलता से चलते हैं। बांग्लादेश की सत्ता को समझना होगा कि अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हमला देश की छवि, निवेश और स्थिरता सबको नुकसान पहुंचाता है। भारत को भी समझना होगा कि सामरिक दृष्टि से अस्थिर बांग्लादेश किसी के हित में नहीं है। चरमपंथ, अवैध हथियार, सीमा तनाव और बाहरी दखल पूरे क्षेत्र को असुरक्षित बनाते हैं।
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जेफ्री एपस्टीन का मामला खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। अब इस कहानी में एक नया मोड़ आया है, जहाँ दो अमेरिकी सांसदों डेमोक्रेट रो खन्ना और रिपब्लिकन थॉमस मैसी ने जासूसी फिल्मों के अंदाज में सीधे न्याय विभाग (DOJ) में घुसकर वो राज निकाल लिए हैं जिन्हें दबाने की कोशिश की जा रही थी।
रो खन्ना ने आरोप लगाया है कि कई "ताकतवर और अमीर" लोगों को बचाने के लिए फाइलों के साथ छेड़छाड़ की गई है। इसलिए रो खन्ना और थॉमस मैसी ने संसद में इस मुद्दे को उठाया और उससे पहले दोनों ने खुद जस्टिस डिपार्टमेंट जाकर इस मुद्दे पर जांचपड़ताल की ताकि सबूत सबके सामने आ सकें।
वो 6 नाम, जिन्हें छुपाने की कोशिश हुई
रो खन्ना और थॉमस मैसी को जब लगा कि सार्वजनिक की गई फाइलों में बहुत कुछ अधूरा है, तो वे खुद जस्टिस डिपार्टमेंट पहुँच गए। दो घंटे तक बिना कांट-छाँट (Un-redacted) वाली फाइलों को खंगालने के बाद उन्होंने उन 6 रसूखदार पुरुषों के नाम उजागर किए, जिन्हें अब तक पर्दे के पीछे रखा गया था। ये नाम हैं:
- लेस्ली वेक्सनर (अरबपति बिजनेसमैन)
- सुल्तान अहमद बिन सुलेयम
- निकोला कापुतो
- लिओनिक लिओनोव
- जुराब मिकेलाद्ज़े
- साल्वातोर नुआरा
रो खन्ना ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर सवाल उठाया, "अगर हम खुद वहाँ न जाते, तो क्या इन लोगों के नाम कभी सामने आते?" रो खन्ना ने इस मुद्दे पर ट्रम्प प्रशाशन को घेरा और इन गुप्त फाइलों की सफाई और ट्रंप प्रशासन पर हमला बोला।
रो खन्ना का गुस्सा सिर्फ नामों तक सीमित नहीं था, उन्होंने सीधे तौर पर सिस्टम पर सवाल उठाए।
खन्ना के मुताबिक, 30 लाख पन्नों की फाइलों में से 70-80% हिस्सा अब भी काला (Redacted) कर दिया गया है ताकि कुछ पढ़ा न जा सके। यानी की 80% डेटा गायब गायब कर दिया गया है ताकि कोई उसे एक्सेस नहीं कर पाए। साथ ही उन्होंने FBI पर भी आरोप लगाए और दावा किया कि डोनाल्ड ट्रंप की FBI ने मार्च में ही इन फाइलों को 'साफ' (Scrubbed) कर दिया था, यानी कानून पास होने से पहले ही जरूरी जानकारियां हटा दी गई थीं।
खन्ना ने कहा कि 'एपस्टीन फाइल्स ट्रांसपेरेंसी एक्ट' के तहत कथित साजिशकर्ताओं के नाम छुपाने की अनुमति नहीं है, फिर भी विभाग ऐसा कर रहा है जो की स्पष्ट रूप से कानून का उल्लंघन है।
30 लाख पन्ने और हजारों वीडियो
जनवरी में जारी की गई इन फाइलों का अंबार छोटा-मोटा नहीं है। इसमें शामिल हैं
30 लाख से ज्यादा पन्ने, 2,000 से अधिक वीडियो और 1,80,000 तस्वीरें। रो खन्ना का कहना है कि जब सिर्फ 6 नामों को बाहर लाने के लिए सांसदों को खुद दफ्तर जाना पड़ा, तो सोचिए उन लाखों पन्नों में और कितने रसूखदारों के काले कारनामे दफन होंगे।
एपस्टीन की मौत के सालों बाद भी उसका 'नेटवर्क' पूरी दुनिया के पावरफुल लोगों की नींद उड़ाए हुए है। रो खन्ना और मैसी की इस 'रेड' ने साफ कर दिया है कि मामला जितना दिखता है, उससे कहीं ज्यादा गहरा है।
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