CEC Gyanesh Kumar पर सतर्कता जांच बदले की कार्रवाई नहीं, VD Satheesan ने किया स्पष्ट
केरलम के मुख्यमंत्री वी डी सतीशन ने इन आरोपों को खारिज कर दिया है कि राज्य सरकार ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार से जुड़े सड़क परियोजना मामले में सतर्कता जांच का आदेश राजनीतिक बदले की भावना से दिया है। मामला करीब दो दशक पहले का है, जब कुमार राज्य के लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के सचिव थे। सतीशन का यह बयान ऐसे समय आया है, जब मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में कथित अनियमितताओं को लेकर कुमार को हटाने की मांग करते हुए कांग्रेस दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में प्रदर्शन कर रही है।
सतीशन ने ‘पीटीआई वीडियो’ को हाल में दिए एक साक्षात्कार में कहा, यह राजनीतिक मामला नहीं है। इसके पीछे कोई राजनीतिक बदले की भावना नहीं है। चुनाव संबंधी कथित अनियमितताओं को लेकर विपक्ष की ओर से आलोचना का सामना कर रहे सीईसी के खिलाफ जांच को बदले की कार्रवाई बताए जाने वाले दावों को खारिज करते हुए सतीशन ने कहा कि कानून अपना काम करेगा।
जब उनसे पूछा गया कि क्या यह कदम बदले की भावना से की गई कार्रवाई के तहत उठाया गया है, तो उन्होंने कहा कि सरकार ने एक शिकायत के आधार पर कार्रवाई की है। उन्होंने कहा, जब यह व्यक्ति पीडब्ल्यूडी सचिव था, तब इसके कामकाज के खिलाफ गृह मंत्री को कोई शिकायत मिली थी। इसके बाद सामान्य प्रक्रिया के तहत जांच का आदेश दिया गया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि जांच रिपोर्ट मिलने के बाद सरकार आगे की कार्रवाई पर फैसला करेगी। उन्होंने कहा, सतर्कता विभाग से रिपोर्ट मिलने के बाद हम कार्रवाई करेंगे। पिछले सप्ताह राज्य के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने केएसटीपी सड़क परियोजना में कथित भ्रष्टाचार और इससे जुड़े एक मलेशियाई इंजीनियर की 2006 में हुई मौत के मामले में जांच का आदेश दिया था।
उस समय केरलम कैडर के आईएएस अधिकारी ज्ञानेश कुमार राज्य के लोक निर्माण विभाग के सचिव थे। प्रदेश कांग्रेस के नेता मलयिनकीझु वेणुगोपाल ने मौजूदा सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जांच की मांग करते हुए शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद जांच का आदेश दिया गया।
यह जांच ऐसे समय हो रही है, जब देश की चुनाव प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर विपक्षी दल निर्वाचन आयोग के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं।
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स्टारलिंक के मालिक एलन मस्क का दुस्साहस बढ़ता ही चला जा रहा है। भारतीय उद्योगपति और रिलायंस इंडस्ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी पर सोशल मीडिया के जरिये निशाना साधने के बाद अब जियो के प्रस्तावित आईपीओ से ठीक पहले एलन मस्क ने तीखे बयान दिये हैं। जिन्हें भारतीय बाजार में अपनी एंट्री के लिए दबाव बनाने और रिलायंस के खिलाफ माहौल तैयार करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। गौरतलब है कि एलन मस्क ने आरोप लगाया है कि भारत में कुछ प्रभावशाली कारोबारी हित उनकी कंपनी स्टारलिंक का रास्ता रोक रहे हैं। साथ ही, उन्होंने भारत में सस्ती सैटेलाइट इंटरनेट सेवा देने का वादा किया है। हालांकि, सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि जियो और भारती समर्थित वनवेब भी जरूरी मंजूरियों के लिए लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मस्क के आरोप तथ्यों पर आधारित हैं या जियो के आईपीओ से पहले प्रतिस्पर्धा को लेकर एकतरफा नैरेटिव बनाने की कोशिश की जा रही है?
