CEC Gyanesh Kumar: क्या विधानसभा में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ महाभियोग लाया जा सकता है? जानें केरल के प्रस्ताव के मायने
CEC Gyanesh Kumar Removal Explained: मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश खुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है. विशेष गहन पुनरीक्षण(SIR) के तहत मतदाता सूचियों में हुए बदलावों को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है. इसी बीच केरल विधानसभा में 12 अक्टूबर को ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पेश किया जा रहा है.
मुख्यमंत्री वीडी सतीशन इस प्रस्ताव को सदन में रखेंगे और राज्य के मुख्य विपक्षी गठबंधन एलडीएफ ने भी इसका समर्थन करने का फैसला किया है. ऐसे में प्रस्ताव के पारित होने की संभावना जताई जा रही है.
लेकिन इस घटनाक्रम से एक बड़ा संवैधानिक सवाल खड़ा होता है. क्या राज्य विधानसभा मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटा सकती है? क्या इस प्रस्ताव को महाभियोग कहा जा सकता है? और यदि विधानसभा इसे पारित कर देती है, तो क्या ज्ञानेश कुमार की कुर्शी पर कोई असर पड़ेगा? इन सवालों के जवाब संविधान में तय प्रक्रिया से समझे जा सकते हैं.
क्या है केरल विधानसभा का पूरा मामला?
केरल विधानसभा का दूसरा सत्र 12 अक्टूबर से शुरू हो गया है. इसी दिन मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन सदन में नियम 118 के तहत मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पेश करने वाले हैं. इस तरह केरल देश की पहली विधानसभा बनने जा रही है, जहां किसी मौजूदा मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पेश किया जाएगा.
यह प्रस्ताव केवल सीईसी को हटाने की मांग तक सीमित नहीं है. इसमें विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के दौरान मतदाता सूची के हटाए गए पात्र मतदाताओं के नाम और उनके मतदान के अधिकार बहाल करने की मांग भी शामिल है. इसके अलावा, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली चयन समिति की संरचना बदलने का सुझाव दिया गया है. प्रस्ताव में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के प्रधान न्यायाधीश को चयन समिति में शामिल करने की मांग की गई है.
केरल विधानसभा में किसके पास कितनी ताकत?
केरल विधानसभा में कुल 140 सदस्य हैं. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे के पास 102 विधायक हैं, जबकि माकपा के नेतृत्व वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चे के 35 सदस्य हैं. बीजेपी के 3 विधायक हैं.
सत्तारूढ़ यूडीएफ के पास बहुमत है और एलडीएफ ने भी प्रस्ताव का समर्थन करने का फैसला किया है. इसलिए सदन में प्रस्ताव पारित होने की संभावना मजबूत मानी जा रही है.
केरल विधानसभा इससे पहले भी एसआईआर के मुद्दे पर प्रस्ताव पारित कर चुकी है. सितंबर 2025 में तत्कालीन एलडीएफ सरकार ने देशभर में एसआईआर लागू करने के निर्वाचन आयोग के फैसले के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया था, जिसे सदन ने सर्वसम्मति से पारित किया था.
क्या राज्य विधानसभा सीईसी को हटा सकती है?
इस सवाल का सीधा जवाब है-नहीं. किसी राज्य की विधानसभा को मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सीधे पद से हटाने का अधिकार नहीं हैं. विधानसभा प्रस्ताव के माध्यम से अपनी आपत्ति दर्ज करा सकती है.
केंद्र सरकार से कार्रवाई की मांग कर सकती है और निर्वाचन आयोग के कामकाज को लेकर राजनीतिक संदेश दे सकती है, लेकिन ऐसा प्रस्ताव सीईसी को पद से हटाने का आदेश नहीं बन जाता है.
मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324(5) में निर्धारित है. इसके मुताबिक, सीईसी को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन आधारों पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को पद से हटाया जाता है.
इसका मकसद निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता सुरक्षित रखना और किसी सरकार के लिए राजनीतिक असहमति के कारण सीईसी को हटाना आसान नहीं होने देना है.
सीईसी को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है?
मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया संसद से शुरू होती है. इसके लिए लोकसभा या राज्यसभा में निर्धारित प्रक्रिया के तहत प्रस्ताव लाया जा सकता है. न्यायाधीशों को हटाने से संबंधित प्रक्रिया के मुताबिक, लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में कम से कम 50 सदस्यों को हस्ताक्षर प्रस्ताव के समर्थन में जरूरी होते हैं.
इसके बाद संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी, यानी लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति, प्रस्ताव स्वीकार करने या अस्वीकार करने पर फैसला करते हैं.
प्रस्ताव स्वीकार होने की स्थिति में आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की जाती है. इसमें सुप्रीम कोर्ट का एक न्यायाधीश, किसी हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता शामिल होते हैं.
यदि जांच समिति आरोपों को साबित मानती है, तो संसद में प्रस्ताव पर आगे विचार किया जा सकता है. इसे लोकसभा और राज्यसभा, दोनों में विशेष बहुमत से पारित करना जरूरी होता है.
इसके लिए प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो -तिहाई का समर्थन आवश्यक है. दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी कर सकते हैं.
इस पूरी प्रक्रिया में राज्य विधानसभा की भूमिका सीईसी को हटाने वाले संवैधानिक प्रस्ताव के विकल्प के रूप में नहीं है.
क्या केरल का प्रस्ताव महाभियोग कहलाएगा?
आम बोलचाल में किसी संवैधानिक पदाधिकारी को हटाने की मांग को कई बार महाभियोग कहा जाता है, लेकिन कानूनी दृष्टि से केरल विधानसभा में पेश किया जाने वाला प्रस्ताव औपचारिक महाभियोग प्रक्रिया नहीं है. यह राज्य विधानसभा का प्रस्ताव है, जिसके जरिए सरकार और विधायक निर्वाचन आयोग के कामकाज पर अपनी आपत्ति दर्ज कराते हैं.
सीईसी को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया संसद में निर्धारित नियमों के अनुसार ही आगे बढ़ सकती है. इसलिए केरल विधानसभा में प्रस्ताव पारित होने से न तो ज्ञानेश कुमार स्वतः पद से हटेंगे और न ही संसद में हटाने की प्रक्रिया अपने आप शुरू हो जाएगी.
फिर इस प्रस्ताव के राजनीतिक मायने क्या हैं?
कानूनी रूप से सीधे कार्रवाई का अधिकार न होने के बावजूद केरल विधानसभा के प्रस्ताव का राजनीतिक महत्व है. यदि इसे पारित किया जाता है, तो यह संदेश जाएगा कि राज्य के सत्ता पक्ष और विपक्ष के बड़े हिस्से को निर्वाचन आयोग के कामकाज पर गंभीर आपत्ति है.
SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को लेकर विपक्ष की चिंता मतदान के अधिकार और चुनावी पारदर्शिता से जुड़ी है. विपक्ष का आरोप है कि पात्र मतदाताओं के नाम हटने से उनके अधिकार प्रभावित हो सकते हैं. वहीं, मतदाता सूची के पुनरीक्षण का मकसद सूची को सही बनाना बताया जाता है.
किसी विशेष मामले में नाम गलत तरीके से हटाए गे हैं या नहीं, इसका निर्धारण संबंधित तथ्यों और निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए.
केरल का प्रस्ताव इस विवाद को राष्ट्रीय स्तर पर और प्रमुखता दे सकता है. साथ ही, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव की मांग भी चुनावी संस्थाओं की स्वतंत्रता और जवाबदेही पर बहस को आगे बढ़ा सकती है.
प्रस्ताव का असर कितना होगा?
केरल विधानसभआ में ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग वाला प्रस्ताव एक महत्वपूर्ण राजनीतिक कदम है, लेकिन इसका प्रभाव सीधे उनकी नियुक्ति या पद पर नहीं पड़ेगा. राज्य विधानसभा न तो मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटा सकती है और न ही संसद की संवैधानिक प्रक्रिया की जगह ले सकती है.
इस प्रस्ताव का वास्तविक महत्व राजनीतिक संदेश, निर्वाचन आयोग पर उठाए गए सवालों और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों पर बहस में है. सीईसी को हटाने के लिए संविधान में निर्धारित संसदीय प्रक्रिया का पालन करना ही जरूरी होगा.
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