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पाकिस्तान: आत्मघाती हमले में अब तक 15 से ज्यादा की मौत, 80 से अधिक घायल (लीड-1)

इस्लामाबाद, 6 फरवरी (आईएएनएस)। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के तरलाई इलाके में शुक्रवार की नमाज़ के दौरान एक इमामबाड़े में हुए भीषण धमाके में 15 से अधिक लोगों की मौत हो गई, जबकि 80 से ज्यादा लोग घायल हो गए। इस घटना के बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई।

जिला प्रशासन के एक प्रवक्ता ने बताया कि धमाके में मरने वालों की संख्या बढ़कर 15 हो गई है। उन्होंने यह भी पुष्टि की कि घायलों को शहर के विभिन्न अस्पतालों में भर्ती कराया गया है, जिनकी संख्या 80 से अधिक है। पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (पीआईएमएस) अस्पताल के प्रवक्ता के अनुसार, अकेले उनके अस्पताल में 32 घायलों को लाया गया है।

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक धमाके की आवाज़ काफी दूर तक सुनाई दी। विस्फोट स्थल को पूरी तरह से सील कर दिया गया है और सबूत जुटाने का काम जारी है। शुरुआती रिपोर्टों में इसे आत्मघाती हमला बताया जा रहा है, हालांकि अधिकारियों ने अभी तक आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं की है।

पाकिस्तान के अख़बार एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि यह हमला ऐसे समय में हुआ है जब देश के अलग-अलग हिस्सों, खासकर बलूचिस्तान में सुरक्षा बलों और नागरिकों को निशाना बनाकर लगातार हमले हो रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी याद दिलाया गया कि 11 नवंबर को इस्लामाबाद कोर्ट के बाहर हुए हमले में 12 लोगों की मौत हुई थी और 36 से अधिक लोग घायल हुए थे।

दैनिक डॉन के अनुसार, इस्लामाबाद कैपिटल टेरिटरी पुलिस के प्रवक्ता तकी जवाद ने कहा कि फिलहाल धमाके की प्रकृति को लेकर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। फोरेंसिक जांच के बाद ही यह साफ हो पाएगा कि यह आत्मघाती हमला था या पहले से लगाया गया बम।

वहीं, जियो न्यूज ने स्थानीय अधिकारियों के हवाले से बताया कि आत्मघाती हमलावर को मस्जिद के प्रवेश द्वार पर रोका गया था, जिसके बाद उसने खुद को विस्फोट से उड़ा लिया।

गौरतलब है कि यह हमला ऐसे समय में हुआ है जब उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शवकत मिर्ज़ियोयेव दो दिवसीय आधिकारिक दौरे पर पाकिस्तान में मौजूद हैं।

पिछले एक हफ्ते में पाकिस्तान में हिंसक घटनाओं में इज़ाफा हुआ है। बलूच लड़ाकों द्वारा पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के खिलाफ ‘ऑपरेशन हेरोफ-2’ शुरू किए जाने के बाद हालात और तनावपूर्ण हो गए हैं।

इससे पहले बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने दावा किया था कि उसने बलूचिस्तान के नुश्की जिले में अहमद वाल इलाके में एक पाकिस्तानी सेना के कैंप पर कब्ज़ा कर लिया है। इससे पहले संगठन ने गलांगुर इलाके में एक स्थानीय बेस पर कब्ज़ा करने का भी दावा किया था।

बीएलए के मुताबिक, ‘ऑपरेशन हेरोफ’ के तहत क्वेटा, नुश्की और बलूचिस्तान के कम से कम 12 अन्य शहरों में एक साथ समन्वित हमले किए गए हैं। 31 जनवरी से शुरू हुए ऑपरेशन हेरोफ के दूसरे चरण के बाद से कई पाकिस्तानी सैन्यकर्मी मारे गए या घायल हुए हैं।

इस बीच, द बलूचिस्तान पोस्ट ने स्थानीय लोगों के हवाले से कहा है कि पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर आबादी वाले इलाकों को जानबूझकर निशाना बनाने के आरोप लगाए गए हैं, जिससे आम नागरिकों के हताहत होने की आशंका बढ़ गई है।

--आईएएनएस

डीएससी

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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अब मिट्टी नहीं, हवा में आलू उत्पादन, ग्वालियर की लैब में हाई-टेक एरोपोनिक्स से खेती में नया प्रयोग

