गोल्ड ईटीएफ में सितंबर में निवेश 71 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 4,451 करोड़ रुपए हुआ
नई दिल्ली, 12 अक्टूबर (आईएएनएस)। एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (एम्फी) की ओर से सोमवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) में शुद्ध निवेश अगस्त के 2,597 करोड़ रुपए से महीने-दर-महीने आधार पर 71.4 प्रतिशत बढ़कर सितंबर में 4,451 करोड़ रुपए हो गया है। यह दिखाता है कि सोने की ओर लोगों का रुझान बढ़ रहा है।
गोल्ड ईटीएफ में मजबूत निवेश के बावजूद, व्यापक म्यूचुअल फंड उद्योग में महीने के दौरान 1.33 लाख करोड़ रुपए का शुद्ध निकासी दर्ज की गई। इससे पहले अगस्त में 41,353 करोड़ रुपए का शुद्ध निवेश दर्ज किया गया था।
इस गिरावट की मुख्य वजह फिक्स्ड इनकम म्यूचुअल फंड योजनाओं से बड़ी मात्रा में निकासी रही।
डेट म्यूचुअल फंड्स से सबसे अधिक निकासी हुई। सितंबर में इनसे शुद्ध निकासी तेजी से बढ़कर 1.83 लाख करोड़ रुपए हो गई, जबकि पिछले महीने यह 8,127 करोड़ रुपए थी।
भारी निकासी के कारण म्यूचुअल फंड उद्योग की कुल एसेट अंडर मैनेजमेंट (एयूएम) अगस्त के 87.08 लाख करोड़ रुपए से घटकर सितंबर में 82.64 लाख करोड़ रुपए हो गया है।
इसके विपरीत, इक्विटी म्यूचुअल फंड्स की ओर निवेशकों का रुझान बना रहा। सितंबर में इक्विटी म्यूचुअल फंड्स में शुद्ध निवेश 30.6 प्रतिशत बढ़कर 38,307 करोड़ रुपए हो गया, जबकि अगस्त में यह 29,328 करोड़ रुपए था।
इक्विटी श्रेणियों में स्मॉल-कैप फंड निवेशकों की सबसे पसंदीदा श्रेणी बने रहे। इनमें सितंबर में 9,039 करोड़ रुपए का निवेश आया, जबकि पिछले महीने यह 7,973 करोड़ रुपए था। मिड-कैप फंड में भी निवेशकों की अच्छी भागीदारी रही। इनमें अगस्त के 6,989 करोड़ रुपए की तुलना में सितंबर में 7,835 करोड़ रुपए का निवेश आया।
फ्लेक्सी-कैप फंड में शुद्ध निवेश एक महीने पहले के 5,059 करोड़ रुपए से बढ़कर 6,702 करोड़ रुपए हो गया। वहीं, सेक्टोरल और थीमैटिक फंड में निवेश बढ़कर 3,640 करोड़ रुपए हो गया, जबकि अगस्त में यह 1,713 करोड़ रुपए था।
लार्ज-कैप फंड एक महीने की शुद्ध निकासी के बाद फिर से सकारात्मक दायरे में लौट आए। सितंबर में इनमें 859 करोड़ रुपए का शुद्ध निवेश आया, जबकि अगस्त में 1,147 करोड़ रुपए की शुद्ध निकासी हुई थी।
इस बीच, मल्टी-एसेट एलोकेशन फंड में 3,667 करोड़ रुपए का निवेश आया, जो पिछले महीने के 3,671 करोड़ रुपए के लगभग बराबर रहा।
सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) के माध्यम से निवेशकों की भागीदारी मजबूत बनी रही। सितंबर में मासिक एसआईपी योगदान रिकॉर्ड 32,490 करोड़ रुपए पर पहुंच गया, जो अगस्त में दर्ज 32,297 करोड़ रुपए से थोड़ा अधिक है।
--आईएएनएस
एबीएस
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Explainer: क्या अपनी आवाज को तिजोरी में बंद किया जा सकता है, इटली पीएम मेलोनी ने क्यों उठाया ये कदम, इससे क्या होगा फायदा?
Explainer: जरा सोचिए कि आपके नाम से किसी को फोन किया जाए, आपकी आवाज में पैसे मांगे जाएं या आपके बोलने के अंदाज में ऐसा राजनीतिक बयान जारी कर दिया जाए, जो आपने कभी दिया ही नहीं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में यह महज कल्पना नहीं है, बल्कि एक वास्तविक चुनौती बन चुकी है. इसी खतरे से निपटने के लिए इटली की प्रधानमंत्री जॉर्यिया मेलोनी ने अपनी आवाज का ट्रेडमार्क कराने के लिए आवेदन किया है. उनका यह कदम आवाज की पहचान, डिजिटल अधिकारों और डीपफेक के खिलाफ कानूनी सुरक्षा पर नई बहस छेड़ रहा है.
चार सेकंड की आवाज के लिए क्यों किया आवेदन?
