CEC Gyanesh Kumar के खिलाफ Supreme Court में याचिका दायर करेगा विपक्षी गठबंधन: Rahul Gandhi
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने सोमवार को कहा कि वह और विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन के नेता मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर करेंगे और ‘‘संविधान बचाने की लड़ाई’’ जारी रखेंगे। उन्होंने दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा और आरोप लगाया कि लोगों को राजधानी पहुंचने से रोका जा रहा है और बसों तथा ट्रेनों से उतारा जा रहा है। गांधी ने विपक्षी नेताओं के उच्चतम न्यायालय तक प्रस्तावित मार्च से पहले संवाददाताओं से कहा कि दिल्ली को ‘‘पूरी तरह से किले में तब्दील’’ कर दिया गया है और हजारों पुलिसकर्मियों तथा सुरक्षा बलों को तैनात किया गया है।
उन्होंने कहा, ‘‘आज हम और ‘इंडिया’ गठबंधन के नेता उच्चतम न्यायालय जाएंगे और याचिका दायर करेंगे। जो प्रतिरोध चल रहा है, वह एक दिन की बात नहीं है। हम लगातार यह कर रहे हैं।’’ कांग्रेस नेता ने कहा कि यह नहीं समझा जाना चाहिए कि विरोध पांच दिन पहले शुरू हुआ है, बल्कि ‘‘यह प्रतिरोध वर्षों से चल रहा है।’’ गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार लोगों को दिल्ली पहुंचने से रोक रही है।
उन्होंने कहा, ‘‘लोगों को दिल्ली पहुंचने से रोका जा रहा है। बस और ट्रेनों से लोगों को उतारा जा रहा है। दिल्ली को पूरी तरह से किले में तब्दील कर दिया गया है।’’ उन्होंने कहा कि विपक्ष की रणनीति अलग है और वह बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों की तैनाती के बावजूद अपना संदेश देश तक पहुंचाना चाहता है।
गांधी ने कहा, ‘‘हमारी रणनीति दूसरी है। हम जानते हैं कि 20-30 हजार पुलिसकर्मी सड़क पर खड़े होंगे। हम देश को यह दिखाना चाहते हैं कि मोदी सरकार ज्ञानेश कुमार का बचाव कर रही है।’’ उन्होंने दावा किया कि केंद्र सरकार जितना ज्ञानेश कुमार का बचाव करेगी, उतनी ही बेनकाब होगी।
कांग्रेस नेता ने यह आरोप भी लगाया कि गृह मंत्रालय, दिल्ली पुलिस, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के भीतर यह सवाल पूछा जा रहा है कि ‘‘आरएसएस के गुंडों को सड़क पर खुला क्यों घूमने दिया जा रहा है और देशभक्त युवाओं को मारने-पीटने के लिए कहा जा रहा है।’’ गांधी ने दावा किया कि सरकार की रणनीति से विपक्ष को ‘‘बहुत फायदा’’ हो रहा है। उन्होंने कहा, ‘‘मैं खुशी से बताना चाहता हूं कि 50 प्रतिशत पुलिस वाले हमसे कह रहे हैं कि आप लोग जो कर रहे हैं वह ठीक है, यह करते जाइए।’’ कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि युवाओं के साथ मारपीट की जा रही है और उनका सवाल सिर्फ इतना है कि ‘‘ज्ञानेश कुमार इस्तीफा क्यों नहीं दे रहे हैं।’’ उन्होंने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘हम जानते हैं आपकी क्या हालत है। आप रात को सो नहीं पा रहे हैं।
हम आपको छोड़ेंगे नहीं। आप नहीं बचेंगे। लाखों लोग आपके आचरण के बारे में सवाल कर रहे हैं और रुकने वाले नहीं हैं।’’ गांधी ने आरोप लगाया कि अब पुलिसकर्मी भी यह सवाल पूछ रहे हैं कि ‘‘हम ज्ञानेश कुमार जैसे चोर और देश-विरोधियों को क्यों बचा रहे हैं।’’ उन्होंने कहा कि विरोध प्रदर्शन कितने दिन, कितने महीने या कितने साल चले, विपक्ष पीछे हटने वाला नहीं है।
