आपका पैसा- इन्वेस्टमेंट की 8 कॉमन गलतियां:सेविंग होती कम, लॉन्ग टर्म फंड पर बुरा असर, एक्सपर्ट से जानें इन गलतियों से कैसे बचें?
बढ़िया नौकरी, अच्छी सैलरी और रेगुलर इनकम के बावजूद हर व्यक्ति अमीर नहीं बन पाता। अमीर न बन पाने की वजह सिर्फ इनकम नहीं होती, बल्कि पैसों को संभालने और निवेश में की जाने वाली छोटी-छोटी गलतियां होती हैं। कई लोग पूरी कमाई खर्च कर देते हैं, बचत को टालते रहते हैं या बिना रिसर्च के कहीं भी निवेश कर देते हैं। वहीं कुछ निवेशक बाजार के उतार-चढ़ाव में घबराकर भावनात्मक फैसले लेते हैं, जिससे लंबे समय में फाइनेंशियल गोल्स प्रभावित होता है। अगर निवेश की शुरुआत सही स्ट्रैटजी के साथ करें और कुछ कॉमन गलतियों से बचें तो छोटी रकम से किया गया नियमित निवेश भी बड़ा फंड बना सकता है। इसलिए आज ‘आपका पैसा’ में समझेंगे कि लोग अमीर क्यों नहीं बन पाते हैं। साथ ही जानेंगे कि- एक्सपर्ट- जितेंद्र सोलंकी, फाइनेंशियल एडवाइजर, गाजियाबाद सवाल- कुछ लोग अच्छा पैसा कमाने के बावजूद अमीर क्यों नहीं बन पाते हैं? जवाब- अच्छा पैसा कमाना और अमीर होना दो अलग-अलग बातें हैं। कई लोग अच्छी इनकम के बावजूद संपत्ति नहीं बना पाते, क्योंकि इसके लिए पैसों का सही मैनेजमेंट आना जरूरी है। अगर कोई व्यक्ति जितना कमाता है, उतना ही या उससे ज्यादा खर्च करता है, तो उसकी इनकम बढ़ने के बावजूद संपत्ति नहीं बन पाती है। सवाल- कौन-सी फाइनेंशियल हैबिट्स लोगों को अमीर नहीं बनने देती हैं? जवाब- कुछ फाइनेंशियल हैबिट्स अच्छी कमाई के बावजूद संपत्ति बनाने में बाधा बन सकती हैं। ग्राफिक में देखिए- सवाल- क्या सिर्फ निवेश करके अमीर बना जा सकता है? जवाब- हां, सिर्फ निवेश के दम पर भी अमीर बना जा सकता है, लेकिन इसके लिए तीन चीजें जरूरी हैं। इसे ऐसे समझिए- सवाल- अनुभवी निवेशक फंड बनाने में किन बातों का ध्यान रखते हैं? जवाब- अनुभवी निवेशक की सबसे खास बात ये होती है कि वह बहुत सोच-समझकर धैर्य से फैसले लेते हैं। इसके लिए रिसर्च के साथ प्लानिंग करते हैं। अनुभवी निवेशक किन बातों का ध्यान रखते हैं, ग्राफिक में देखिए- सवाल- आम निवेशक किन वजहों से गलतियां करते हैं? जवाब- आमतौर पर निवेशक जिस तरह की गलतियां करते हैं, उसकी ये कॉमन वजह हो सकती हैं- सवाल- सारे पैसे एक जगह इन्वेस्ट करने के क्या नुकसान हैं? जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझिए- सवाल- इन्वेस्टमेंट पोर्टफोलियो को रेगुलर रिव्यू करना क्यों जरूरी है? जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझिए- सवाल- क्या बहुत सुरक्षित निवेश का डर भी लोगों को अमीर नहीं बनने देता है? जवाब- हां, कई बार ऐसा हो सकता है। सवाल- अगर कोई निवेश में ये गलतियां कर चुका है, तो उन्हें सुधारने के लिए क्या करें? जवाब- अगर पहले निवेश में कुछ गलतियां की हैं तो घबराने की बजाय उन्हें समय रहते सुधारने पर ध्यान देना चाहिए। निवेश में गलतियां होने पर क्या करें, ग्राफिक में देखिए- सवाल- कौन-सी छोटी-छोटी आदतें निवेशकों को अच्छा रिटर्न दिला सकती हैं? जवाब- कुछ छोटी-छोटी, लेकिन अच्छी फाइनेंशियल हैबिट्स निवेशकों को लंबे समय में बेहतर रिटर्न दिला सकती हैं, जैसेकि- सवाल- नए निवेशकों को किन बातों का खास ध्यान रखना चाहिए? जवाब- इसके लिए इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है- …………………………… ग्राफिक्स– विपुल शर्मा …………………………. ये खबर भी पढ़ें… आपका पैसा- सैलरी बढ़ते ही खर्चे न बढ़ाएं:करें ये 6 काम, लाइफस्टाइल के साथ फ्यूचर भी सेफ, एक्सपर्ट से समझें पूरा फाइनेंशियल प्लान सैलरी इंक्रीमेंट साल की सबसे बड़ी खुशखबरी होती है। प्रमोशन या इंक्रीमेंट के बाद लोग बेहतर लाइफस्टाइल, महंगी चीजों और ज्यादा सुविधाओं की तरफ आकर्षित होते हैं। लेकिन यहीं से शुरू होता है ‘लाइफस्टाइल इंफ्लेशन’ यानी आमदनी बढ़ने के साथ खर्च भी तेजी से बढ़ जाना। पूरी खबर पढ़ें…
MP High Court ने रद्द किया 27 प्रतिशत OBC Reservation, 14 फीसदी कोटा फिर बहाल
जबलपुर, नौ अक्टूबर मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को तत्कालीन कमलनाथ नीत कांग्रेस सरकार द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने संबंधी 2019 के कानून को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि यह उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा के विपरीत है। न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति विनय सराफ की खंडपीठ ने अपने 159 पृष्ठ के फैसले में कहा कि आरक्षण बढ़ाने के लिए कोई असाधारण परिस्थिति नहीं थी।
