Responsive Scrollable Menu

गड्ढों वाली व्यवस्था और खतरे में पड़ता जीवन

गड्ढों में गिरी व्यवस्था में समाप्त होता जीवन आज के भारत की एक ऐसी विडंबना बन चुका है, जिसे देखकर मन भीतर तक सिहर उठता है। नोएडा में कार सवार युवा इंजीनियर की गड्ढे में गिरकर मौत का दर्द अभी समाज के मन से उतरा भी नहीं था कि दिल्ली में बाइक सवार युवक की जान एक खुले गड्ढे ने लील ली। दोनों घटनाओं में समानता यह है कि गड्ढे प्रशासन द्वारा विकास या मरम्मत के नाम पर खोदे गए थे और दोनों जगह न तो कोई बैरिकेडिंग थी, न चेतावनी बोर्ड, न रोशनी की व्यवस्था। मानो व्यवस्था ने पहले गड्ढा खोदा और फिर निश्चिंत होकर वहां से हट गई कि अब जो होगा, वह नागरिक की किस्मत है। यही वह सोच है जो किसी भी समाज को भीतर से खोखला कर देती है।

प्रश्न यह नहीं है कि गड्ढे क्यों खोदे गए, प्रश्न यह है कि गड्ढे खोदकर लोगों को मौत के मुंह में धकेलने का अधिकार प्रशासन को किसने दिया। क्या विकास का अर्थ यह हो गया है कि सड़कों पर चलते हुए हर नागरिक अपनी जान हथेली पर रखे। क्या शहरों की चमक-दमक और बड़े-बड़े दावों के बीच आम आदमी का जीवन इतना सस्ता हो गया है कि उसकी मौत पर सिर्फ एक खबर छप जाए, दो दिन बहस हो और फिर सब कुछ सामान्य हो जाए। यह सामान्य हो जाना ही सबसे बड़ा खतरा है, क्योंकि जब मौतें सामान्य लगने लगें, तब व्यवस्था की संवेदनशीलता मर चुकी होती है।

इसे भी पढ़ें: क्या नोएडा के युवा इंजीनियर युवराज की मौत से सिस्टम लेगा सबक?

दिल्ली जल बोर्ड द्वारा खोदा गया गड्ढा हो या नोएडा की किसी एजेंसी का, जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया हर बार एक जैसी रहती है। अफसर निलंबित कर दिए जाते हैं, जांच समितियां बना दी जाती हैं, 24 या 48 घंटे में रिपोर्ट देने की घोषणा होती है और कुछ समय बाद वही फाइलें धूल फांकने लगती हैं। निलंबन और जांच अब समाधान नहीं, बल्कि एक औपचारिक रस्म बन गई है। सवाल यह है कि क्या निलंबन से मरे हुए बेटे लौट आते हैं, क्या जांच समितियों से टूटे हुए परिवार फिर से जुड़ जाते हैं। जब तक जवाबदेही केवल कागजों पर सिमटी रहेगी, तब तक गड्ढों में गिरती जिंदगियां यूं ही व्यवस्था का शिकार बनती रहेंगी।

इस पूरी तस्वीर का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि बड़े शहरों में ऐसी घटनाएं कम से कम चर्चा में तो आती हैं, मीडिया सवाल तो उठाता है, लेकिन छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में यही गड्ढे रोज जिंदगियां निगल रहे हैं और खबर तक नहीं बनते। वहां न कैमरा पहुंचता है, न कोई प्रतिनिधि, न कोई जांच समिति। वहां मौतें सिर्फ परिवारों की निजी त्रासदी बनकर रह जाती हैं। क्या नागरिक का मूल्य शहर के आकार से तय होगा। क्या महानगरों का नागरिक ज्यादा कीमती है और छोटे शहरों का नागरिक सस्ता। यह असमानता केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि संवेदनाओं की भी है।

हम एक ओर विकसित भारत, सशक्त भारत, विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की बात करते हैं, दूसरी ओर हमारी सड़कों पर खुले गड्ढे हमें आईना दिखाते हैं। विकास की रफ्तार तेज हो सकती है, लेकिन यदि उस रफ्तार में सुरक्षा, जिम्मेदारी और मानवीय संवेदना नहीं जुड़ी, तो वह रफ्तार विनाश की ओर ही ले जाएगी। यह विडंबना ही है कि हम स्मार्ट सिटी की बातें करते हैं, लेकिन स्मार्ट बैरिकेडिंग, स्मार्ट चेतावनी और स्मार्ट जिम्मेदारी पर बात करना भूल जाते हैं। तकनीक के युग में भी एक साधारण चेतावनी बोर्ड लगाना हमारे तंत्र को याद नहीं रहता।