गांधी ने कहा, ‘‘कितने भी दिन लगें, जितने महीने लगें, जितने साल लगें, हम पीछे हटने वाले नहीं हैं। जो झूठ को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, वह थकने वाले हैं।’’ कांग्रेस नेता ने कहा, ‘‘मैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बताना चाहता हूं कि आपकी सरकार के 200 अधिकारी हमारे संपर्क में हैं और वे हमें जानकारी दे रहे हैं।’’ उन्होंने कहा कि सरकार के भीतर से उन्हें बड़ी संख्या में सूचनाएं मिल रही हैं। उन्होंने दावा किया कि ‘‘सच्चाई हमारे साथ है।’’ कांग्रेस नेता ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, सीईसी ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधते हुए कहा कि ‘‘विभिन्न अपराधियों ने हिंदुस्तान की आत्मा पर आक्रमण किया है’’ और उन्हें न्याय के कटघरे में लाया जाएगा तथा जवाबदेह ठहराया जाएगा।
उन्होंने कहा, ‘‘यह संविधान को बचाने की लड़ाई है। किसी व्यक्ति का कोई महत्व नहीं है। इसमें सिर्फ संविधान और भारत का महत्व है।’’ उन्होंने विपक्ष के आंदोलन का उल्लेख करते हुए इसमें सभी लोगों से शामिल होने की अपील की और कहा कि यह शिव की बारात है, जिसमें कोई भी शामिल हो सकता है।
Dental Healthcare में Denmark का मॉडल कारगर, समय रहते बीमारी रोकने पर देता है जोर
(विक्रम निरंजन, यूनिवर्सिटी ऑफ लिमरिक) लिमरिक (आयरलैंड), 12 अक्टूबर (द कन्वरसेशन) किसी देश की स्वास्थ्य व्यवस्था का आकलन करने के लिए दांतों की सेहत भले ही पहला पैमाना न लगे, लेकिन इससे स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिल सकती हैं। दांतों में सड़न, मसूड़ों की बीमारी और दांतों का गिरना दुनिया भर में आम दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल हैं। ये समस्याएं अक्सर यह भी बताती हैं कि कोई स्वास्थ्य प्रणाली बीमारियों की रोकथाम को कितनी प्राथमिकता देती है। एक दंत चिकित्सक और शोधकर्ता के रूप में मेरा अनुभव है कि मुंह से जुड़ी बीमारियां शायद ही कभी केवल एक खराब दांत तक सीमित होती हैं। इनके पीछे अक्सर पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था की भूमिका होती है। समय रहते बीमारी की रोकथाम कैसे की जाती है, समस्याओं का पता कब चलता है और लोगों को बिना देरी इलाज मिल पाता है या नहीं, ये सभी महत्वपूर्ण सवाल हैं। इसी लिहाज से इंग्लैंड और डेनमार्क की तुलना दिलचस्प है। दोनों समृद्ध यूरोपीय देश हैं और कल्याणकारी व्यवस्था की मजबूत परंपरा रखते हैं, लेकिन उनकी दंत चिकित्सा प्रणालियां अलग-अलग तरीके से काम करती हैं।
----- बच्चों के दांतों की सेहत ----- डेनमार्क ने ऐसी व्यवस्था विकसित की है, जिसे जनस्वास्थ्य के शोधकर्ता अक्सर एक आदर्श उदाहरण के रूप में देखते हैं। वहां बच्चों को स्थानीय निकायों की ओर से मुफ्त दंत चिकित्सा सेवाएं दी जाती हैं। इसमें नियमित जांच, फ्लोराइड का इस्तेमाल और स्कूलों के माध्यम से मौखिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता शामिल है। दांतों से जुड़ी बीमारियां कम उम्र में ही शुरू हो सकती हैं। बचपन में इनकी रोकथाम करने से किशोरावस्था और उसके बाद भी दांतों को स्वस्थ रखने में