उल्लेखनीय है कि मस्क ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर दावा किया कि भारत में कुछ प्रभावशाली कारोबारी हित स्टारलिंक की एंट्री रोककर अपने एकाधिकार को बचाना चाहते हैं। उन्होंने अंबानी पर भी निशाना साधते हुए प्रतिस्पर्धा की अनुमति देने की बात कही। साथ ही वादा किया कि भारत में स्टारलिंक की सेवा सस्ती रखी जाएगी, क्योंकि महंगी सेवा होने पर ग्राहक उसे नहीं अपनाएंगे। मस्क का तर्क है कि प्रतिस्पर्धा से भारतीय उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प मिलेंगे, भले ही इससे अंबानी के मुनाफे पर दबाव पड़े।
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लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत में स्टारलिंक की व्यावसायिक शुरुआत में देरी के लिए वास्तव में जियो या अंबानी जिम्मेदार हैं? दूरसंचार विभाग (DoT) के रिकॉर्ड पर आधारित रिपोर्ट इस दावे की दूसरी तस्वीर पेश करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस और भारती समर्थित वनवेब ने स्टारलिंक से पहले अपनी सुरक्षा और तकनीकी अनुपालन संबंधी प्रक्रियाएं पूरी कर ली थीं। जियो ने 20 मार्च 2025 को अपना सुरक्षा एवं तकनीकी प्रदर्शन पूरा किया, जबकि वनवेब ने 2025 की दूसरी छमाही में यह प्रक्रिया पूरी की। स्टारलिंक का प्रदर्शन 2026 की शुरुआत में हुआ। ऐसे में यह कहना कि केवल भारतीय प्रतिस्पर्धियों के प्रभाव के कारण स्टारलिंक को रोका जा रहा है, यह सरासर गलत है।
देखा जाये तो लाइसेंस और मंजूरी की समयरेखा भी इस बहस को समझने में मदद करती है। वनवेब को अगस्त 2021 में दूरसंचार विभाग से आशय-पत्र मिला और अप्रैल 2022 में उसे जीएमपीसीएस लाइसेंस मिला। जियो ने नवंबर 2021 में लाइसेंस के लिए आवेदन किया और अक्टूबर 2022 में प्राधिकरण हासिल किया। इसके विपरीत, स्टारलिंक को जीएमपीसीएस लाइसेंस 6 जून 2025 को मिला। यानी भारतीय कंपनियां इस प्रक्रिया में पहले से मौजूद थीं, फिर भी उनकी सेवाएं व्यावसायिक रूप से शुरू नहीं हो सकी हैं। तीनों कंपनियों को अंतिम सुरक्षा मंजूरी और स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रतीक्षा है। यदि जियो और वनवेब को बाजार में स्टारलिंक को रोकने के लिए विशेष सुविधा मिल रही होती, तो सवाल उठाए जा सकते थे।
इसके अलावा, सैटेलाइट इंटरनेट का मामला सामान्य दूरसंचार सेवा से अलग है। इसके नेटवर्क की पहुंच सीमाओं से परे हो सकती है, इसलिए नेटवर्क की निगरानी, वैध अवरोधन और भारतीय कानूनों के अनुपालन जैसे विषय महत्वपूर्ण हैं। सुरक्षा संबंधी शर्तें पूरी होने के बाद ही स्पेक्ट्रम आवंटन और व्यावसायिक परिचालन का रास्ता साफ हो सकता है। हम आपको यह भी बता दें कि केंद्र सरकार ने मस्क के भेदभाव के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि नियामकीय ढांचा निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण है। दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी स्पष्ट किया है कि कंपनियां जरूरी सुरक्षा और नियामकीय शर्तें पूरी करने के बाद ही सेवाएं शुरू कर सकती हैं।
देखा जाये तो भारत के लिए इस मामले में प्राथमिकता किसी कारोबारी घराने के हितों की रक्षा करना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा का वातावरण तैयार करना होना चाहिए। स्टारलिंक को भी अन्य कंपनियों की तरह समान नियमों का पालन करना होगा। केवल वैश्विक प्रतिष्ठा, तकनीकी क्षमता या बाजार में निवेश की इच्छा के आधार पर सुरक्षा संबंधी शर्तों में छूट नहीं दी जा सकती।
अब सवाल उठता है कि जियो के आईपीओ पर कितना असर पड़ेगा? हम आपको बता दें कि जियो प्लेटफॉर्म्स 106 अरब डॉलर के मूल्यांकन को लक्ष्य बनाकर अपना आईपीओ लाने की तैयारी में है। ऐसे समय में मस्क का अंबानी पर सार्वजनिक हमला और सस्ती स्टारलिंक सेवा का वादा बाजार में चर्चा पैदा कर रहा है। लेकिन निवेशकों के लिए एलन मस्क के बयान की बजाय जियो कंपनी की वित्तीय स्थिति, विकास की संभावनाएं, प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति और नियामकीय जोखिम जैसे कई कारक महत्वपूर्ण होंगे। इसी तरह, स्टारलिंक की भारतीय बाजार में वास्तविक चुनौती उसकी कीमत, कवरेज, सेवा की गुणवत्ता और आवश्यक मंजूरियां मिलने पर निर्भर करेगी।
बहरहाल, भारत में कारोबार करने की इच्छा रखने वाली किसी भी विदेशी कंपनी का स्वागत प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता हितों के आधार पर होना चाहिए, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा की शर्तों के साथ। मस्क की बयानबाजी से मंजूरी की प्रक्रिया तेज हो या न हो, उसका फैसला नियमों और तथ्यों के आधार पर ही होना चाहिए। जियो और वनवेब के इंतजार का रिकॉर्ड यह भी बताता है कि मामला केवल स्टारलिंक बनाम अंबानी का नहीं, बल्कि भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के लिए सुरक्षा, नियमन और समान अवसर सुनिश्चित करने का है।
-नीरज कुमार दुबे
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