Shardiya Navratri 2026: नारी सशक्तिकरण का पर्व है नवरात्रि
भारत त्योहारों का देश है जहां हर पर्व का अपना एक विशेष महत्व और पौराणिक कथा होती है। ऐसा ही एक महत्वपूर्ण पर्व है नवरात्रि । यह पर्व मां दुर्गा के नौ रूपों की उपासना और शक्ति आराधना का प्रतीक है। नवरात्रि मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा और आराधना के लिए समर्पित है। जिन्हें शक्ति, साहस, और नारी सशक्तिकरण का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि का अर्थ है नौ रातें। इस दौरान भक्त देवी दुर्गा की विशेष पूजा करते हैं, उपवास रखते हैं, और भक्ति में लीन रहते हैं। इन नो दिनों का भारतीय धर्म एवं दर्शन में ऐतिहासिक महत्व है और इन्हीं दिनों में बहुत सी दिव्य घटनाओं के घटने की जानकारी हिन्दू पौराणिक ग्रन्थों में मिलती है। माता के इन नौ रूपों को नवदुर्गा के नाम से भी जाना जाता है जो इस प्रकार हैं -शैलपुत्री, ब्रह्माचारिणी, चन्द्रघन्टा, कूष्माण्डा, स्कन्द माता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी और सिध्दिदात्री।
नवरात्रि का त्योहार एक बार वसंत ऋतु के दौरान चैत्र नवरात्रि और शरद ऋतु के दौरान शरद नवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। शरद नवरात्रि अश्विन के महीने के दौरान मनाई जाती है जो आमतौर पर सितंबर या अक्टूबर में आती है। वहीं चैत्र नवरात्रि हिन्दू कैलेंडर के चैत्र महीने के दौरान मनाई जाती है। चैत्र नवरात्रि आमतौर पर मार्च या अप्रैल महीने में मनाई जाती है। नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है नौ रातें। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान शक्ति- देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दसवां दिन दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है।
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नवरात्रि से हमें अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई के जीत की सीख मिलती हैं। यह हमें बताती है की इंसान अपने अंदर की मूलभूत अच्छाइयों से नकारात्मकता पर विजय प्राप्ती और स्वयं के अलौकिक स्वरूप से साक्षात्कार कैसे कर सकता है। भारतीय जन-जीवन में धर्म की महत्ता अपरम्पार है। यह भारत की गंगा-जमुना तहजीब का ही नतीजा है कि सब धर्मों को मानने वाले लोग अपने-अपने धर्म को मानते हुए इस देश में भाईचारे की भावना के साथ सदियों से एक साथ रहते चले आ रहे हैं। यही कारण है की पूरे विश्व में भारत की धर्म व संस्कृति सर्वोतम मानी गयी है। विभिन्न धर्मों के साथ जुड़े कई पर्व भी है जिसे भारत के कोने - कोने में श्रध्दा, भक्ति और धूमधाम से मनाया जाता है। उन्ही में से एक है नवरात्रि।
वसन्त की शुरुआत और शरद ऋतु की शुरुआत, जलवायु और सूरज के प्रभावों का महत्वपूर्ण संगम माना जाता है। इन दो समय मां दुर्गा की पूजा के लिए पवित्र अवसर माने जाते है। त्योहार की तिथियां चन्द्र कैलेंडर के अनुसार निर्धारित होती हैं। यह पूजा वैदिक युग से पहले प्रागैतिहासिक काल से है। नवरात्रि के पहले तीन दिन देवी दुर्गा की पूजा करने के लिए समर्पित किए गए हैं। यह पूजा उनकी ऊर्जा और शक्ति की की जाती है। प्रत्येक दिन दुर्गा के एक अलग रूप को समर्पित है।
नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है। चैत्र, आषाढ़, अश्विन, पौष प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ रातों में तीन देवियों महालक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। दुर्गा का मतलब जीवन के दुख को हटानेवाली होता है। नवरात्रि एक महत्वपूर्ण प्रमुख त्योहार है जिसे पूरे भारत में पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। नवरात्रि का त्यौहार असत्य पर सत्य की जीत को दर्शाता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि साल में दो बार मनाया जाता है। हिंदी महीनो के मुताबिक पहला नवरात्रि चैत्र महीने में मनाया जाता है और दूसरी बार अश्विन महीने में मनाया जाता है। नवरात्रि नौ दिनों तक निरंतर चलता है जिसमे देवी माँ के अलग अलग स्वरूपों की लोग भक्ति और निष्ठा के साथ पूजा करते है। भारत में नवरात्रि अलग अलग राज्यों में विभिन्न तरीको और विधियों के संग मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन्हीं नौ दिनों में मां दुर्गा धरती पर आती है। उनके आने की खुशी में इन दिनों को दुर्गा उत्सव के तौर पर देशभर में धूमधाम से मनाया जाता हैं।