मदद मिलती है। डेनमार्क में समस्याओं के गंभीर होने का इंतजार करने के बजाय उनका शुरुआती चरण में पता लगाने और उपचार करने पर जोर रहता है। इसके विपरीत, इंग्लैंड की स्थिति अलग है। नवीनतम राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार, वहां पांच साल की उम्र के 27 प्रतिशत बच्चों के दांतों में सड़न है। सबसे अधिक वंचित क्षेत्रों के बच्चों में यह समस्या अपेक्षाकृत कम वंचित क्षेत्रों के बच्चों की तुलना में कहीं अधिक आम है। इंग्लैंड में छोटे बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराने के प्रमुख कारणों में दांतों की सड़न भी शामिल है। दोनों देशों के बीच यह एक बड़ा अंतर है। डेनमार्क में समस्या को शुरुआत में ही रोकने की कोशिश की जाती है, जबकि इंग्लैंड में अब भी कई बच्चों को दंत चिकित्सक के पास जाना पड़ता है और कुछ मामलों में अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है, क्योंकि समस्या का पता देर से चलता है।
----- वयस्कों के दांतों की स्थिति ----- वयस्कों में भी दोनों देशों के बीच अंतर दिखाई देता है। डेनमार्क में नियमित रूप से दंत चिकित्सक के पास जाना आम है, खासकर बुजुर्गों में। लंबे समय से किए जा रहे सर्वेक्षणों से पता चलता है कि कई लोग दांतों की जांच को अपने समग्र स्वास्थ्य की देखभाल का नियमित हिस्सा मानते हैं। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि वर्षों तक दांतों की जांच नहीं कराने से मसूड़ों की बीमारी, दांतों का गिरना और अधिक जटिल उपचार की जरूरत जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इंग्लैंड में दंत चिकित्सा सेवाओं तक पहुंच अधिक असमान है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) के आंकड़ों के अनुसार, लगभग 65 प्रतिशत वयस्कों ने दो साल की अवधि में एनएचएस के दंत चिकित्सक से उपचार लिया। इसका मतलब यह नहीं है कि बाकी 35 प्रतिशत वयस्कों को कोई इलाज नहीं मिला। इनमें से कुछ लोग निजी दंत चिकित्सकों से उपचार कराते हैं। हालांकि, यह आंकड़ा बताता है कि कई लोगों के लिए एनएचएस के तहत दंत चिकित्सा सेवा हासिल करना कितना मुश्किल हो गया है। डेनमार्क में व्यवस्था नियमित जांच को प्रोत्साहित करती है, जबकि इंग्लैंड में कई लोगों के लिए दंत चिकित्सक से मिलने का समय हासिल करना ही अनिश्चित हो गया है। इससे लोगों में निराशा बढ़ती है और उन लोगों की मुंख संबंधी सेहत धीरे-धीरे खराब होने का जोखिम रहता है, जो निजी इलाज का खर्च उठाने या बार-बार अपॉइंटमेंट लेने की कोशिश करने में सक्षम नहीं हैं। दांतों की बीमारियां केवल जैविक कारणों से नहीं होतीं, बल्कि सामाजिक परिस्थितियां भी इन्हें प्रभावित करती हैं। इसलिए आर्थिक और व्यावहारिक बाधाओं का सामना करने वाले लोगों में इन बीमारियों का खतरा अधिक होता है।
