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भरोसे एवं भारत की आवाज थे विरल पत्रकार मार्क टुली

भारत की समकालीन इतिहास-यात्रा में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो केवल घटनाओं का वृत्तांत नहीं लिखते, बल्कि समय की चेतना में घुल-मिलकर स्वयं इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं। सर विलियम मार्क टुली, जिन्हें दुनिया भर में स्नेह और सम्मान से ‘मार्क टुली’ कहा गया, ऐसे ही विरल पत्रकार थे। उनका निधन केवल एक वरिष्ठ पत्रकार का जाना नहीं है, बल्कि उस पत्रकारिता-दृष्टि का अवसान है, जिसमें सत्य सनसनी से ऊपर और संवेदना आंकड़ों से अधिक महत्त्वपूर्ण होती थी। बीबीसी रेडियो की वह गूंजती हुई पंक्ति-‘दिस इज मार्क टुली रिपोर्टिंग फ्रॉम दिल्ली’, दशकों तक भारतीय उपमहाद्वीप में भरोसे, प्रामाणिकता और संतुलन का पर्याय बनी रही। मार्क टुली एक विदेशी पत्रकार भर नहीं थे, वे भारत की आत्मा के स्थायी प्रवासी थे, जिनमें भारतीयता रची-बसी थी। उनका भारत से रिश्ता किसी वीजा, नियुक्ति या करियर-रणनीति का परिणाम नहीं था, बल्कि वह रक्त और मिट्टी का संबंध था। 24 अक्टूबर 1935 को कोलकाता के टॉलीगंज में जन्मे टुली ने ब्रिटिश राज के अंतिम दौर का भारत देखा, जिया और महसूस किया। एक समृद्ध ब्रिटिश परिवार में जन्म लेने के बावजूद दार्जिलिंग के बोर्डिंग स्कूलों और भारतीय जनजीवन की विविध छवियों ने उनके भीतर एक ऐसी आत्मीयता एवं संस्कार बो दिया, जो जीवन भर पुष्पित-पल्लवित होती रही। नौ वर्ष की आयु में जब वे इंग्लैंड गए, तब भी भारत उनके भीतर जीवित रहा-स्मृतियों में, संवेदनाओं में और दृष्टि में।

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में धर्मशास्त्र का अध्ययन करते समय उन्होंने पादरी बनने का विचार किया था। यह तथ्य अपने-आप में बहुत कुछ कहता है, क्योंकि सत्य की खोज, नैतिक विवेक और मानवीय करुणा उनके व्यक्तित्व की मूल धुरी थीं। किंतु नियति ने उन्हें चर्च की सीमित दीवारों से बाहर निकालकर एक ऐसे मंच पर खड़ा कर दिया, जहां वे पूरी मानवता से संवाद कर सकते थे। पत्रकारिता उनके लिए पेशा नहीं, बल्कि एक नैतिक दायित्व थी। जब वे बीबीसी के संवाददाता के रूप में भारत लौटे, तो उन्होंने इसे एक असाइनमेंट नहीं बल्कि अपने घर लौटने जैसा अनुभव किया। मार्क टुली की पत्रकारिता की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे भारत को पश्चिमी चश्मे से नहीं देखते थे। वे सत्ता के गलियारों से अधिक गांव की चौपाल, मंदिर-मस्जिद के आंगन, खेतों की मेड़ और आम आदमी की चिंता को महत्त्व देते थे। आपातकाल हो या इंदिरा गांधी की राजनीति, सिख विरोधी दंगे हों या बाबरी मस्जिद विध्वंस, पंजाब का उग्रवाद हो या कश्मीर की पीड़ा-मार्क टुली ने हर विषय को संतुलन, गहराई और मानवीय संवेदना के साथ दुनिया के सामने रखा। वे घटनाओं के पीछे छिपी सामाजिक और सांस्कृतिक परतों को समझने की कोशिश करते थे, इसीलिए उनकी रिपोर्टिंग तत्कालीन शोर-शराबे से ऊपर उठकर स्थायी संदर्भ बन गई।

