San Jose में शुरू हुआ नया Resident Mission, MEA ने कहा- मजबूत होंगे द्विपक्षीय रिश्ते
मध्य अमेरिका में अपनी राजनयिक मौजूदगी बढ़ाने के लिए एक रणनीतिक कदम उठाते हुए, भारत ने कोस्टा रिका की राजधानी सैन होज़े में अपना नया रेजिडेंट मिशन शुरू किया है। नई दिल्ली और सैन होज़े के बीच द्विपक्षीय संबंधों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, और दोनों सरकारें व्यापार, निवेश, फार्मास्यूटिकल्स और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए सक्रिय रूप से प्रयास कर रही हैं। विदेश मंत्रालय (MEA) ने बताया कि भारतीय राजनयिक मिशन ने 10 अक्टूबर को काम करना शुरू कर दिया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि कोस्टा रिका में भारतीय रेजिडेंट मिशन के शुरू होने से मध्य अमेरिका में भारत की राजनयिक मौजूदगी बढ़ाने और भारत तथा कोस्टा रिका के बीच द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने में मदद मिलेगी। हाल ही में खुले इस मिशन के कई तरह के फ़ायदों पर ज़ोर देते हुए, मंत्रालय ने कहा कि इससे बेहतर राजनयिक बातचीत को बढ़ावा मिलेगा, द्विपक्षीय व्यापार और निवेश बढ़ेगा और आपसी हितों के मामलों में सहयोग और गहरा होगा।
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विदेश मंत्रालय (MEA) ने कहा, "इससे बेहतर राजनीतिक जुड़ाव, द्विपक्षीय व्यापार, निवेश और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा मिलेगा और आपसी हितों के क्षेत्रों में सहयोग मज़बूत होगा।" इसके अलावा, यह मिशन गहरे सांस्कृतिक संबंध बनाने और लोगों के बीच मज़बूत संपर्क को बढ़ावा देने के साथ-साथ क्षेत्रीय और बहुपक्षीय प्राथमिकताओं पर कोस्टा रिका के साथ लगातार बातचीत बनाए रखने के लिए तैयार है। मंत्रालय ने कहा कि इस मिशन की स्थापना इस क्षेत्र में रहने वाले प्रवासी भारतीयों के लिए एक अहम उपलब्धि है, जिससे उन्हें आसानी से कांसुलर सेवाएँ मिल सकेंगी। विदेश मंत्रालय ने आगे कहा इससे कोस्टा रिका में भारतीय नागरिकों और भारतीय समुदाय को बेहतर कांसुलर सहायता मिलेगी और उनके हितों की रक्षा करने में मदद मिलेगी।
Dwarka के GGSIPU में बोले Delhi LG, हर प्रोजेक्ट के लिए PPP मॉडल सही नहीं
दिल्ली के उप-राज्यपाल सरदार टी.एस. संधू ने मंगलवार को कहा कि पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) को सिर्फ़ फ़ंडिंग के एक विकल्प के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे एक ऐसे फ़्रेमवर्क के तौर पर देखा जाना चाहिए जो सार्वजनिक मक़सद को प्राइवेट सेक्टर की क्षमताओं, साफ़ तौर पर तय ज़िम्मेदारियों और जवाबदेही के साथ जोड़ता है। द्वारका में गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी (GGSIPU) में "पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप का फ़ायदा उठाना: पॉलिसी, बेंचमार्क, पार्टनरशिप फ़्रेमवर्क और नतीजे" विषय पर आयोजित एक क्षमता-निर्माण कार्यक्रम को संबोधित करते हुए, उप-राज्यपाल संधू ने ज़ोर दिया कि PPP हर सार्वजनिक सेवा के लिए सही नहीं हैं और मॉडल का चुनाव प्रोजेक्ट की प्रकृति और नागरिकों की उम्मीदों पर निर्भर होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकारी अधिकारियों को सार्वजनिक प्राधिकरण की क्षमता, प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी की गुंजाइश और जोखिमों के बंटवारे पर विचार करके PPP की उपयुक्तता का आकलन करना चाहिए।
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संधू ने दिल्ली के विकास की प्राथमिकताओं और 'विकसित दिल्ली@2047' के विज़न को आगे बढ़ाने में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) के महत्व पर ज़ोर दिया, खासकर शहरी ट्रांसपोर्ट, हेल्थकेयर, शिक्षा, जल प्रबंधन, कचरा प्रोसेसिंग, रिन्यूएबल एनर्जी और डिजिटल गवर्नेंस जैसे क्षेत्रों में। उन्होंने कहा कि ये प्राथमिकताएं आपस में जुड़ी हुई हैं और इनकी योजना या इन्हें लागू करने का काम अलग-अलग नहीं किया जा सकता। एक व्यापक दृष्टिकोण की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए, उपराज्यपाल ने सरकारी अधिकारियों से कहा कि वे प्रोजेक्ट्स का मूल्यांकन केवल विभागीय ज़िम्मेदारियों तक सीमित न रखें, बल्कि उनके पूरे जीवन-चक्र (लाइफ-साइकिल) के आधार पर मूल्यांकन करें। उन्होंने कहा कि कोई प्रोजेक्ट तकनीकी रूप से तो संभव हो सकता है लेकिन आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं हो सकता; उसमें प्राइवेट निवेश तो आ सकता है लेकिन वह सस्ती सेवाएं देने में विफल हो सकता है; या वह समय पर पूरा तो हो सकता है लेकिन रखरखाव की व्यवस्था ठीक से न होने के कारण उसे चलाने में दिक्कतें आ सकती हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी चिंताओं का समाधान प्रोजेक्ट लागू होने के बाद नहीं, बल्कि योजना बनाने के चरण में ही किया जाना चाहिए।
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संधू ने सफल PPP के लिए मुख्य सिद्धांतों की रूपरेखा बताई, जिनमें प्रोजेक्ट की सही तैयारी, समयबद्ध संस्थागत समन्वय और मापने योग्य जवाबदेही शामिल हैं। प्रोजेक्ट की तैयारी के संबंध में, उन्होंने व्यवहार्यता मूल्यांकन (feasibility assessments), वित्तीय और कानूनी जांच-पड़ताल (due diligence), मांग का वास्तविक अनुमान, स्टेकहोल्डर्स के साथ बातचीत और स्पष्ट रूप से तय परफॉर्मेंस स्टैंडर्ड्स की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि जोखिमों की ज़िम्मेदारी उस पक्ष को सौंपी जानी चाहिए जो उन्हें संभालने के लिए सबसे बेहतर स्थिति में हो। संस्थागत समन्वय के मामले में, उन्होंने सरकारी विभागों, रेगुलेटर्स और स्थानीय निकायों के बीच स्पष्ट रूप से तय ज़िम्मेदारियों और समयबद्ध फैसलों के महत्व पर ज़ोर दिया।
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