ट्रम्प ने टाटा-विप्रो को ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से सस्पेंड किया:8 आईटी कंपनियों के खिलाफ एक्शन, अमेरिका में काम कर रहे भारतीयों पर सीधा असर
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रशासन ने गुरुवार को 8 बड़ी आईटी कंपनियों को ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से सस्पेंड कर दिया है। इनमें भारत की चार कंपनियां टाटा, इंफोसिस, विप्रो और HCL हैं। इनके अलावा माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी, कॉग्निजेंट और कैपजेमिनी पर भी यह रोक लगाई गई है। इस फैसले के बाद ये कंपनियां अब अपने कर्मचारियों के लिए परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन PERM का आवेदन नहीं कर सकेंगी। इसी प्रक्रिया के जरिए कंपनियां H-1B वीजा पर काम कर रहे विदेशी कर्मचारियों को अमेरिका में पक्के तौर पर बसाने के लिए अर्जी लगाती हैं। अमेरिकी सरकार का कहना है कि वे स्थानीय अमेरिकियों की नौकरियां छीनकर विदेशी कर्मचारियों को नहीं दे सकते। इस फैसले से इन कंपनियों के जरिए अमेरिका में ग्रीन कार्ड पाने का इंतजार कर रहे हजारों भारतीय कर्मचारियों की ग्रीन कार्ड प्रक्रिया अटक सकती है। इस पूरे मामले के हर पहलू को समझने के लिए पढ़ें यह QA रिपोर्ट: सवाल 1- इन कंपनियों के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई? जवाब- अमेरिकी श्रम विभाग ने इन कंपनियों को PERM यानी परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रक्रिया से सस्पेंड किया है। अब इन कंपनियों के नए आवेदन स्वीकार नहीं किए जाएंगे। जो आवेदन पहले से चल रहे हैं, उनकी प्रक्रिया भी रोक दी गई है। सवाल 2- PERM क्या होता है? जवाब- प्रोग्राम इलेक्ट्रॉनिक रिव्यू मैनेजमेंट एक तरह का सरकारी अप्रूवल है। ये किसी भी अमेरिकी कंपनी को किसी विदेशी कर्मचारी को हमेशा के लिए नौकरी पर रखने यानी ग्रीन कार्ड से पहले अमेरिका के श्रम विभाग से लेना पड़ता है। कंपनी को सरकार को यह भरोसा दिलाना होता है कि: सवाल 3- इस रोक से भारतीय आईटी कर्मचारियों पर क्या असर पड़ेगा? जवाब- जिन कर्मचारियों का ग्रीन कार्ड का काम अभी PERM स्तर पर शुरू नहीं हुआ है, उनकी प्रक्रिया वहीं थम जाएगी। इसका मतलब है कि कर्मचारियों को ग्रीन कार्ड की लाइन में अपनी जगह नहीं मिलेगी, जिससे उनका अमेरिका में पक्के तौर पर बसने का इंतजार लंबा हो जाएगा। सवाल 4- जिनके पास H-1B वीजा है और PERM प्रक्रिया शुरू नहीं हुई थी उनका क्या होगा? जवाब: इन कर्मचारियों को तुरंत अमेरिका से नहीं निकाला जाएगा। उनका H-1B वीजा तब तक वैध रहेगा जब तक कि उसकी समय-सीमाखत्म नहीं हो जाती। ऐसे लोगों को या तो अपनी कंपनी बदलनी होगी या H-1B वीजा की 6 साल की अवधि खत्म होने पर अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है। वहीं जिनके पास पहले से ग्रीन कार्ड है उनपर इस फैसले का कोई असर नहीं होगा। सवाल 5- भारतीयों के लिए अमेरिका में ग्रीन कार्ड का इंतजार कितना लंबा है? जवाब- अमेरिका में ग्रीन कार्ड मिलना पहले से ही बहुत मुश्किल और लंबा काम है। सवाल 6- H-1B वीजा, PERM और गीन कार्ड में क्या अंतर है? जवाब: H-1B वीजा अमेरिका में अस्थायी तौर