मेलोनी ने 5 अक्टूबर 2026 को यूरोपीय संघ के इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी ऑफिस (EUIPO) में अपनी आवाज
को ट्रेडमार्क के रूप में पंजीकृत कराने के लिए आवेदन किया. इसमें चार सेकंड की एक ऑडियो क्लिप शामिल है. इस रिकॉर्डिंग में वह इतालवी भाषा में दो बार कहती हैं, ‘Io sono Giorgia Meloni’, जिसका अर्थ है ‘मैं जॉर्जिया मेलोनी हूं.’
यह वाक्य मेलोनी के लिए केवल अपना परिचय देने वाला कथन नहीं है. वर्ष 2029 में एक राजनीतिक रैली के दौरान दिए गए उनके भाषण से यह वाक्यांश लोकप्रिय हुआ था. वर्ष 2021 में उनकी आत्मकथा का शीर्षक भी ‘Io sono Giorgia’ रखा गया था.
हालांकि, इस आवेदन को अभी मंजूरी नहीं मिली है. यूरोपीय संघ का संबंधित कार्यालय इसकी जांच कर रहा है. इसलिए फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि मेलोनी को अपनी आवाज पर ट्रेडमार्क अधिकार मिल चुका है.
आखिर आवाज की नकल करना इतना आसान कैसे हो गया?
डीपफेक ऐसी तकनीक है, जिसमें आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस की मदद से किसी व्यक्ति का चेहरा, आवाज या वीडियो इस तरह तैयार किया जा सकता है कि वह असली जैसा दिखाई या सुनाई दे. इसके लिए जरूरी नहीं कि व्यक्ति खुद कैमरे के सामने आए या अपनी बात रिकॉर्ड कराए.
AI आधारित वॉइस क्लोनिंग सिस्टम किसी व्यक्ति की उपलब्ध रिकॉर्डिंग से उसके बोलने के लहेज, उच्चारण, आवाज के उतार-चढ़ाव और अन्य विशेषताओं के नमूने सीख सकते हैं. इसके बाद वे नए वाक्य भी उसी जैसी आवाज में तैयार कर सकते हैं.
उदाहरण के लिए, किसी नेता के पुराने भाषणों की रिकॉर्डिंग लेकर उसकी आवाज जैसी सुनाई देने वाली नकली ऑडियो तैयार की जा सकती है. इसी तरह किसी कारोबारी की आवाज की नकल करके कर्मचारी से पैसे ट्रांसफर करने को कहा जा सकता है.
परिवार के किसी सदस्य की आवाज में आपात स्थिति का संदेश देकर भी लोगों को धोखा देने की कोशिश की जा सकती है. ऐसी परिस्थितियों में केवल आवाज सुनकर किसी व्यक्ति की पहचान की पुष्टि करना जोखिम भरा हो सकता है.
ट्रेडमार्क क्या होता है और आवाज का ट्रेडमार्क कैसे काम करेगा?
आमतौर पर ट्रेडमार्क का इस्तेमाल किसी कंपनी के नाम, लोगो, प्रतीक या अन्य विशिष्ट पहचान को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है. इसका उद्देश्य उपभोक्ताओं को यह पहचानने में मदद करना है कि कोई उत्पाद या सेवा किस स्त्रोत से जुड़ी है.
कुछ परिस्थितियों में विशिष्ट ध्वनि को भी साउंड ट्रेडमार्क के रूप में पंजीकृत कराया जा सकता है. इसके लिए संबंधित कानूनी व्यवस्था के तहत यह देखना पड़ता है कि ध्वनि कितनी विशिष्ट है और आवेदन किन वस्तुओं या सेवाओं के लिए किया गया है.
मेलोनी के मामले में आवेदन का संबंध डाउनलोड किए जा सकने वाले मल्टीमीडिया कंटेंट, सांस्कृतिक गतिविधियों और राजनीतिक कार्यक्रमों के आयोजन जैसी श्रेणियों से बताया गया है.
इसका मतलब यह नहीं है कि वह दुनिया में अपनी आवाज से मिलती-जुलती हर ध्वनि पर स्वतः अधिकार हासिल कर लेंगी. अधिकारों का दायरा पंजीकरण की मंजूरी और उसकी निर्धारित शर्तों पर निर्भर करेगा.
क्या ट्रेडमार्क मिलने से डीपफेक पूरी तरह बंद हो जाएंगे?
इस सवाल का जवाब है नहीं. आवाज का ट्रेडमार्क डीपफेक बनाने वाली तकनीक को बंद नहीं कर सकता और न ही इंटरनेट पर हर नकली ऑडियो को अपने आप हटवा सकता है.
इसका संभावित फायदा कानूनी कार्रवाई के लिए अतिरिक्त आधार मिलना है. यदि कोई व्यक्ति पंजीकृत ध्वनि या उससे जुड़े अधिकारों का गैरकानूनी इस्तेमाल करता है तो परिस्थितियों के अनुसार उसके खिलाफ कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है. डिजिटल प्लेटफॉर्म पर शिकायत करते समय भी संबंधित अधिकार उपयोगी हो सकते हैं.