दरअसल समस्या केवल लापरवाही की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की है जिसमें नागरिक को एक आंकड़ा समझ लिया गया है। फाइलों में वह एक केस नंबर है, सड़क पर वह एक बाधा और हादसे के बाद वह एक आंकड़ा। जब तक प्रशासन और शासन की दृष्टि में नागरिक का जीवन सर्वोपरि मूल्य नहीं बनेगा, तब तक हर नया गड्ढा एक नई मौत की संभावना बनकर खड़ा रहेगा। सवाल यह भी है कि क्या इन गड्ढों के लिए कभी उच्च स्तर पर नैतिक जिम्मेदारी तय होगी। क्या कभी ऐसा होगा कि किसी बड़े पद पर बैठे व्यक्ति से पूछा जाए कि आपके विभाग की लापरवाही से एक जान गई, इसलिए आप पद पर बने रहने के नैतिक अधिकारी नहीं हैं।

भ्रष्ट शासन के समाप्त होने की बड़ी-बड़ी घोषणाएं हर चुनाव में सुनाई देती हैं। पोस्टर बदलते हैं, नारे बदलते हैं, लेकिन जमीन पर गड्ढे वैसे ही रहते हैं। यदि भ्रष्टाचार केवल रिश्वत लेने तक सीमित होता तो शायद उसे पहचानना आसान होता, लेकिन यह जो संवेदनहीन भ्रष्टाचार है, जहां नियमों की अनदेखी, सुरक्षा मानकों की उपेक्षा और समय पर काम पूरा न करना शामिल है, यह ज्यादा खतरनाक है। इसमें पैसा दिखता नहीं, लेकिन इसकी कीमत किसी की जान से चुकानी पड़ती है।

आज जब हम अमृत काल और शताब्दी वर्ष में नए भारत की कल्पना कर रहे हैं, तब यह प्रश्न और भी तीखा हो जाता है कि क्या खुले गड्ढों वाला देश महान बन सकता है। क्या वह देश विकसित कहलाने योग्य है, जहां नागरिक रात को सड़क पर निकलते समय यह दुआ करे कि कहीं कोई गड्ढा उसकी जिंदगी न छीन ले। विकास केवल पुलों, सड़कों और इमारतों से नहीं मापा जाता, बल्कि इस बात से मापा जाता है कि आम आदमी खुद को कितना सुरक्षित महसूस करता है। यदि सुरक्षा का भरोसा नहीं, तो सारी उपलब्धियां खोखली हैं।

गड्ढों में गिरी व्यवस्था केवल सड़कों की समस्या नहीं है, यह हमारे शासन तंत्र की नैतिक गिरावट का प्रतीक है। यह उस दूरी को दिखाता है जो सत्ता और नागरिक के बीच बढ़ती जा रही है। जब तक हर गड्ढे को सिर्फ तकनीकी खामी समझा जाएगा और हर मौत को दुर्भाग्य कहकर टाल दिया जाएगा, तब तक यह सिलसिला रुकेगा नहीं। जरूरत इस बात की है कि हर गड्ढा एक सवाल बने, हर मौत एक चेतावनी और हर लापरवाही एक अपराध मानी जाए।

कब वे गड्ढे भरेंगे, कब व्यवस्था की दरारें बंद होंगी और कब विकास की दौड़ में भागता देश यह भरोसा पाएगा कि वह सुरक्षित हाथों में है, यह सवाल आज हर नागरिक के मन में है। शायद उस दिन हम सचमुच कह सकेंगे कि हमारा देश महान बनने की राह पर है। अभी तो लगता है कि हम महान नहीं, बल्कि परेशान हैं और यह परेशानी सिर्फ गड्ढों की नहीं, गड्ढों में गिरती संवेदनाओं की है।

- ललित गर्ग

Continue reading on the app

टी-20 वर्ल्ड कप में रोहतक के मयंक का दम:UAE टीम की तरफ से खेला, न्यूजीलैंड के खिलाफ 13 गेंदों में बनाए 21 रन