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आज के आपाधापी और टीआरपी-केंद्रित इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दौर में, जहाँ खबर से ज्यादा शोर और तथ्य से ज्यादा त्वरित प्रतिक्रिया को महत्व दिया जाता है, मार्क टली की पत्रकारिता एक उजली कसौटी बनकर सामने आती है। टीवी स्टूडियो की तीखी बहसों, चीखती हेडलाइनों और सतही विश्लेषण के उलट, मार्क टली ने यह सिद्ध किया कि शांत, संयमित और तथ्यपरक संवाद भी उतना ही प्रभावशाली होता है बल्कि अधिक विश्वसनीय होता है। उनकी पत्रकारिता दिल्ली के सत्ता-केंद्र तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह भारत की आत्मा-गाँव, कस्बे, आम जन और उनकी पीड़ा से जुड़ी हुई थी। आज जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अक्सर सत्ता, बाज़ार और सनसनी के दबाव में अपनी विश्वसनीयता खोता दिख रहा है, तब मार्क टली की शैली यह सिखाती है कि पत्रकारिता का असली धर्म प्रश्न पूछना, सच को धैर्य से समझना और उसे बिना शोर के, पूरे संदर्भ के साथ प्रस्तुत करना है। उनका जीवन आज के टीवी मीडिया के लिए एक मौन लेकिन सशक्त संदेश है कि भरोसे की आवाज़ ऊँची नहीं, सच्ची होती है।

मार्क टुली की सबसे बड़ी देन यह थी कि उन्होंने भारत की विविधता को उसकी कमजोरी नहीं बल्कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। वे मानते थे कि भारत किसी एक विचार, एक भाषा या एक संस्कृति से नहीं बनता, बल्कि यहां की बहुलता ही इसकी आत्मा है। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई-ग्रामीण-शहरी, गरीब-अमीर, इन सबके बीच बहता हुआ संवाद ही भारत की असली पहचान है। जब दुनिया के कई हिस्से भारत को केवल गरीबी, अव्यवस्था या अराजकता के चश्मे से देखते थे, तब मार्क टुली ने भारत की सहिष्णुता, आध्यात्मिकता और जीवटता को रेखांकित किया। उन्होंने यह दिखाया कि यह देश विरोधाभासों के बावजूद नहीं, बल्कि उन्हीं के साथ जीना जानता है। मार्क टुली की आवाज रेडियो के माध्यम से करोड़ों लोगों के घरों तक पहुंचती थी। वह दौर ऐसा था, जब समाचार सुनने के लिए लोग घड़ी देखकर रेडियो ऑन करते थे। उनकी रिपोर्टिंग में नाटकीयता नहीं, बल्कि सजीवता-ठहराव था। वे कहते थे कि भारत को समझने के लिए अपनी घड़ी उतारकर रखनी पड़ती है। यह कथन केवल समय-संस्कृति की बात नहीं करता, बल्कि उस धैर्य और विनम्रता की ओर संकेत करता है, जिसके बिना भारत जैसे देश को समझा नहीं जा सकता। यही धैर्य उनकी पत्रकारिता में झलकता था।

एक विदेशी होकर भी उन्होंने भारतीयता पर गर्व करना सिखाया, वह भी उस समय, जब हम स्वयं अपनी जड़ों को लेकर संशय में थे। उनकी पुस्तकों और कार्यक्रमों में भारत केवल खबर नहीं, बल्कि एक जीवंत सभ्यता के रूप में उपस्थित रहता है। ‘नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया’ जैसी कृतियां भारत की निरंतर चलती कहानी को सामने लाती हैं, जहां कोई अंतिम विराम नहीं, केवल प्रवाह है। उन्होंने भारतीय लोकतंत्र की अव्यवस्थाओं की आलोचना भी की, लेकिन वह आलोचना स्नेह और चिंता से भरी होती थी, उपेक्षा या उपहास से नहीं। ब्रिटिश सरकार द्वारा नाइटहुड और भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित किया जाना उनके योगदान की औपचारिक स्वीकृति है, लेकिन उनकी असली विरासत वह विश्वास है, जो भारतीय जनता ने उन पर किया। लोग उनकी बात इसलिए मानते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि यह व्यक्ति भारत को समझता है, उसे चाहता है और उसके साथ ईमानदार है।

