Dussehra पर शमी के पत्ते सोना मानकर क्यों बांटे जाते हैं, रामायण काल से जुड़ा है रहस्य
इस समय भारत में फेस्टिव सीजन चल रहा है। शारदीय नवरात्रि की शुरुआत हो चुकी है। वैदिक पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि पर दशहरा का पर्व मनाया जाता है। इस बार यह पर्व 20 अक्तूबर को मनाया जा रहा है।
हिंदू धर्म का दशहरा एक प्रमुख त्योहार है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस दिन देशभर में रावण दहन किया जाता है। इसके साथ ही शमी के पत्तों को 'सोना' मानकर बांटने की प्राचीन परंपरा है।
दशहरा के दिन लोग अपने प्रियजनों को शमी के पत्ते भेंट करते हैं और उनके पैर छूकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। वैसे यह परंपरा काफी समय से चली आ रही है। अब आपके मन में एक सवाल जरुर आता होगा कि आखिर विजयादशमी पर शमी के पत्तों को 'सोना' मानकर आपस में बांटने की क्या वजह है। आइए आपको इस बारे में पूरी जानकारी देते हैं।
पौराणिक कथाएं
धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार, भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण के साथ युद्ध करने से पहले शमी के पौधे की पूजा-अर्चना की थी। रावण का वध करने के बाद जब श्रीराम, माता सीता और भाई लक्ष्मण अयोध्या लौटे थे, तो उन्होंने अयोध्या में सोने की मुद्राएं बंटवाई थीं। इस कारण से आज भी उसी के प्रतीक स्वरुप दशहरा के दिन शमी की पत्तियां बांटी जाती है।
एक और पौराणिक कथा के अनुसार, महाभारत के समय में पांडवों ने अपने अज्ञातवास के समय सभी अस्त्र-शस्त्र एक शमी पेड़ पर छिपा दिए थे। अज्ञातवास समाप्त होने के बाद उन्होंने दशहरा के दिन अपने हथियार वापस लिए। इसके साथ ही विधिपूर्वक शमी के पेड़ की पूजा-अर्चना की। जिसके बाद पांडवों ने युद्ध के समय कौरवों पर विजय हासिल की। इसलिए शमी को शक्ति और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है।
शमी के पत्ते बांटने का महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार, दशहरा के दिन शमी की पत्तियां बांटने से सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। इसके साथ ही जीवन में शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं। इसके साथ ही मां लक्ष्मी कृपा प्राप्त होती है और व्यक्ति की खूब तरक्की होती है।
Starlink पर कड़ी शर्तें लगाए सरकार, कूटनीति फाउंडेशन ने जताई सुरक्षा चिंता
भारत के एक शोध संस्थान ने सरकार से विदेशी उपग्रह सेवा प्रदाताओं पर कड़ी और ऐसी शर्तें लगाने का आग्रह किया है, जिनसे कोई समझौता न किया जाए। समूह का कहना है कि एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स की स्टारलिंक सेवा अमेरिका को संचार बुनियादी ढांचे पर रणनीतिक बढ़त दे सकती है और भारत की प्रौद्योगिकी संप्रभुता को कमजोर कर सकती है। कूटनीति फाउंडेशन की नवंबर, 2024 में प्रकाशित और अक्टूबर, 2026 में अद्यतन रिपोर्ट में स्टारलिंक को स्पष्ट रूप से भू-राजनीतिक नियंत्रण का एक माध्यम बताया गया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि उपग्रह आधारित ब्रॉडबैंड अब केवल एक व्यावसायिक सेवा नहीं रह गया है, बल्कि सैन्य शक्ति, खुफिया जानकारी जुटाने और भू-राजनीतिक प्रभाव का एक महत्वपूर्ण साधन बनता जा रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को देश के भीतर डेटा के प्रवाह, नेटवर्क तक पहुंच और आपात स्थिति में सेवाएं बंद करने की क्षमता पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहिए। इसके साथ ही देश में अपनी उपग्रह प्रणाली विकसित करने की प्रक्रिया तेज करनी चाहिए।
दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स के स्वामित्व वाली स्टारलिंक पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थित उपग्रहों के जरिये इंटरनेट सेवा देती है। यह सेवा खास तौर पर उन दूरदराज के इलाकों के लिए उपयोगी है, जहां मोबाइल नेटवर्क और ब्रॉडबैंड केबल लगाना मुश्किल या महंगा है। स्टारलिंक 2021 से भारत में प्रवेश की कोशिश कर रही है।
उसे जून, 2025 में प्रमुख लाइसेंस मिले थे और अगले महीने अंतरिक्ष नियामक भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (इन-स्पेस) से अनुमति मिली थी। हालांकि, अंतिम सुरक्षा मंजूरी और स्पेक्ट्रम आवंटन लंबित होने के कारण वह अब तक भारत में अपनी सेवाएं शुरू नहीं कर पाई है। लंबित मुद्दों में सुरक्षा मंजूरी, विदेशी निवेश की अनुमति और स्पेक्ट्रम आवंटन की व्यवस्था शामिल हैं।
अधिकारी इस बात की भी जांच कर रहे हैं कि क्या उपग्रहों के बीच सीधे संपर्क की सुविधा के जरिये भारत का डेटा घरेलू गेटवे को दरकिनार कर बाहर भेजा जा सकता है। सेवा शुरू होने में देरी से नाराज मस्क ने पिछले सप्ताह आरोप लगाया था कि ‘‘प्रभावशाली कारोबारी समूह’’ स्टारलिंक को भारत में प्रवेश करने से रोक रहे हैं। हालांकि, संचार मंत्रालय ने इस आरोप को निराधार बताया था।
मंत्रालय ने कहा था कि तीन उपग्रह सेवा प्रदाता- स्टारलिंक, यूटेलसैट वनवेब और जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस- मंजूरी की प्रक्रिया में लगभग एक ही स्तर पर हैं। तीनों को व्यावसायिक सेवाएं शुरू करने से पहले सुरक्षा मंजूरी और स्पेक्ट्रम आवंटन का इंतजार है। कुटनीति फाउंडेशन ने अमेरिकी रक्षा और खुफिया एजेंसियों के साथ स्पेसएक्स के अनुबंधों का हवाला देते हुए कहा कि उपग्रह संचार का इस्तेमाल व्यावसायिक उद्देश्यों के साथ-साथ रणनीतिक मकसद के लिए भी किया जाता है।
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