----- स्वास्थ्य व्यवस्था किस चीज को प्राथमिकता देती है ----- इंग्लैंड और डेनमार्क की तुलना से एक महत्वपूर्ण सबक मिलता है कि दंत चिकित्सा व्यवस्था उसी दिशा में काम करती है, जिसके लिए उसे तैयार किया गया है। डेनमार्क में बच्चों को सरकारी वित्तपोषण से दंत चिकित्सा सेवाएं मिलती हैं, जबकि वयस्कों के लिए सब्सिडी वाली व्यवस्था है। इससे नियमित जांच, इलाज में निरंतरता और बीमारी की रोकथाम को प्रोत्साहन मिलता है। यह व्यवस्था पूरी तरह दोषरहित नहीं है, लेकिन इसका जोर लोगों को लंबे समय तक स्वस्थ रखने पर है। इंग्लैंड में एनएचएस के तहत दंत चिकित्सा सेवाएं सभी के लिए उपलब्ध कराने का लक्ष्य है। हालांकि, इसकी भुगतान व्यवस्था को लेकर अक्सर यह आलोचना होती रही है कि इसमें बीमारी की रोकथाम की तुलना में इलाज का पूरा चरण समाप्त करने को अधिक प्रोत्साहन मिलता है। महामारी के बाद सेवाओं तक पहुंच बेहतर बनाने और व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए ‘एनएचएस डेंटल रिकवरी प्लान’ शुरू किया गया था। इसके बावजूद दंत चिकित्सा सेवाओं पर दबाव, असमान पहुंच और नए एनएचएस मरीजों को स्वीकार करने में कई क्लीनिकों की असमर्थता की समस्या बनी हुई है। दोनों देशों की व्यवस्थाओं में प्रोत्साहन के तरीके अलग हैं और इससे यह तय होता है कि मरीजों को किस तरह की सेवाएं मिलती हैं। स्वास्थ्य सेवाओं में इन प्रोत्साहनों की अहम भूमिका होती है।
----- फ्लोराइड और बीमारी की रोकथाम ----- फ्लोराइड इसका एक सरल उदाहरण है कि अलग-अलग स्वास्थ्य प्रणालियां दांतों की सड़न रोकने के लिए किस तरह काम करती हैं। इंग्लैंड में लगभग 10 प्रतिशत लोगों को फ्लोराइड युक्त पानी मिलता है। साक्ष्य बताते हैं कि पानी में फ्लोराइड मिलाने से बच्चों के दांतों में सड़न कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसकी उपलब्धता सभी क्षेत्रों में समान नहीं है। डेनमार्क में पानी में फ्लोराइड नहीं मिलाया जाता। वहां फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट, दंत चिकित्सकों द्वारा फ्लोराइड का इस्तेमाल और नियमित निवारक देखभाल पर जोर दिया जाता है। उदाहरण के लिए, बच्चों के दांतों पर फ्लोराइड वार्निश की परत लगाई जाती है, जिससे दांतों को सड़न से बचाने में मदद मिलती है। इससे मिलने वाला महत्वपूर्ण सबक यह है कि फ्लोराइड तब अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकता है, जब उसे ऐसी व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाए, जो लोगों तक समय रहते और लगातार पहुंचती हो। दांतों की बीमारियों का आर्थिक बोझ भी काफी बड़ा है। इसलिए यह मायने रखता है कि स्वास्थ्य सेवाओं पर पैसा कब और किस उद्देश्य से खर्च किया जाता है। खर्च का एक बड़ा हिस्सा बीमारी की रोकथाम पर समय रहते किया जाना चाहिए। डेनमार्क बच्चों पर विशेष ध्यान देते हुए शुरुआती चरण में निवेश करता है। ब्रिटेन भी स्वास्थ्य सेवाओं पर बड़ी रकम खर्च करता है, लेकिन वहां बीमारी बढ़ने के बाद इलाज, दांत निकालने और समय पर रोकथाम नहीं होने से पैदा होने वाली समस्याओं पर अधिक खर्च करना पड़ता है। दांतों की सेहत से यह समझने में मदद मिलती है कि कोई स्वास्थ्य व्यवस्था बीमारी की रोकथाम को कितना महत्व देती है और क्या लोग इलाज तक पहुंच को लेकर भरोसा कर सकते हैं। इसीलिए इंग्लैंड और डेनमार्क की तुलना महत्वपूर्ण है। दोनों देशों में बीमारी की रोकथाम के तरीके अलग हैं। डेनमार्क जहां समस्याओं का शुरुआती चरण में पता लगाने और उनका उपचार करने पर अधिक जोर देता है, वहीं इंग्लैंड में अक्सर तब कार्रवाई करनी पड़ती है, जब बीमारी गंभीर रूप ले चुकी होती है।
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