आज के दौर में, जब पत्रकारिता तेजी से बदल रही है, प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड में, नई तकनीक के दबाव में हांफ रही है, तब मार्क टुली की कमी और अधिक महसूस होती है। उनका जाना उस युग का अंत है, जहां शब्दों की गरिमा थी और तथ्य पवित्र माने जाते थे। वे हमें यह सिखाकर गए कि पत्रकारिता सूचना का व्यापार नहीं, बल्कि मानवता की सेवा है। भारत की मिट्टी में जन्मा, विदेशी धरती पर शिक्षित और अंततः भारत की ही गोद में समा जाने वाला यह व्यक्तित्व सदैव स्मृतियों में जीवित रहेगा। वे ऐसे विदेशी साक्षी थे, जिन्होंने भारत को केवल दुनिया की नजरों में ही नहीं, बल्कि भारतीयों की अपनी नजरों में भी नई गरिमा दी। मार्क टुली का जीवन इस बात का प्रमाण है कि सीमाएं नागरिकता तय कर सकती हैं, संवेदनाएं नहीं। उनकी आवाज भले ही अब रेडियो पर न गूंजे, लेकिन भारत की आत्मा में उनकी प्रतिध्वनि लंबे समय तक सुनाई देती रहेगी।

- ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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भारत में एक नए उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक का निर्माण हुआ है

हिंदू सनातन संस्कृति के संस्कारों में समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व के निर्वहन के लिए नागरिकों को जागरूक किए जाने का प्रयास लगातार किया जाता रहा है और पश्चिमी सभ्यता के आधार पर केवल अधिकार के भाव को बढ़ावा नहीं दिया जाता है। हिंदू वेदों एवं पुराणों के अनुसार प्रत्येक राजा का यह प्रथम कर्तव्य है कि वह अपने राज्य में निवास कर रहे नागरिकों की समस्याओं को दूर करने का भरसक प्रयास करे ताकि उसके राज्य में नागरिक सुख शांति से प्रसन्नता पूर्वक निवास कर सकें। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने “एकात्म मानववाद” के सिद्धांत को विकसित किया था। यह एक ऐसा सिद्धांत है जो व्यक्ति एवं समाज के बीच एक संतुलित सम्बंध स्थापित करने पर जोर देता है। एकात्म मानववाद का उद्देश्य प्रत्येक मानव को गरिमापूर्ण जीवन प्रदान करना है एवं अंत्योदय अर्थात समाज के निचले स्तर पर स्थित व्यक्ति के जीवन में सुधार करना है। विशेष रूप से भारत में आज के परिप्रेक्ष्य में इस सिद्धांत का आश्य यह भी है कि सरकारी योजनाओं का लाभ समाज में अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचाने का लक्ष्य प्रत्येक राजनीतिक दल का होना चाहिए। परंतु, आज की पश्चिमी सभ्यता, जो पूंजीवाद पर आधारित नीतियों पर चलती हुई दिखाई देती है, के अनुसरण में मानव केवल अपने हितों का ध्यान रखता हुआ दिखाई देता हैं एवं अपना केवल भौतिक (आर्थिक) विकास करने हेतु प्रयासरत रहता है और उसमें अपने परिवार एवं समाज के प्रति जिम्मेदारी के भाव का पूर्णत: अभाव दिखाई देता है। अतः विश्व के समस्त देशों द्वारा अपने नागरिकों एवं समाज के प्रति उत्तरदायित्व के निर्वहन को आंकने के उद्देश्य से भारत में उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक का निर्माण किया गया है। नई दिल्ली में दिनांक 20 जनवरी 2026 को उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक (Responsible Nations Index) का लोकार्पण किया गया। यह पहल देशों का मूल्यांकन केवल शक्ति अथवा समृद्धि से नहीं, बल्कि नागरिकों, पर्यावरण एवं वैश्विक समुदाय के प्रति उनके उत्तरदायित्व के निर्वहन के आधार पर करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। 21वीं सदी के लिए यह विमर्श समयोचित और आवश्यक है।       

उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक को पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने डॉक्टर अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र, नई दिल्ली में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में राष्ट्र को समर्पित किया। वैश्विक स्तर पर इस प्रकार का सूचकांक पहली बार बनाया गया है और इसे बनाने में भारत के ही विभिन्न संस्थानों ने अपना योगदान दिया है। इस सूचकांक के माध्यम से यह आंकने का प्रयास किया गया है कि विभिन्न देशों द्वारा अपने नागरिकों के हित में अपने अधिकारों का उत्तरदायित्वपूर्ण प्रयोग किस प्रकार किया जा रहा है (आंतरिक उत्तरदायित्व का निर्वहन), वैश्विक समुदाय के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन किस प्रकार किया जा रहा है (बाह्य उत्तरदायित्व का निर्वहन) एवं पर्यावरण को बचाने के लिए अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन किस प्रकार किया जा रहा है (पर्यावरण उत्तरदायित्व का निर्वहन)। उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक 7 आयाम, 15 दृष्टिकोण एवं 58 संकेतकों को शामिल करते हुए निर्मित किया गया है। विश्व के 154 देशों का इस सूचकांक के आधार पर मूल्यांकन किया गया है। सिंगापुर को इस सूचकांक की रैकिंग में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है, इसके बाद स्विजरलैंड द्वितीय स्थान पर, डेनमार्क तृतीय स्थान पर, साइप्रस चौथे स्थान पर रहे हैं। भारत को 16वां स्थान प्राप्त हुआ है। विश्व के शक्तिशाली देशों का स्थान उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक की सूची में बहुत निचले स्तर पर पाया गया है। अमेरिका 66वें स्थान पर रहा है, जो लिबिया से भी एक पायदान नीचे है। जापान 38वें स्थान पर रहा है। पाकिस्तान 90वें स्थान पर, चीन 68वें स्थान पर एवं अफगानिस्तान 145वें स्थान पर रहा है। 

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उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक का निर्माण मुख्य रूप से भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM), मुंबई एवं जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली ने मिलकर किया है। इस सूचकांक के निर्माण में 3 वर्षों तक लगातार कार्य किया गया है एवं उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक के निर्माण में विश्व बुद्धिजीवी प्रतिष्ठान का भी सहयोग लिया गया है। उक्त सूचकांक के निर्माण के लिए कुल 154 देशों से विभिन्न मापदंडों पर आधारित वर्ष 2023 तक के सम्बंधित आंकडें इक्ट्ठे किये गए है एवं इन आंकड़ों एवं जानकारी का विश्लेषण करने के उपरांत इस सूचकांक का निर्माण किया गया है। यह आंकड़े एवं जानकारी विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र संघ, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व स्वास्थ्य संगठन एवं खाद्य एवं कृषि संस्थान जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से लिए गए है।     

आज पूरे विश्व में विभिन्न देशों की आर्थिक प्रगति को सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर से आंका जाता है, यह मॉडल पूंजीवाद पर आधारित है एवं इस मॉडल के अनुसार देश में कृषि, उद्योग एवं सेवा क्षेत्रों में हुए उत्पादन को जोड़कर सकल घरेलू उत्पाद का आंकलन किया जाता है। इस मॉडल में कई प्रकार की कमियां पाई जा रही है। किसी भी देश में पनप रही आर्थिक असमानता, गरीबी रेखा से नीचे जीवन जी रहे नागरिकों की आर्थिक प्रगति, मुद्रा स्फीति, बेरोजगारी एवं वित्तीय समावेशन जैसे विषयों पर उक्त मॉडल के अंतर्गत विचार ही नहीं किया जाता है। अमेरिका सहित विश्व के कई देशों में अब यह मांग की जा रही है कि आर्थिक प्रगति को आंकने के लिए सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि सम्बंधी मॉडल के स्थान पर एक नए मॉडल का निर्माण किया जाना चाहिए। 