पर जाकर काम करने का वीजा है, जिसकी एक तय समय-सीमा होती है। वहीं PERM अमेरिका में हमेशा के लिए बसने की प्रक्रिया का पहला कदम है। इसी कदम के बाद ग्रीन कार्ड मिलता है। सवाल 7- अमेरिका ने यह कार्रवाई क्यों की? जवाब- अमेरिकी श्रम मंत्री कीथ सोंडरलिंग ने आरोप लगाया कि कुछ कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को नौकरी देने के लिए इमिग्रेशन नियमों का गलत इस्तेमाल कर रही हैं। सोंडरलिंग का दावा है कि इससे अमेरिकी कर्मचारियों की बड़ी संख्या में नौकरियां प्रभावित हुईं। हालांकि, कंपनियों के खिलाफ लगाए गए आरोप अभी अंतिम रूप से साबित नहीं हुए हैं। सवाल 8- जेडी वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट पर क्या आरोप लगाया? जवाब- अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि माइक्रोसॉफ्ट ने पिछले साल करीब 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से हटाया, जबकि कंपनी को करीब 6,300 H-1B वीजा और 3,000 ग्रीन कार्ड मिले। वेंस का आरोप है कि कुछ कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों की जगह विदेशी कर्मचारियों को रखने के लिए इमिग्रेशन नियमों का इस्तेमाल कर रही हैं। सवाल 9- क्या सभी भारतीय आईटी कर्मचारियों पर असर पड़ेगा? जवाब- नहीं। इसका असर खास तौर पर उन भारतीय कर्मचारियों पर पड़ेगा जिनका ग्रीन कार्ड प्रोसेस इन 8 कंपनियों के जरिए चल रहा है या जो इसके लिए आवेदन करने वाले हैं। सिर्फ H-1B वीजा पर काम कर रहे कर्मचारियों का वीजा इस फैसले से अपने आप रद्द नहीं होगा। सवाल 10- कितने भारतीय प्रभावित होंगे? जवाब- अमेरिकी सरकार ने अभी यह नहीं बताया है कि कितने भारतीय कर्मचारी प्रभावित होंगे। यह भी साफ नहीं है कि रोक कितने समय तक रहेगी। हालांकि, टाटा, इंफोसिस, विप्रो और एचसीएल जैसी बड़ी भारतीय कंपनियों के शामिल होने से बड़ी संख्या में भारतीय कर्मचारियों की ग्रीन कार्ड योजनाओं पर असर पड़ने की आशंका है। सवाल 11- अब आगे क्या होगा? जवाब- फिलहाल इन कंपनियों के नए PERM आवेदन स्वीकार नहीं किए जाएंगे और पुराने लंबित आवेदनों की प्रक्रिया भी रुकी रहेगी। अब इन कंपनियों के कर्मचारियों का ग्रीन कार्ड प्रोसेस कब शुरू होगा, यह अमेरिकी सरकार के अगले फैसले पर निर्भर करेगा।
2026 का साहित्य नोबेल कनाडाई लेखिका ऐन कार्सन को:ग्रीक-रोमन साहित्य को आधुनिक दुनिया से जोड़ा, चर्चित किताब 'द ब्यूटी ऑफ द हसबैंड'
कनाडा की लेखिका और कवयित्री ऐन कार्सन को 2026 का साहित्य नोबेल पुरस्कार दिया गया है। नोबेल समिति ने उन्हें ऐसी रचनाओं के लिए सम्मानित किया है, जिनमें उन्होंने पुराने यूनानी-रोमन साहित्य को आज की जिंदगी, प्यार, रिश्तों और दुख से जोड़ा। नोबेल समिति ने कहा कि कार्सन की खासियत यह है कि वह पुरानी कहानियों को सिर्फ दोबारा नहीं लिखतीं, बल्कि उनमें अपनी कल्पना और आज की जिंदगी की भावनाएं जोड़ देती हैं। उनकी रचनाओं में कविता, कहानी और निबंध की सीमाएं भी कई बार खत्म हो जाती हैं। यही वजह है कि उनका लेखन बाकी लेखकों से काफी अलग नजर आता है। कार्सन का जन्म 1950 में कनाडा के टोरंटो में हुआ था। उन्होंने प्राचीन यूनानी और रोमन साहित्य की पढ़ाई की। 