नवरात्रि के पहले दिन बालिकाओं की पूजा की जाती है। दूसरे दिन युवती की पूजा की जाती है। तीसरे दिन जो महिला परिपक्वता के चरण में पहुंच गयी है, उसकि पूजा की जाती है। नवरात्रि के चैथे, पांचवें और छठे दिन लक्ष्मी- समृद्धि और शांति की देवी की पूजा करने के लिए समर्पित है। आठवे दिन पर एक यज्ञ किया जाता है। नौवा दिन नवरात्रि समारोह का अंतिम दिन है। यह महानवमी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन उन नौ जवान लड़कियों की पूजा होती है जो अभी तक यौवन की अवस्था तक नहीं पहुंची है। इन नौ लड़कियों को देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है। लड़कियों का सम्मान तथा स्वागत करने के लिए उनके पैर धोए जाते हैं। पूजा के अंत में लड़कियों को उपहार के रूप में नए कपड़े, वस्तुयें, फल प्रदान किए जाते हैं।
शक्ति की उपासना का पर्व शारदीय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है। आदिशक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में क्रमशरू अलग-अलग पूजा की जाती है। मां दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियां देने वाली हैं। इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन होती हैं। नवरात्रि के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है।
इस पर्व से जुड़ी एक कथा अनुसार देवी दुर्गा ने एक भैंस रूपी असुर अर्थात महिषासुर का वध किया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर के एकाग्र ध्यान से बाध्य होकर देवताओं ने उसे अजय होने का वरदान दे दिया। उसको वरदान देने के बाद देवताओं को चिंता हुई कि वह अब अपनी शक्ति का गलत प्रयोग करेगा। महिषासुर ने अपने साम्राज्य का विस्तार स्वर्ग के द्वार तक कर दिया और उसके इस कृत्य को देख देवता विस्मय की स्थिति में आ गए। महिषासुर ने सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण और अन्य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए और स्वयं स्वर्गलोक का मालिक बन बैठा। देवताओं को महिषासुर के प्रकोप से पृथ्वी पर विचरण करना पड़ रहा था तब महिषासुर के इस दुस्साहस से क्रोधित होकर देवताओं ने देवी दुर्गा की रचना की।
ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा के निर्माण में सारे देवताओं का एक समान बल लगाया गया था। महिषासुर का नाश करने के लिए सभी देवताओं ने अपने अपने अस्त्र देवी दुर्गा को दिए थे और कहा जाता है कि इन देवताओं के सम्मिलित प्रयास से देवी दुर्गा और बलवान हो गईं थी। इन नौ दिन देवी-महिषासुर संग्राम हुआ और अन्ततरू महिषासुर-वध कर महिषासुर मर्दिनी कहलायीं। नवदुर्गा और दस महाविद्याओं में काली ही प्रथम प्रमुख हैं। भगवान शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दशमहाविद्या अनंत सिद्धियां प्रदान करने में समर्थ हैं। दसवें स्थान पर कमला वैष्णवी शक्ति हैं, जो प्राकृतिक संपत्तियों की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं। देवता, मानव, दानव सभी इनकी कृपा के बिना पंगु हैं, इसलिए आगम-निगम दोनों में इनकी उपासना समान रूप से वर्णित है। सभी देवता, राक्षस, मनुष्य, गंधर्व इनकी कृपा-प्रसाद के लिए लालायित रहते हैं।
नवरात्रि के दौरान उपवास करने से शरीर से विषाक्त पदार्थ निकल जाते हैं, जिससे शरीर स्वस्थ और निरोगी रहता है। नवरात्रि के दौरान ध्यान, योग और भक्ति करने से मन को शांति मिलती है, जिससे तनाव और चिंता कम होती है। नवरात्रि व्रत का मूल उद्देश्य है इंद्रियों का संयम और आध्यात्मिक शक्ति का संचय। वस्तुत: नवरात्र अंत:शुद्धि का महापर्व है। आज वातावरण में चारों तरफ विचारों का प्रदूषण है। ऐसी स्थिति में नवरात्र का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।
- रमेश सर्राफ धमोरा
(लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार है।)
'पापा, प्लीज मुझे बचा लो...', शेखर सुमन ने याद किए अपने 11 साल के बेटे संग बताए आखिरी पल
Shekhar Suman Remembered His Son: एक्टर और होस्ट शेखर सुमन (Shekhar Suman) के घर में उस दिन मातम छा गया था, जब साल 1995 में एक दिन उनके बड़े बेटे आयुष का निधन हो गया था. वह और उनकी पत्नी आज भी इस दुख को नहीं भुला पाए हैं. वह अपने बेटे की पुण्यतिथि पर नहीं ही बल्कि उसके बारे में सोच कर कभी भी भावुक हो जाते हैं. उन्होंने कई बार बताया कि वह अपने बेटे आयुष से बहुत प्यार करते थे लेकिन वे उसे बचा नहीं पाए. हाल ही एक्टर ने एक इंटरव्यू में अपने बेटे की बीमारी और उसके आखिरी पलों को याद किया. उनका कहना है कि जब उन्हें अपने बेटे की बीमारी के बारे में पता चला तब वह स्ट्रगल कर रहे थे. वह बेटे की सेहत की जानकारी लेने के लिए शूटिंग के दौरान भी अपने पास फोन रखते थे.