भारतीय सनातन संस्कृति के अनुसार, किसी भी राष्ट्र में आर्थिक प्रगति तभी सफल मानी जाएगी जब पंक्ति में अंतिम पायदान पर खड़े नागरिक को भी समाज हित में बनाई जा रही आर्थिक नीतियों का लाभ पहुंचे। वर्तमान में, सकल घरेलू उत्पाद के अनुसार आर्थिक प्रगति आंकने के मॉडल में इस प्रकार की व्यवस्था नहीं है इसीलिए कई देशों में गरीब और अधिक गरीब हो रहे है तथा अमीर और अधिक अमीर हो रहे है। नए विकसित किए गए उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक में यह आंकने का प्रयास किया गया है कि शासन प्रणाली किस प्रकार से नैतिक धारणाओं को ध्यान में रखकर अपनी आर्थिक नीतियों का निर्माण कर रही है, राष्ट्र में समावेशी विकास हो रहा है अथवा नहीं एवं राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने दायित्वों के निर्वहन के संदर्भ में सरकार द्वारा किस प्रकार की नीतियां बनाई जा रही हैं। साथ ही, धर्म आधारित सदाचार सम्बंधी भारतीय सभ्यता एवं वैश्विक सुख शांति स्थापित करने के सम्बंध में किस प्रकार देश की नीतियां निर्धारित की जा रही हैं, इस विषय को भी उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक के निर्माण में स्थान दिया गया है।

पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्थाएं आर्थिक प्रगति तो तेज गति से करती दिखाई देती हैं और कई पश्चिमी देश आज विकसित देशों की श्रेणी में शामिल भी हो गए हैं। परंतु, इन देशों में मानवतावादी दृष्टिकोण का पूर्णत: अभाव है। पूंजीवाद पर आधारित अर्थव्यवस्थाओं में केवल “मैं” के भाव को स्थान प्राप्त है। “मैं” किस प्रकार आर्थिक प्रगति करुं, इस “मैं” के भाव में परिवार एवं समाज कहीं पीछे छूट जाता है। इससे पश्चिमी देशों में सामाजिक तानाबाना पूर्णत: छिन्न भिन्न हो रहा है। युवा वर्ग अपने माना पिता की देखभाल करने के लिए तैयार ही नहीं हैं। आज अमेरिका में लगभग 6 लाख बुजुर्ग खुले आसमान के नीचे अपना जीवन यापन करने को मजबूर हैं क्योंकि उनके बच्चे उन्हें अकेला छोड़कर केवल अपना आर्थिक विकास करने में संलग्न हैं। इसी प्रकार की कई सामाजिक कुरीतियों ने पश्चिमी देशों में अपने पैर पसार लिए हैं। पश्चिमी सभ्यता के ठीक विपरीत, भारतीय संस्कृति में “मैं” के स्थान पर “हम” के भाव को प्रभावशाली स्थान प्राप्त है। भारतीय सनातन संस्कृति पर आधारित संस्कारों को ध्यान में रखकर ही विभिन्न देशों द्वारा अपने नागरिकों के प्रति उनके उत्तरदायित्व को आंकने का प्रयास उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक के माध्यम से किया गया है।