अदालत ने राज्य में ओबीसी के लिए 14 प्रतिशत आरक्षण बहाल कर दिया। पीठ ने कहा कि संशोधन पर्याप्त तैयारी के बिना और ‘‘अनुचित जल्दबाजी’’ में पारित किया गया था तथा कानून के मसौदे में त्रुटियां सरकार की ‘‘अपर्याप्त तैयारी’’ को दर्शाती हैं। अदालत ने संशोधन को ‘‘संवैधानिक प्रावधानों के अधिकार क्षेत्र से बाहर’’ बताते हुए कहा कि यह उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित 50 प्रतिशत की सीमा के भी विपरीत है।
पीठ ने स्पष्ट किया कि मामले में विवाद ओबीसी को आरक्षण देने के अधिकार को लेकर नहीं, बल्कि आरक्षण की सीमा को लेकर है। अदालत ने कहा कि उच्च शिक्षा और सरकारी सेवाओं में ओबीसी के प्रतिनिधित्व से संबंधित उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि इस वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व है। ऐसे में आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का कोई आधार नहीं बनता।
पीठ ने इंद्रा साहनी और जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल मामलों में उच्चतम न्यायालय के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा पार करने के लिए ‘‘कोई असाधारण परिस्थिति या आपात स्थिति मौजूद नहीं है।’’ उच्च न्यायालय ने वर्ष 2019 के अध्यादेश और उसके बाद तत्कालीन कमलनाथ नीत कांग्रेस सरकार द्वारा पारित संशोधन को निरस्त कर दिया। इस संशोधन के जरिए सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया गया था। पीठ ने मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (एमपीपीएससी), कर्मचारी चयन मंडल और अन्य भर्ती एजेंसियों को निर्देश दिया कि आरक्षण बढ़ाने संबंधी कानून को चुनौती दिए जाने के बाद रोके गए 13 प्रतिशत पदों को तीन महीने के भीतर अनारक्षित वर्ग से भरा जाए।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि मार्च 2019 से 29 सितंबर 2022 के बीच बढ़े हुए आरक्षण के तहत नियुक्त ओबीसी उम्मीदवारों की सेवाएं समाप्त नहीं की जाएंगी। 14 प्रतिशत की निर्धारित सीमा से अधिक नियुक्त उम्मीदवारों के पदों का समायोजन अगली तीन भर्ती प्रक्रियाओं में किया जाएगा। अदालत ने कहा कि 29 सितंबर 2022 के बाद की गई भर्तियों में 87 प्रतिशत पदों पर नियुक्तियां की गई थीं, जबकि शेष 13 प्रतिशत पदों को मामले में मुकदमेबाजी के परिणाम के इंतजार में रोक दिया गया था।
अब इन पदों को अनारक्षित वर्ग से भरा जाएगा। राज्य सरकार की ओर से पेश महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने कहा कि अदालत ने दस्तावेजों, आंकड़ों और तालिकाओं की जांच करने के बाद फैसला सुनाया है। उन्होंने कहा कि विवाद पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने के अधिकार को लेकर नहीं, बल्कि सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण को 2019 में 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने को लेकर था।
तत्कालीन कमलनाथ नीत कांग्रेस सरकार ने आठ मार्च 2019 को अध्यादेश जारी कर ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया था। बाद में 14 अगस्त 2019 को इसे कानून का रूप दिया गया। इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी।
मामला बाद में उच्चतम न्यायालय पहुंचा, जहां से संबंधित याचिकाओं की संयुक्त सुनवाई और निर्णय के लिए इसे मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय वापस भेज दिया गया। याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई इस साल पांच अगस्त को पूरी हुई, जिसके बाद पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। इस बीच, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा कि उनकी पार्टी 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण के लिए संघर्ष जारी रखेगी।
उन्होंने भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री मोहन यादव पर ओबीसी वर्ग के खिलाफ साजिश करने का आरोप लगाया और कहा कि कांग्रेस उच्च न्यायालय के फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देगी। ओबीसी महासभा ने भी फैसले पर निराशा जताई। संगठन की राष्ट्रीय कोर समिति के सदस्य और मामले में याचिकाकर्ता लोकेन्द्र गुर्जर ने कहा कि महासभा फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देगी और ओबीसी वर्ग के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रदेशव्यापी आंदोलन शुरू करेगी।
मध्यप्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के पूर्व अध्यक्ष जे पी धनौपिया ने आरोप लगाया कि यह फैसला राज्य सरकार की ‘‘दुर्भावनापूर्ण मंशा’’ का परिणाम है। उन्होंने दावा किया कि सरकार अदालत के समक्ष तथ्यों को प्रभावी ढंग से पेश करने में विफल रही, जिसके कारण ओबीसी वर्ग 27 प्रतिशत आरक्षण के लाभ से वंचित रह गया।
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