लेकिन हर मामले में यह देखना होगा कि इस्तेमाल किस मकसद से हुआ, वह पंजीकृत अधिकारों के दायरे में आता है या नहीं और संबंधित कानून क्या कहते हैं. व्यंग्य, पैरोडी, समाचार रिपोर्टिंग या अन्य वैध इस्तेमाल पर नियम अलग हो सकते हैं. इसलिए ट्रेडमार्क को आवाज की नकल पर पूर्ण प्रतिबंध समझना गलत होगा.
मेलोनी को पहले भी डीपफेक का सामना करना पड़ा
मेलोनी के लिए यह कानूनी पहल बिल्कुल नई नहीं है. वर्ष 2024 में उन्होंने एक व्यक्ति के खिलाफ सिविल मुकदमा दायर किया था. उस व्यक्ति पर आरोप था कि उसने मेलोनी के चेहरे का इस्तेमाल करके अश्लील डीपफेक तस्वीरें तैयार कीं और उन्हें इंटरनेट पर साझा किया. रिपोर्टों के मुताबिक, यह मामला अदालत में लंबित है.
इस घटना ने एक बड़ा सवाल उठाया था कि किसी व्यक्ति की पहचान और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के लिए डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल होने पर कानूनी सुरक्षा कितनी प्रभावी है. मेलोनी ने डीपफेक सामग्री को लेकर लोगों से ऑनलाइन सामग्री साझा करने से पहले उसकी सत्यता जांचने की अपील भी की है.
क्या ऐसा करने वाली पहली राजनेता होंगी मेलोनी?
मेलोनी की यह पहल इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि आवाज को ट्रेडमार्क कराने की कोशिश आम तौर पर संगीत, मनोरंजन और व्यावसायिक पहचान के संदर्भ में अधिक दिखाई देती रही है. उनकी कोशिश राजनीतिक नेतृत्व और सार्वजनिक जीवन में आवाज की कानूनी सुरक्षा को चर्चा के केंद्र में लाती है.
हालांकि, उन्हें बिना किसी व्यापक कानूनी जांच के दुनिया की पहली ऐसी व्यक्ति या पहली राजनेता कहना उचित नहीं होगा. अलग-अलग देशों में आवाज और व्यक्तित्व से जुड़े अधिकारों की व्यवस्थाएं अलग हैं. मेलोनी की खासियत यह है कि वह यूरोपीय संघ में अपनी आवाज के लिए औपचारिक ट्रेडमार्क आवेदन लेकर सामने आई हैं.
चुनावों के दौर में क्यों बढ़ जाती है चिंता?
राजनीति में किसी नेता का भाषण, बयान या सार्वजनिक संदेश मतदाताओं की राय को प्रभावित कर सकता है. ऐसे में AI से तैयार नकली भाषण चुनावी माहौल में भ्रम पैदा कर सकते हैं. कोई फर्जी ऑडियो नेता के नाम से जारी किया जाए, तो उसे असली समझकर लोग आगे साझा कर सकते हैं. बाद में खंडन आने के बावजूद शुरुआती नुकसान पूरी तरह ठीक करना मुश्किल हो सकता है.
यही चुनौती केवल नेताओं तक सीमित नहीं है. पत्रकारों, कारोबारियों, शिक्षकों और आम नागरिकों की आवाज की नकल भी धोखाधड़ी या बदनामी के लिए इस्तेमाल की जा सकती है. इसलिए तकनीकी पहचान प्रणालियों, डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही, प्रभावी शिकायत व्यवस्था और लोगों की जागरूकता की जरूरत बनी रहती है.
आम लोगों को क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
यदि किसी परिचित या अधिकारी की आवाज में अचानक पैसे मांगने वाला फोन आए, तो केवल आवाज पर भरोसा करके लेनदेन न करें. कॉल काटकर उस व्यक्ति के पहले से उपलब्ध नंबर पर संपर्क करें और किसी दूसरे माध्यम से पुष्टि करें.
संदिग्ध ऑडियो या वीडियो को बिना जांचे साझा करने से बचें. किसी सामग्री की सत्यता पर संदेह हो तो विश्वसनीय समाचार स्रोतों या संबंधित व्यक्ति के आधिकारिक अकाउंट से पुष्टि करें.
मेलोनी की आवाज को तिजोरी में बंद करने जैसी यह पहल वास्तव में डिजिटल पहचान को कानूनी सुरक्षा देने की कोशिश है. ट्रेडमार्क मंजूर होने पर उन्हें कुछ खास इस्तेमालों के खिलाफ अतिरिक्त कानूनी आधार मिल सकता है, लेकिन इससे AI की ओर से आवाज की नकल करना तकनीकी रूप से असंभव नहीं हो जाएगा. आने वाले समय में असली चुनौती यही होगी कि कानून, तकनीक और जागरूकता मिलकर लोगों की आवाज और पहचान के दुरुपयोग को कितना रोक पाते हैं.
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