यूपी की आंगनबाड़ी बहनों को CM योगी की सौगात, अब हर साल मिलेंगी 3 साड़ियां; 19.02 करोड़ रुपये होंगे खर्च
UP News: उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने प्रदेश भर में जमीनी स्तर पर सेवाएं दे रही लाखों आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों और सहायिकाओं को एक बड़ा और राहत भरा तोहफा दिया है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई महत्वपूर्ण कैबिनेट बैठक में यह निर्णय लिया गया कि अब इन महिला कर्मियों को हर साल दो के बजाय तीन साड़ियां उपलब्ध कराई जाएंगी. सरकार के इस कदम से राज्य की लगभग पौने चार लाख से अधिक आंगनबाड़ी बहनों को सीधा लाभ पहुंचेगा. कार्यस्थल पर निर्धारित गणवेश यानी यूनिफॉर्म पहनकर सेवा देने वाली इन महिला कर्मियों को इस निर्णय से अपने रोजमर्रा के काम में बहुत बड़ी सहूलियत मिलेगी.
कैबिनेट बैठक में प्रस्ताव पर लगी मुहर
राजधानी लखनऊ में आयोजित कैबिनेट बैठक में कई बड़े प्रस्तावों पर चर्चा के बाद इस कल्याणकारी फैसले को हरी झंडी दिखाई गई. बैठक संपन्न होने के बाद प्रदेश के वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने मीडिया से बात करते हुए इस महत्वपूर्ण निर्णय की औपचारिक जानकारी दी. उन्होंने बताया कि वर्तमान में पूरे उत्तर प्रदेश के भीतर कुल 1,90,145 आंगनबाड़ी केंद्र स्वीकृत हैं. नियमानुसार इन केंद्रों पर इतनी ही संख्या में कार्यकत्रियों और सहायिकाओं के पद भी स्वीकृत किए गए हैं. राज्य सरकार ने इन सभी स्वीकृत पदों की कुल संख्या को ध्यान में रखकर यह निर्णय लिया है कि हर कर्मी को एक अतिरिक्त साड़ी प्रदान की जाए. इस प्रकार कुल मिलाकर 3,80,290 कार्यकत्रियों और सहायिकाओं को इस नई व्यवस्था का सीधा लाभ मिलेगा.
तीसरी साड़ी का पूरा खर्च खुद उठाएगी राज्य सरकार
आंगनबाड़ी कर्मियों को मिलने वाली यूनिफॉर्म के वित्तीय ढांचे पर बात करते हुए वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि अब तक चली आ रही व्यवस्था में केंद्र और राज्य सरकार मिलकर खर्च वहन करती रही हैं. सामान्य योजना के तहत 60 और 40 के वित्तीय अनुपात में प्रतिवर्ष दो साड़ियां दी जाती रही हैं. इसमें 60 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार और चालीस प्रतिशत हिस्सा राज्य सरकार देती है. हालांकि, अब जो तीसरी अतिरिक्त साड़ी देने का निर्णय लिया गया है, उसका पूरा वित्तीय भार राज्य सरकार अपने बजट से उठाएगी. इसमें केंद्र सरकार से कोई वित्तीय मदद नहीं ली जाएगी.
सरकारी खजाने से खर्च होंगे 19 करोड़ रुपये से ज्यादा
सरकार ने इस नई व्यवस्था को लागू करने के लिए आवश्यक वित्तीय आकलन भी पूरा कर लिया है. प्रति साड़ी की अनुमानित दर 500 रुपये तय की गई है. इस हिसाब से प्रदेश भर के सभी स्वीकृत पदों पर तैनात कार्यकत्रियों और सहायिकाओं के लिए अतिरिक्त साड़ी खरीदने पर राज्य के खजाने से कुल 19 करोड़ 1 लाख 45 हजार रुपये का खर्च आएगा. सरकार ने इसके लिए आवश्यक धनराशि की व्यवस्था सुनिश्चित कर ली है ताकि समय पर सभी बहनों तक यह लाभ पहुंचाया जा सके.