'पापा, प्लीज मुझे बचा लो...'
उन्होंने इंटरव्यू में बताया कि निधन से पहले उनका बेटा संस्कृत के श्लोक पढ़ने लगा था और वह सिर्फ 11 साल की ही था. उसने उनका हाथ पकड़ कर कहा कि मुझे बचा लो. शेखर ने कहा, 'मरने से पहले उसने संस्कृत के श्लोक पढ़ना शुरू कर दिया था. वह 11 साल का था. मुझे नहीं पता कि उसने ऐसा कैसे किया. उसने कहा कि उसे एक रोशनी दिखाई दे रही है. उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा, ‘पापा, मैं जाना नहीं चाहता. प्लीज मुझे बचा लो.’ इसके बाद उसने संस्कृत के कुछ श्लोक पढ़ने शुरू कर दिए, जिससे हम घबरा गए.'
बहुत प्यारा बच्चा था
इसके आगे सुमने ने बताया कि उनके बेटे उस पल अपने आसपास मौजूद हर शख्स से कहा था कि वह उससे प्यार करता है. उन्होंने कहा, 'उसने उस समय अपने पास मौजूद हर शख्स से कहा था कि वह उससे प्यार करता है. वह बहुत प्यारा बच्चा था. आज भी मुझे समझ नहीं आता कि हमारे साथ ऐसा दर्दनाक हादसा कैसे हुआ. लेकिन शायद यही किस्मत है. किसी भी माता-पिता के लिए अपने बच्चे को खोने से बड़ा कोई दुख नहीं हो सकता.'
अब उसे इस दुनिया से जाने दें
शेखर सुमन के मुताबिक, आखिरी पल में उनके बेटे की हालत इतनी खराब हो गई थी कि उनकी पत्नी ने खुद उसकी मुक्ति के लिए डॉक्टर से गुजारिश की थी. हालांकि, इस बात से सुमन राजी नहीं थे वह चाहते थे कि उनके बेटे का इलाज चले. उन्होंने बताया, उनके बेटे की हालत इतनी खराब हो गई थी मेरी पत्नी ने डॉक्टरों से गुजारिश की कि वे उसे अब इस दुनिया से जाने दें. जिसके बाद उन्होंने कहा कि तुम क्या कह रही हो? हम आखिरी तक लड़ेंगे.’ लेकिन उन्होंने कहा, ‘यही अंत है. उसे जाने दो, उसे बहुत तकलीफ हो रही है.’ वह एक समझदार मां थीं, जिन्होंने अपने बेटे को इस तकलीफ से मुक्ति दिलाने की बात कही. वह सही थीं. हम उसे इस तरह तकलीफ में नहीं देख सकते थे.'
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दिल की इस बीमारी से पीड़ित थे आयुष
शेखर सुमन के बेटे आयुष सुमन का साल 1994-1995 में महज 11 साल की उम्र में निधन हो गया था. बताया जाता है कि वह 'एंडोमायोकार्डियल फाइब्रोसिस' (Endomyocardial Fibrosis) नाम की गंभीर और लाइलाज दिल की बीमारी से पीड़ित थे. आयुष के जाने का गम शेखर सुमन और उनकी पत्नी अलका के लिए इतना बड़ा सदमा था कि वे अंदर से पूरी तरह टूट गए थे. एक समय के लिए उनका भगवान पर से भरोसा भी उठ गया था. शेखर सुमन अक्सर इमोशनल होकर अपने बेटे के आखिरी पलों को याद करते हैं. शेखर सुमन को किसी ज्योतिषी ने कहा था कि भविष्य में उनके छोटे बेटे अध्ययन के बच्चे (पोते) के रूप में आयुष दोबारा इस फैमिली में जन्म लेगा.
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