Gold-Silver Price: एक हफ्ते में 1200 रुपये महंगा हुआ सोना, चांदी की कीमत 2.21 लाख के पार
Gold-Silver Price: सोने इस हफ्ते तेजी देखने को मिली, जिससे दाम 1,200 रुपए प्रति 10 ग्राम से अधिक बढ़ गया. हालांकि, इस दौरान चांदी में मामूली तेजी दर्ज की गई. इंडिया बुलियन ज्वेलर्स एसोसिएशन (आईबीजेए) के मुताबिक, 24 कैरेट सोने का दाम इस हफ्ते 1,292 रुपए बढ़कर 1,49,430 रुपए प्रति 10 ग्राम हो गया है, जबकि पहले यह 1,48,138 रुपए प्रति 10 ग्राम पर था.
जानें क्या हैं अब 22 कैरेट सोने के दाम
22 कैरेट सोने की कीमत बढ़कर 1,36,878 रुपए प्रति 10 ग्राम हो गई है, जो कि पहले 135694 रुपए प्रति 10 ग्राम थी. 18 कैरेट सोने का दाम बढ़कर 1,12,073 रुपए प्रति 10 ग्राम हो गया है, जो कि पहले 1,11,104 रुपए प्रति 10 ग्राम था. इस हफ्ते सोने में सबसे न्यूनतम दाम 9 अक्टूबर को सुबह के सत्र में 1,49,614 रुपए प्रति 10 ग्राम देखा गया. वहीं, उच्चतम दाम 6 अक्टूबर को सुबह के सत्र में 1,47,278 रुपए प्रति 10 ग्राम देखा गया. सोने के साथ चांदी की कीमत में भी तेजी देखने को मिली है.
चांदी की कीमतों में 280 रुपये का उछाल
चांदी का दाम 280 रुपए बढ़कर 2,21,109 रुपए प्रति किलो हो गया है, जो कि पहले 2,20,829 रुपए प्रति किलो था. इस हफ्ते चांदी में उच्चतम दाम 5 अक्टूबर को शाम के सत्र में 2,24,157 रुपए प्रति किलो देखा गया. वहीं, न्यूनतम दाम 7 अक्टूबर को शाम के सत्र में 2,20,866 रुपए प्रति किलो देखा गया. आईबीजेए की ओर से दिन में दो बार सुबह और शाम के सत्र में सोने और चांदी की कीमतों को जारी किया जाता है.
विदेशी बाजारों में भी बढ़े सोने-चांदी के दाम
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोने का दाम 4,200 डॉलर प्रति औंस और चांदी का दाम 60 डॉलर प्रति औंस के करीब पहुंच गया है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, सोने और चांदी एक दाम इस हफ्ते एक सीमित दायर में रहे. इसकी वजह बॉन्ड यील्ड का लगातार 5 प्रतिशत और कच्चे तेल का 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहना है. वहीं, मजबूत डॉलर दोनों कीमती धातुओं पर दबाव बना रहा है.
स्रोत- आईएएनएस
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का क्या है संवैधानिक तरीका? जानिए संसद से राष्ट्रपति तक की पूरी प्रक्रिया
दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक बार फिर प्रदर्शन को लेकर हलचल देखने को मिल रही है. इस बार मामला छात्रों से जुड़ा नहीं, बल्कि चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से संबंधित है. कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का आरोप है कि मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान कई तरह की गड़बड़ियां हुई हैं. पार्टी इसी मुद्दे को लेकर चुनाव आयोग की जवाबदेही तय करने की मांग कर रही है.
प्रदर्शन को लेकर दिल्ली पुलिस ने अनुमति नहीं दी है. पुलिस की ओर से इसके लिए कम समय पहले आवेदन मिलने और पिछले प्रदर्शन के दौरान नियमों के उल्लंघन का हवाला दिया गया. इसके बावजूद जंतर-मंतर पर लोगों के जुटने की खबरें सामने आ रही हैं. इस पूरे मामले के बीच एक अहम सवाल उठ रहा है कि क्या किसी प्रदर्शन या विरोध के जरिए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाया जा सकता है? इसका जवाब है नहीं. मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए संविधान में एक विशेष प्रक्रिया तय की गई है. आइए, आसान भाषा में समझते हैं कि यह प्रक्रिया कैसे पूरी होती है.
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए क्या हैं संवैधानिक नियम?
मुख्य चुनाव आयुक्त का पद एक स्वतंत्र संवैधानिक पद है. चुनाव आयोग का काम निष्पक्ष तरीके से चुनाव कराना है. इसी स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया को कठिन बनाया गया है. मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरह पद से हटाया जा सकता है, जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया अपनाई जाती है. इसके लिए केवल सरकार का फैसला या संसद में साधारण बहुमत पर्याप्त नहीं होता. निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है.
संसद में प्रस्ताव पेश करने से शुरू होती है प्रक्रिया
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए सबसे पहले उनके खिलाफ निर्धारित आधारों पर प्रस्ताव लाया जाता है. इसके लिए दुर्व्यवहार या अक्षमता जैसे आधारों को साबित करना होता है. इस प्रस्ताव को लोकसभा या राज्यसभा में पेश किया जा सकता है. लोकसभा में प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं. प्रस्ताव मिलने के बाद संबंधित सदन के अध्यक्ष या सभापति यह तय करते हैं कि उसे स्वीकार किया जाए या नहीं. यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यों वाली समिति गठित की जाती है.
तीन सदस्यीय समिति करती है आरोपों की जांच
प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद गठित समिति मुख्य चुनाव आयुक्त पर लगाए गए आरोपों की जांच करती है. इस समिति में सुप्रीम कोर्ट का एक न्यायाधीश, किसी हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होते हैं. समिति का उद्देश्य आरोपों की निष्पक्ष जांच करना होता है. इस दौरान संबंधित मुख्य चुनाव आयुक्त को भी अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाता है. जांच पूरी होने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट संबंधित सदन के अध्यक्ष या सभापति को सौंपती है. यदि जांच में आरोप साबित नहीं होते हैं, तो पद से हटाने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती. वहीं, आरोप साबित होने पर प्रस्ताव पर आगे की संसदीय कार्रवाई की जा सकती है.
दोनों सदनों में विशेष बहुमत जरूरी
यदि जांच रिपोर्ट में आरोप साबित हो जाते हैं, तो मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के प्रस्ताव पर संसद में विचार किया जाता है. इस प्रस्ताव को पारित करने के लिए विशेष बहुमत की जरूरत होती है. इसके तहत सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत के साथ-साथ उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन भी जरूरी होता है. यह प्रक्रिया लोकसभा और राज्यसभा, दोनों में पूरी करनी होती है. यदि एक सदन से प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो उसे दूसरे सदन में भी निर्धारित बहुमत से पारित कराना अनिवार्य है. केवल एक सदन की मंजूरी मिलने से मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से नहीं हटाया जा सकता.
राष्ट्रपति के आदेश के बाद ही हटाया जा सकता है पद से
जब दोनों सदन निर्धारित विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित कर देते हैं, तो उसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है. इसके बाद राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं. इस तरह साफ है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करना या किसी राजनीतिक दल की ओर से मांग उठाना अपने आप में मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का आधार नहीं है. इसके लिए निर्धारित संवैधानिक आधारों पर कार्रवाई, आरोपों की जांच और संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना जरूरी है.
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