धुलाई और मौसम की दिक्कतों से मिलेगी बड़ी राहत
आंगनबाड़ी केंद्रों पर काम करने वाली कार्यकत्रियों और सहायिकाओं के लिए विभाग द्वारा निर्धारित ड्रेस कोड पहनना अनिवार्य होता है. वे इसी वेशभूषा में अपने केंद्र का संचालन करती हैं और विभिन्न गांवों व मोहल्लों में घर-घर जाकर सेवाएं देती हैं. साल भर में केवल दो साड़ियां मिलने के कारण उन्हें कई प्रकार की व्यावहारिक समस्याओं का सामना करना पड़ता था. लगातार इस्तेमाल, बार-बार की धुलाई, बरसात व गर्मी के मौसम की सीलन और काम के दौरान साड़ी खराब होने जैसी दिक्कतों से वे परेशान रहती थीं. अक्सर साड़ियों के फटने या गंदा होने पर विकल्प की कमी हो जाती थी. अब हर साल तीसरी साड़ी मिलने से उनकी यह समस्या पूरी तरह दूर हो जाएगी और वे सम्मानपूर्वक व आत्मविश्वास के साथ अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर सकेंगी.
पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूत रीढ़ हैं आंगनबाड़ी बहनें
उत्तर प्रदेश में समाज के अंतिम पायदान तक महिलाओं और बच्चों की सेहत का ख्याल रखने में आंगनबाड़ी केंद्रों की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है. इन केंद्रों के माध्यम से छह महीने से लेकर छह साल तक के नन्हे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और नवजात को स्तनपान कराने वाली माताओं को पूरक पुष्टाहार का वितरण नियमित रूप से किया जाता है. इसके अतिरिक्त प्रदेश के आकांक्षी जिलों में 14 से 18 साल की किशोरियों के पोषण और स्वास्थ्य का ध्यान रखने की जिम्मेदारी भी इन्हीं केंद्रों के कंधों पर है. कुपोषण को मात देने, टीकाकरण के प्रति जागरूकता फैलाने और सरकारी योजनाओं को धरातल पर उतारने में ये बहनें रात-दिन मेहनत करती हैं. योगी सरकार का यह फैसला उनकी इसी निष्ठा, समर्पण और कड़ी मेहनत के प्रति एक सकारात्मक सम्मान के रूप में देखा जा रहा है.
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गरबा से ग्लोबल मार्केट तक…गुजरात की सखी मंडल की महिलाएं पारंपरिक कला से बना रहीं पहचान
गुजरात में नवरात्रि के उत्सवी माहौल के बीच ग्रामीण महिलाएं अपनी पारंपरिक कला और हस्तशिल्प को कारोबार में बदलकर आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश कर रही हैं. सखी मंडल और स्वयं सहायता समूहों (SHGs) से जुड़ी महिलाएं कढ़ाई, मिरर वर्क, चनिया-चोली और पारंपरिक आभूषणों के जरिए अपने उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचा रही हैं.
वाइब्रेंट नवरात्रि, अहमदाबाद हाट और सरस मेले जैसे मंच इन महिला उद्यमियों को अपने उत्पाद प्रदर्शित करने, ग्राहकों से जुड़ने और आमदनी बढ़ाने का अवसर दे रहे हैं. भावना स्वयं सहायता समूह की सदस्य शर्मिष्ठा पटेल के मुताबिक, उनका समूह कुर्ती, ब्लाउज, चनिया-चोली और कढ़ाई वाले दूसरे उत्पाद तैयार करता है. समूह की महिलाएं गांधीनगर, अहमदाबाद, वडोदरा, सूरत, पुणे, मुंबई और हैदराबाद जैसे शहरों में आयोजित प्रदर्शनियों में स्टॉल लगाकर अपने उत्पाद बेचती हैं.
समाज में पहचान मजबूत करने का अवसर
सखी मंडल से जुड़ने का फायदा केवल कारोबार तक सीमित नहीं है. इससे महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता, स्वरोजगार और समाज में सम्मान हासिल करने में भी मदद मिल रही है. सखी मंडल की सदस्य मोनिका व्यास के अनुसार, इस पहल ने महिलाओं को अपनी पसंद का काम करने और परिवार के साथ-साथ समाज में अपनी पहचान मजबूत करने का अवसर दिया है.
इस पहल को गुजरात सरकार के मिशन मंगलम कार्यक्रम का समर्थन प्राप्त है. इसका उद्देश्य स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं की आजीविका और आर्थिक सशक्तीकरण को बढ़ावा देना है. अहमदाबाद हाट में कच्छ की पारंपरिक कढ़ाई और हस्तनिर्मित उत्पाद ग्राहकों को आकर्षित कर रहे हैं. नवरात्रि के दौरान पारंपरिक परिधानों और सजावटी वस्तुओं की मांग बढ़ने से महिला उद्यमियों को कारोबार बढ़ाने का अतिरिक्त अवसर मिल रहा है.
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में अहम योगदान
इस तरह गुजरात की महिलाएं अपनी सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक बाजार से जोड़कर न केवल पारंपरिक कला को सहेज रही हैं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की दिशा में भी अहम योगदान दे रही हैं.
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