संक्षेप में एक बार पुनः यह बात दोहराई जा सकती है कि उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक विविध देशों का आंकलन पारम्परिक शक्ति अथवा सकल घरेलू उत्पाद केंद्रित मानकों के बजाय उत्तरदायी शासन के आधार पर करता है। यह सूचकांक तीन मूल आयामों पर आधारित है - (1) आंतरिक उत्तरदायित्व अर्थात गरिमा, न्याय और नागरिक कल्याण का आंकलन करता है। (2) पर्यावरणीय उत्तरदायित्व अर्थात प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और जलवायु कार्यवाही का मूल्यांकन करता है। (3) बाह्य अत्तरदायित्व अर्थात शांति, बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक स्थिरता में किसी देश के योगदान को मापता है। यह सूचकांक वैश्विक आंकलन को आर्थिक एवं सैन्य शक्ति के पारम्परिक मानकों से पृथक कर नैतिक शासन, सामाजिक कल्याण, पर्यावरणीय संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व पर केंद्रित करता है। यह सूचकांक मूल्य आधारित और मानव केंद्रित ढांचे को बढ़ावा देता है, जो नैतिक नेतृत्व, सतत विकास और वैश्विक शासन में सुधार सम्बंधी भारत की दृष्टि के अनुरूप है। इस प्रकार भारत ने वैश्विक स्तर पर संभवत: प्रथम सूचकांक जारी किया है। यदि वैश्विक स्तर पर कई देश इस सूचकांक के आधार पर अपने देश के नागरिकों के प्रति अपने उत्तरदायित्व के निर्वहन के आंकलन पर ध्यान देने का प्रयास करेंगे तो निश्चित ही उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक पूरे विश्व में एक क्रांतिकारी सूचकांक के रूप में स्थापित होगा।   

- प्रहलाद सबनानी 
सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक 
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर - 474 009

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  Sports

T20 World Cup में India-Pakistan मैच पर खत्म हुआ विवाद, PCB बोला- Bangladesh के लिए उठाया था कदम।

पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) के अध्यक्ष मोहसिन नकवी ने मंगलवार को कहा कि भारत के खिलाफ टी20 विश्व कप मैच के बहिष्कार का फैसला केवल बांग्लादेश को ‘सम्मान’ दिलाने के उद्देश्य से लिया गया था। बांग्लादेश को सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए भारत में खेलने से इनकार करने पर टूर्नामेंट से बाहर कर दिया गया था। इसके बाद पाकिस्तान सरकार ने घोषणा की थी कि उसकी राष्ट्रीय टीम 15 फरवरी को कोलंबो में होने वाले टी20 विश्व कप के ग्रुप मैच में भारत के खिलाफ मैदान में नहीं उतरेगी।

 पीसीबी, बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) के बीच हुई बातचीत के बाद पाकिस्तान सरकार ने सोमवार देर रात बहिष्कार का फैसला वापस ले लिया। नकवी ने कहा, “हमारी बातचीत का मुद्दा सिर्फ बांग्लादेश था। हमारा एकमात्र मकसद उन्हें सम्मान दिलाना और उनके साथ हुई नाइंसाफी को सामने लाना था। बांग्लादेश की जो भी मांगें थीं, उन्हें मान लिया गया। बस यही हमारा उद्देश्य था।’’ उन्होंने कहा, “इस बैठक में हमारा कोई निजी हित नहीं था। हमारा काम पूरी तरह बांग्लादेश से जुड़ा था और सरकार ने भी उसी आधार पर फैसला लिया। जब उनकी मांगें मान ली गईं और यह स्वीकार कर लिया गया कि उनके साथ अन्याय हुआ है, तभी हमने मैच खेलने का निर्णय लिया।”

नकवी ने भारत के खिलाफ प्रस्तावित बहिष्कार को लेकर बने गतिरोध को सुलझाने के लिए रविवार को बांग्लादेश के अपने समकक्ष अमीनुल इस्लाम और आईसीसी के उपाध्यक्ष इमरान ख्वाजा से मुलाकात की थी। पाकिस्तान सरकार ने सोमवार को जारी बयान में कहा, “बहुपक्षीय बैठकों में मिले सकारात्मक नतीजों और मित्र देशों के अनुरोध को देखते हुए पाकिस्तान सरकार निर्देश देती है कि पाकिस्तान की राष्ट्रीय क्रिकेट टीम 15 फरवरी 2026 को आईसीसी पुरुष टी20 विश्व कप के निर्धारित मैच में हिस्सा लेगी।

Wed, 11 Feb 2026 10:08:40 +0530

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