रोहतक के गांव घिलौड़ के रहने वाले मयंक चौधरी ने टी-20 वर्ल्ड में न्यूजीलैंड के खिलाफ खेले गए पहले मुकाबले में UAE टीम की तरफ से खेलते हुए ताबड़तोड़ बल्लेबाजी कर 13 गेंदों में 21 रनों की छोटी, लेकिन महत्वपूर्ण पारी खेली। 16वें ओवर में आए मयंक चौधरी ने 2 चौके व एक छक्के की मदद से 21 रन बनाए। मयंक चौधरी ने टी-20 वर्ल्ड कप के अपने पहले मुकाबले में न्यूजीलैंड की टीम का सामना किया। 16वें ओवर में मयंक चौधरी को बैटिंग करने का मौका मिला। मयंक ने अपने स्वभाव के अनुरूप तेज बैटिंग की और 2 चौके व एक छक्के की मदद से स्कोर को 21 रनों तक पहुंचाया। इस दौरान मयंक चौधरी लॉकी फर्ग्यूसन की गेंद पर छक्का मारने के चक्कर में मिचेल सेंटनर को कैच थमा बैठे। 10 साल की उम्र में शुरू किया खेलना मयंक चौधरी जब मात्र 10 साल का था तो क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया। गवर्नमेंट मॉडल स्कूल से 12वीं की पढ़ाई की और डीएवी कॉलेज चंडीगढ़ से पीजी की डिग्री ली। इसी बीच खेलना जारी रखा और पढ़ाई व खेल के बीच एक सामंजस्य बनाए रखा। अंडर 14 में खेला स्कूल नेशनल टूर्नामेंट मयंक चौधरी ने पहली बार स्कूल की तरफ से अंडर 14 नेशनल क्रिकेट टूर्नामेंट खेला। उसके बाद अंडर-16 में भी नेशनल टूर्नामेंट में भाग लिया। कॉलेज में जाने के बाद अंडर- 19 व अंडर- 23 में खेलता रहा। हरियाणा क्रिकेट एसोसिएशन की तरफ से मयंक चौधरी ने सीनियर क्रिकेट टूर्नामेंट भी खेला। मयंक चौधरी श्रीश्री क्रिकेट एकेडमी पंचकूला की तरफ से खेलता रहा। हरियाणा की रणजी टीम में नहीं हुआ चयन मयंक चौधरी ने हरियाणा की रणजी टीम में चयनित होने के लिए काफी प्रयास किया। दो बार हरियाणा रणजी टीम के 2017 व 2018 के कैंप में भी शामिल हुआ, लेकिन टीम का हिस्सा नहीं बन सका। काफी प्रयासों के बाद भी जब रणजी टीम में शामिल नहीं हुआ तो 2021 में दुबई चला गया। यूएई टीम से खेले दो बार एशिया कप मयंक चौधरी की खेल प्रतिभा को देखते हुए 2021 में दुबई की क्रिकेट टीम में शामिल किया गया। वहां दुबई डेयर डेविल्स क्लब की तरफ से कई टूर्नामेंट खेले। बाद में मयंक को यूएई की टीम में शामिल किया गया और लगातार पिछले दो एशिया कप में टीम में हिस्सा रहते हुए मैचों में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।

Continue reading on the app

  Sports

बांग्लादेश की इज्जत के खातिर... यू टर्न लेकर शेखी बघार रहा है मोहसिन नकवी, कर रहा है डैमेज कंट्रोल

Mohsin Naqvi statement IND vs PAK Match: आईसीसी टी20 विश्व कप 2026 में भारत के खिलाफ मैच के बहिष्कार की वापसी के बाद पीसीबी चीफ शेखी बघार रहे हैं. मोहसिन नकवी ने कहा कि उन्होंने भारत के खिलाफ मैच का बहिष्कार सिर्फ और सिर्फ बांग्लादेश को सम्मान दिलाने के लिए किया था. Tue, 10 Feb 2026 23:31:38 +0530

  Videos
See all

Iran America War Update: 2 बजते ही अमेरिका ने ईरान पर दागी मिसाइलें? | Khamenei vs Trump | Top News #tmktech #vivo #v29pro
2026-02-10T20:30:20+00:00

Tej Pratap Yadav 5 Jaychand List: "इन सबको छोड़ेंगे नहीं", मंच से लिस्ट दिखाकर भड़के तेज प्रताप! #tmktech #vivo #v29pro
2026-02-10T20:01:00+00:00

Anatoliy Trubin on that Champions League goal, Mourinho's reaction and the Ukraine War | BBC News #tmktech #vivo #v29pro
2026-02-10T20:07:29+00:00

Trubin says Mourinho said nothing to him after that Champions League goal. #Football #BBCNews #tmktech #vivo #v29pro
2026-02-10T20:30:09+00:00
Editor Choice
See all
Photo Gallery
See all
World News
See all
Top publishers