1981 में उन्होंने इसी विषय पर अपनी डॉक्टरेट की थीसिस प्रकाशित की। एक राक्षस की कहानी को प्यार और हिंसा की कहानी बना दिया कार्सन की चर्चित किताबों में ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ रेड: ए नॉवेल इन वर्स’ भी शामिल है। 1998 में प्रकाशित यह किताब हजारों साल पुरानी यूनानी कथा पर आधारित है। इसमें गेरियोन नाम का एक पंखों वाला लाल राक्षस है। कार्सन ने इस पुराने मिथक को बिल्कुल नए तरीके से लिखा। उनकी कहानी में गेरियोन सिर्फ एक राक्षस नहीं, बल्कि अपनी मां से प्यार करने वाला संवेदनशील युवक है। इस तरह उन्होंने एक पुरानी यूनानी कहानी को प्यार, हिंसा और रिश्तों जैसी मानवीय भावनाओं से जोड़ दिया। कार्सन की 2 और चर्चित पुस्तकें नॉक्स: यह किताब 2010 में प्रकाशित हुई थी। ऐन कार्सन ने इसे अपने भाई माइकल की याद में लिखा था। माइकल की 2000 में डेनमार्क में मौत हो गई थी। उनकी मौत से पहले वह रहस्यमय तरीके से परिवार से दूर हो गए थे। द ब्यूटी ऑफ द हसबैंड: यह किताब 2001 में प्रकाशित हुई। यह एक ऐसे पति की कहानी है, जो अपनी पत्नी को धोखा देता है। कार्सन ने इस रिश्ते की कहानी को 29 हिस्सों में बांटा। हर हिस्सा कवि जॉन कीट्स की पंक्तियों से शुरू होता है। पिछले 10 साल में 5 महिलाओं को मिला साहित्य नोबेल पिछले 10 साल में साहित्य का नोबेल 10 लेखकों को मिला, जिनमें 5 महिलाएं थीं। इनमें 6 ने अंग्रेजी के अलावा दूसरी भाषाओं में लिखा, जबकि 6 विजेता यूरोप से रहे। 2024 में दक्षिण कोरिया की हान कांग एशिया से पुरस्कार जीतने वाली लेखिका थीं। इस दौरान दक्षिण एशिया से कोई लेखक नहीं जीता। हर साल स्वीडिश अकादमी नॉमिनेशन मंगाती है। इसमें अकादमी के सदस्य, साहित्य और भाषा के प्रोफेसर, पूर्व नोबेल विजेता और लेखक संगठनों के प्रमुख नाम भेज सकते हैं। लेखक खुद को नामांकित नहीं कर सकते। नोबेल कमेटी पहले 15 से 20 नाम चुनती है, फिर मई में इन्हें 5 उम्मीदवारों तक सीमित किया जाता है। इसके बाद स्वीडिश अकादमी के 18 सदस्य वोटिंग से विजेता चुनते हैं। 50 साल तक गोपनीय रहता है नॉमिनेशन स्वीडिश अकादमी नोबेल के नामांकित लेखकों की लॉन्गलिस्ट या शॉर्टलिस्ट जारी नहीं करती। नॉमिनेशन से जुड़ी जानकारी 50 साल तक गोपनीय रहती है। इसलिए 2026 में किन लेखकों को नामांकित किया गया, इसकी पूरी जानकारी 2076 में सामने आएगी। नोबेल रिकॉर्ड के मुताबिक, सरवपल्ली राधाकृष्णन, श्री अरविंद, ताराशंकर बंद्योपाध्याय और आरके नारायण जैसे भारतीय लेखकों को अलग-अलग वर्षों में साहित्य नोबेल के लिए नामांकित किया गया था। ग्राफिक्स: अंकित पाठक गूगल पर ट्रेंड कर रहा नोबेल प्राइज सोर्स- गूगल ट्रेंड --------------------------------- ये खबर भी पढ़ें… 2026 का केमिस्ट्री नोबेल फ्रांस-जापान के वैज्ञानिकों को:अणुओं के मिरर इमेज की 100 साल पुरानी गुत्थी सुलझाई; दवाएं बनाने में मदद मिली 2026 का केमिस्ट्री नोबेल पुरस्कार फ्रांस के वैज्ञानिक हेनरी बी. कागन और जापान के केन्सो सोआई को दिया गया है। दोनों वैज्ञानिकों ने रसायन विज्ञान की करीब 100 साल पुरानी गुत्थी सुलझाई है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
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