रक्षा मंत्रालय द्वारा फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की मंजूरी इस सप्ताह मिलने की संभावना
नई दिल्ली, 10 फरवरी (आईएएनएस)। भारत का रक्षा मंत्रालय इस सप्ताह फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की एक बड़ी डील को मंजूरी दे सकता है। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, यह सौदा भारतीय वायुसेना के लिए किया जा रहा है, जिसकी कुल कीमत लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपए बताई जा रही है।
यह मंजूरी फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की भारत यात्रा से पहले दी जा सकती है। इसके बाद इस सौदे को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी से भी मंजूरी लेनी होगी।
इस प्रस्ताव के अनुसार, भारत फ्रांस की कंपनी डसॉल्ट एविएशन से 18 राफेल विमान सीधे खरीदेगा। बाकी 96 विमान भारत में ही बनाए जाएंगे। इनमें से कुछ विमान दो सीट वाले होंगे, जिनका उपयोग पायलटों को ट्रेनिंग देने के लिए किया जाएगा। इस डील में आधुनिक तकनीक भारत को देने और मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने की बात भी शामिल है।
भारतीय वायुसेना के के बेड़े में पहले से ही दो स्क्वाड्रनों में 36 राफेल विमान शामिल हैं, जिनमें से सी वेरिएंट की अंतिम डिलीवरी दिसंबर 2024 में हुई थी। इसके अलावा भारतीय नौसेना ने भी एम वेरिएंट के 26 राफेल विमानों का ऑर्डर भी दिया गया है, जिनकी कीमत करीब 63,000 करोड़ रुपए है।
नौसेना के ये राफेल विमान आईएनएस विक्रांत और आईएनएस विक्रमादित्य विमानवाहक पोत से उड़ान भरेंगे। इस सौदे में विमानों की मरम्मत, रखरखाव, जरूरी सामान और कर्मचारियों की ट्रेनिंग की व्यवस्था भी शामिल है।
राफेल विमानों का इस्तेमाल भारत ने पिछले साल मई में हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर में किया था, जिसमें पाकिस्तान के ठिकानों पर सटीक हमले किए गए थे।
राफेल विमानों का इस्तेमाल स्कैल्प (एससीएएलपी) मिसाइल को लॉन्च करने के लिए किया गया था, जो 250 किलोमीटर से ज्यादा दूर तक बहुत सटीक हमला कर सकती है। इसके अलावा यह मेटियोर हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल, हैमर हथियार, स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और आधुनिक रडार से भी लैस है।
पिछले साल जून में भारत और फ्रांस ने डसॉल्ट एविएशन और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड के बीच चार बड़े समझौतों की घोषणा की थी, जिससे भारत को राफेल विमानों की डिलीवरी तेजी से मिलने में मदद मिलेगी।
टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स हैदराबाद में एक आधुनिक फैक्ट्री लगाएगी, जहां राफेल विमान के अहम हिस्से बनाए जाएंगे, जिनमें विमान का पिछला हिस्सा, बीच का ढांचा और आगे का हिस्सा शामिल होगा।
इन विमानों के हिस्सों का उत्पादन साल 2028 से शुरू होने की उम्मीद है।
--आईएएनएस
डीबीपी/
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लोकसभा स्पीकर के खिलाफ पेश हुआ अविश्वास प्रस्ताव, 190 सांसदों में राहुल गांधी का नाम नहीं, TMC ने भी बनाई दूरी
संसद के भीतर टकराव एक नए स्तर पर पहुंच गया है. विपक्षी दलों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाते हुए उन्हें पद से हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस सौंप दिया है. इस कदम ने संसद की राजनीति में हलचल तेज कर दी है और सदन की निष्पक्षता को लेकर बहस छेड़ दी है.
120 सांसदों के हस्ताक्षर के साथ नोटिस सौंपा
कांग्रेस, डीएमके, समाजवादी पार्टी समेत कई विपक्षी दलों के करीब 120 सांसदों ने लोकसभा सेक्रेटरी जनरल को यह नोटिस सौंपा है. नोटिस में स्पीकर पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने सदन की कार्यवाही के दौरान विपक्ष के साथ पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया और कांग्रेस सांसदों पर झूठे आरोप लगाए. विपक्ष का कहना है कि यह संसदीय परंपराओं और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक नोटिस में कांग्रेस सांसदों में राहुल गांधी का नाम नहीं है. साथ ही टीएमसी ने भी अविश्वास प्रस्ताव से दूरी बना ली है.
सदन की कार्यवाही से अलग हुए ओम बिरला
नोटिस सौंपे जाने के बाद एक अहम घटनाक्रम में ओम बिरला ने खुद को लोकसभा की कार्यवाही के संचालन से अलग कर लिया. मंगलवार को वे सदन की कार्यवाही के दौरान आसन पर नहीं बैठे. इसे संसदीय इतिहास में एक असाधारण स्थिति के रूप में देखा जा रहा है, जिसने राजनीतिक हलकों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
धन्यवाद प्रस्ताव बना टकराव की वजह
बता दें कि विवाद की जड़ राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान की कार्यवाही बताई जा रही है. विपक्ष का आरोप है कि इस दौरान स्पीकर ने राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं को बोलने से रोका, जिससे विपक्ष को अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिला. विपक्षी दलों का कहना है कि यह लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है, जहां हर पक्ष को अपनी राय रखने का अधिकार होता है.
स्पीकर की टिप्पणी पर विपक्ष की नाराज़गी
नोटिस में कहा गया है कि सदन में स्पीकर की टिप्पणी से कांग्रेस सांसदों पर स्पष्ट रूप से झूठे और भ्रामक आरोप लगे, जिससे विपक्ष की छवि को नुकसान पहुंचा. विपक्ष का तर्क है कि स्पीकर का पद संवैधानिक रूप से निष्पक्ष होना चाहिए, लेकिन मौजूदा हालात में यह निष्पक्षता सवालों के घेरे में है.
आगे क्या होगा?
अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस सौंपे जाने के बाद अब गेंद संसद के प्रक्रिया तंत्र के पाले में है. प्रस्ताव को स्वीकार किया जाएगा या नहीं, इस पर आगे की कार्यवाही तय होगी. वहीं सत्ता पक्ष ने फिलहाल इस मुद्दे पर खुलकर प्रतिक्रिया नहीं दी है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह टकराव आने वाले दिनों में संसद की कार्यवाही और राजनीतिक माहौल दोनों को प्रभावित कर सकता है.
लोकसभा स्पीकर के खिलाफ लाया गया यह प्रस्ताव न सिर्फ एक संवैधानिक प्रक्रिया है, बल्कि यह संसद में सत्ता और विपक्ष के बीच बढ़ते अविश्वास का भी संकेत देता है.
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