ग्वालियर, 6 फरवरी (आईएएनएस)। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में खेती के क्षेत्र में एक बेहद दिलचस्प और आधुनिक प्रयोग किया जा रहा है। यहां अब आलू जमीन में नहीं, बल्कि हवा में उगाए जा रहे हैं। यह अनोखा काम शहर में स्थित राजमाता विजया राजे सिंधिया विश्वविद्यालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग की एरोपोनिक्स लैब यूनिट में हो रहा है। इस लैब में करीब 20 अलग-अलग किस्मों के आलू के बीज तैयार किए जा रहे हैं, जो पूरी तरह से हेल्दी, शुद्ध और बीमारी-मुक्त बताए जा रहे हैं।

जैव प्रौद्योगिकी विभाग की वैज्ञानिक डॉ. सुषमा तिवारी ने बताया कि इस तकनीक में सबसे पहले टिशू कल्चर के जरिए लैब में आलू के पौधे तैयार किए जाते हैं। जब ये पौधे थोड़े मजबूत हो जाते हैं, जिसे हार्डनिंग कहा जाता है, तब इन्हें एरोपोनिक्स यूनिट में ट्रांसप्लांट किया जाता है। यहां खास बात यह है कि पौधे मिट्टी में नहीं लगाए जाते, बल्कि उनकी जड़ें हवा में लटकी रहती हैं। पौधे के रूट वाले हिस्से को थोड़ा काट दिया जाता है और फिर मिस्ट या फॉगिंग तकनीक के जरिए पोषक तत्व दिए जाते हैं।

डॉ. सुषमा तिवारी ने बताया कि इस यूनिट में हर तीन मिनट में करीब 30 सेकेंड के लिए फॉगिंग की जाती है। इसी फॉग के जरिए पौधों को वे सारे न्यूट्रिशन मिलते हैं, जो सामान्य तौर पर मिट्टी से मिलते हैं। यूनिट के अंदर तापमान को पूरी तरह कंट्रोल किया जाता है, ताकि पौधों की ग्रोथ सही तरीके से हो सके। कुछ ही दिनों में जड़ों का अच्छा विकास हो जाता है और करीब 45 से 55 दिनों के अंदर हवा में ही आलू बनने लगते हैं। जब आलू तैयार हो जाते हैं, तो पूरा यूनिट ऊपर उठाया जाता है और आलू साफ-साफ दिखाई देने लगते हैं। इसी वजह से इसे हवा में आलू उत्पादन कहा जाता है।

डॉ. तिवारी के मुताबिक इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें तैयार होने वाले आलू के बीज पूरी तरह बीमारी-मुक्त होते हैं। इनकी क्वालिटी बेहद अच्छी होती है और ये बिल्कुल शुद्ध रूप में तैयार होते हैं। इसी कारण ये बीज सामान्य बीजों की तुलना में ज्यादा भरोसेमंद माने जाते हैं। फिलहाल, ये बीज महंगे होने की वजह से आम किसानों की पहुंच से बाहर हैं, इसलिए अभी इन्हें लैब में ही तैयार कर पूरी तरह से टेस्ट किया जा रहा है।

इस एरोपोनिक्स लैब में करीब 20 तरह की आलू की वैरायटी उगाई जा रही हैं। इनमें एक खास लाल रंग की वैरायटी भी शामिल है, जिसे काफी लाभदायक माना जा रहा है। इसके अलावा, चिप्स और फ्रेंच फ्राइज के लिए इस्तेमाल होने वाली वैरायटी पर भी काम किया जा रहा है, क्योंकि प्रोसेसिंग इंडस्ट्री में इनकी काफी मांग रहती है। कुछ हल्के गुलाबी रंग की नई वैरायटी भी लगाई गई हैं, जो खाने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं और जिनकी बाजार में अच्छी डिमांड है।

डॉ. तिवारी ने बताया कि अभी रिसर्च का मकसद यह समझना है कि किसानों के लिए कौन-सी वैरायटी ज्यादा फायदेमंद साबित होगी। इसलिए फिलहाल सभी तरह की वैरायटी पर काम किया जा रहा है। किसान सीधे इस तकनीक को अपनाएं तो शुरुआत में लागत ज्यादा हो सकती है और इसे संभालना आसान नहीं होगा। इसी वजह से अभी दो साल तक फील्ड लेवल पर रिसर्च की जाएगी और उसके बाद ही किसानों को ये बीज उपलब्ध कराए जाएंगे।

--आईएएनएस

पीआईएम/एबीएम

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